Poetry by Manmeet Soni: पढ़िये युवा कवि की खरी-खरी..यदि उत्तर हों यक्ष प्रश्नों के तो यह आपकी सफलता कम सार्थकता अधिक होगी..
आप भी पाठकों के आगे
कटोरा लिए खड़े हैं
मैं भी पाठकों के आगे
कटोरा लिए खड़ा हूँ
इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है सर
कि आपका कटोरा सोने का है
और मेरा कटोरा एल्युमीनियम का!
—
आप
पचास साल से कविता लिख रहे हैं
मैं
बीस साल से कविता लिख रहा हूँ
यह जो बीच में तीस सालों का अंतर है
यह मेरे माँ-बाप की वजह से है
वरना मैं कुछ मामलों में
आपका भी बाप हूँ :
यक़ीन नहीं हो तो पाठकों से पूछ लीजिये!
—
आपने जितना हिंदी से लिया है
काश आप हिंदी को उतना दे भी पाते
लिया तो मैंने भी बहुत है हिंदी से
लेकिन बदले में इसे अपना बहिष्कार दिया है
अपनी बदनामी और बर्बादी दी है हिंदी को
यह सर
यह दिल
यह जिगर दिया है हिंदी को
आप जिस यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं
वहाँ के चपड़ासी के लिए वैकेंसी का इंतज़ार किया है मैंने!
—
मुसलमानों को
चूमकर
पुचकार कर
गले से लगाकर
उनकी ऐतिहासिक ग़लतियों को क्षमा कर देने वाले आप
आप
जिन्हें डर है
कि उदयपुर के कन्हैयालाल की तरह गर्दन रेत दी जाएगी
मैं
आप जैसे कायरों में से नहीं हूँ श्रीमान!
मेरे मुसलमान पाठक
मुझे आपसे ज़्यादा प्यार करते हैं
आइये! आपको मेरे कमेंट सेक्शन की सैर करवाऊं!
—
बकवास कर रहे हैं आप
कविता के नाम पर
यह क्या रोना धोना लगा रखा है
कैसी फिज़ूल और बोरिंग कविता लिखते हैं आप
“आवाज़ की रौशनी”
“रौशनी का अंधेरा”
“धूप में छाँव”
“याद की पीठ में चन्द्रमा का चाकू”
“फूल की पंखुड़ी में सूरज की उजली परछाई”
आप कवि हैं या नालंदा हिंदी का पॉकेट साइज़ शब्दकोश?
—-
आप सब मिलकर
मोदी सरकार गिराने चले हैं
जबकि आपके घर में आपकी हालत यह है
कि आपके बच्चे तक आपके चरणों में नहीं गिरते
राहुल गांधी को जननायक बताने वालो
अपने बच्चों को
आप मन ही मन मोदी जैसा बनाना चाहते हैं
सीने पर हाथ रख कर कहो कि यह झूठ है!
—
लाल कुरता
सफ़ेद गमछा पहनकर
पुस्तक मेलों में बावरचियों की तरह घूमने वालो!
कोई नहीं खरीदेगा
यह दो-ढाई सौ प्रतियाँ तुम्हारी
आप यह सारी कविताएं
यही इसी फेसबुक पर लगाएंगे
और ज्ञान पेलेंगे :
“आजकल बुक कल्चर ख़त्म होती जा रही है”
—-
चार अपने जैसे कवियों को
किसी कमरे में इकट्ठा करके
पुस्तक विमोचन करने वालो
हिम्मत है
तो अपनी कविताएं
इस भारत देश के एक सौ चालीस करोड़ लोगों में फेंककर देखो..
मैं
गारंटी से कहता हूँ
या तो सिद्ध कवि हो जाओगे
या कवि होने का भ्रम निकल जाएगा!
—
मेरे सीनियर कवियो!
आपका दिल बहुत छोटा है
इसमें
मुझ जैसा दक्षिणपंथी तक नहीं समा सकता
आप गे और लेस्बिययन को क्या ही अपनाएंगे?
आप एक सड़ी हुई दुनिया हैं
मेरे सीनियर कवियो!
चार ब्लॉग
दो वेबसाईट
तीन प्रकाशकों के गुलाम!
—-
अपनी कुर्सी टेबिल पर
पैंतालीस डिग्री झुक कर
कुछ भी लिखकर उसे कविता कहने वालो –
सरयू लाल होती रही
राम लला टेंट में रहे
गोधरा में सनातनियों की होली जली
मुस्लिमों और दलितों पर अत्याचार हुए
तब आप कहाँ थे?
नीली स्याही से
अपना मुँह पोतकर
कोई कवि नहीं बन जाता :
दोनों गालों पर
दोनों तरफ़ से थप्पड़ खाने पड़ते हैं –
जबकि आपके गालों पर
आपके ही डोळ के कवि भाइयों के चुम्बन हैं :
शर्म करो!
—
मैं आत्ममुग्ध नहीं हूँ
लेकिन आप लोगों में शामिल नहीं हो सकता –
अशोक वाजपेयी की जेब में घुसकर
संजीव सर्राफ की जेब से बाहर आने वालो!
क्या हिन्दवी और रेख्ता ने
आपका बचा-खुचा ईमान भी खा लिया है?
—
जो बहिष्कृत नहीं है
जो बदनाम नहीं है
जो अस्थिर नहीं है
जो लुंज पुंज नहीं है
वह कवि नहीं है : काडर है!
और काडर कभी कवि नहीं हो सकता!
—
ओपरेशन सिंदूर के वक़्त
कविता लिखना इसलिए बंद कर देने वालो
कि इस समय सरकार की तुम पर कड़ी नज़र है –
आपने इससे पहले
पुरस्कार वापसी का नाटक क्यों किया था?
—
यही दंड है आपका
कि अप्रासंगिक रहोगे हमेशा
कुढ़ते रहोगे मन ही मन
अथाह लोकप्रियता की चाह लिए
और
चूरू ज़िले का कोई कविता का युवा गंवार
अपने बस्ते में बाँधकर
हज़ारों पाठकों का प्यार :
चलता चला जाएगा अंगारों के पथ पर!
—
मेरे सीनियर कवियो!
लोकप्रियता
ईमानदार को मिलती है
और ईमानदारी
ख़ुद को बुरी तरह तबाह करके..
मेरे सीनियर कवियो!



