Poetry by Manmeet Soni: हमें चाहिये सनसनी -हमे चाहिये उत्तेजना -हमें चाहिये मजा..हमें कुछ जोरदार चाहिये..शांति से ऊबे हुए शांत सनातन के देश में हमें क्रान्ति से कम कुछ नहीं चाहिये- सुनिये युवा कवि मनमीत की कलम की आवाज..
“चाहिए – चाहिए – चाहिए”
हमें सुबह आठ से रात बारह बजे तक
एक फुल टाइम मनोरंजन चाहिए
हमें युद्ध चाहिए
युद्ध में लाशें
लाशों में ख़ून
ख़ून भी छितरा हुआ!
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हमें हर समय
बाढ़ चाहिए
भूकम्प चाहिए
बहुत बारिश चाहिए
बिलकुल कम बारिश चाहिए
गर्मी में झुलसते हुए
सर्दी में अकड़ते हुए
बारिश में डूबते हुए लोग चाहिए!
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हमें तानाशाह चाहिए
हमें बारूद चाहिए
हमें बंदूक चाहिए
हमें परमाणु बम की धमकी चाहिए
हमें क्रैश हो चुके हवाई जहाज चाहिए
हमें हर तीसरे चौथे दिन
किसी बड़े सेलिब्रिटी की मृत्यु चाहिए
मृत्यु भी ऐसी वैसी नहीं
संदेहास्पद मृत्यु चाहिए
हमें आरोपी चाहिए
हमें अपराधी चाहिए
हमें निर्दोष नहीं चाहिए
हमें खुली हत्या चाहिए
हमें सार्वजनिक हत्या चाहिए
फिर भीड़ चाहिए
फिर तमाशा चाहिए
—
हमें चीखते हुए एंकर चाहिए
एंकरों में भी स्त्री एंकर चाहिए
उसमें भी अंजना, रुबिका, चित्रा चाहिए
हमें न्यूज़ के साथ सौंदर्य चाहिए
हमें उत्तेजना चाहिए
हमें कंठ सुखा देने वाली वासना चाहिए
हमें भारत-पाकिस्तान चाहिए
हमें भारत-चीन चाहिए
हमें भारत-अमेरिका चाहिए
हमें यह सब नहीं मिले
तो कुछ और बड़ा अंतर्राष्ट्रीय चाहिए
हमारा बस नहीं चलता
वरना हमें परमाणु बमों से नष्ट हुआ
कोई नया जापान चाहिए
हमें ट्रम्प चाहिए
हमें किम जोंग चाहिए
हमें पुतिन और जैलेन्सकी की लड़ाई चाहिए
हमें यह सब चाहिए
क्योंकि हमें कुछ न कुछ चाहिए
—
हमें चौबीस घंटे न्यूज़ चाहिए
हमें कविता नहीं चाहिए
हमें कत्थक नहीं चाहिए
हमें लता मंगेशकर मुहम्मद रफ़ी नहीं चाहिए
हमें केके की मौत चाहिए
हमें इरफ़ान खान की मौत चाहिए
हमें मौत से कम कुछ नहीं चाहिए
हमें कामचलाऊ शांत लिजलिजी घटिया
प्रेम कविताएं चाहिए
हमें “मनमीत” नहीं चाहिए
क्योंकि “मनमीत” बिना चेतावनी के आग पकड़ लेता है
हमें टीवी चाहिए
हमें वेब सिरीज चाहिए
हमें तमन्ना भाटिया चाहिए
हमें तमन्ना भाटिया के दूधिया बदन पर लट्टू
अन्नू कपूर चाहिए
—
हमें हर दस मिनट में
एक बड़ी अपडेट चाहिए
हमें शान्ति नहीं चाहिए
हम शान्ति के बिना रह सकते हैं
लेकिन हम अशांति के बिना नहीं रह सकते
—
हमें सुधीर चौधरी के खिलाफ़ रवीश कुमार
हमें अभिसार के खिलाफ़ पुण्य प्रसून
हमें सुधांशु त्रिवेदी के खिलाफ़ सुप्रिया श्रीनेत
हमें पवन खेड़ा के खिलाफ़ संबित पात्रा चाहिए
हम सबसे बड़े लोकतंत्र हैं
हमें इस लोकतंत्र में हलचल चाहिए
हमें ख़ून खराबा हो हल्ला हुल्लड़ प्रदर्शन चाहिए
हमें फेसबुक चाहिए
हमें फेसबुक पर हमेशा एक मुद्दा चाहिए
हमें कभी मनमीत चाहिए
हमें कभी कृष्ण कल्पित चाहिए
हमें कभी अशोक वाजपेयी चाहिए
हमें मटुक नाथ चाहिए
हमें जूली चाहिए
हम इस क़दर बीमार हैं
कि हम मरने पर ही शांत होंगे
हमें हमारी अशांति का हर उपाय चाहिए
हमें नींद में जाने से पहले
यह ख़बर चाहिए
कि एक उल्का पिंड धरती से टकराने वाला है –
हमें नींद से उठते ही
दो-चार बड़ी हेडलाइन्स चाहिए
हमें आज तक चाहिए
हमें एबीपी न्यूज़ चाहिए
हमें जी न्यूज़ चाहिए
हमें झूठे यू ट्यूब चैनल भी चाहिए
—
हम भूखे हैं
हमारी आत्मा भूखी है
हम नंगे हैं
हमारी आत्मा नंगी है
हम दलाल हैं
हमारी आत्मा को दलाली चाहिए
—
हमें सब कुछ चाहिए
लेकिन हमें शांति नहीं चाहिए
और जिसे भी शांति चाहिए
हम उसे शूट कर देंगे
शूट करने से एक ख़बर बनेगी
ख़बर से हलचल पैदा होगी
हलचल से ज़िंदगी में मज़ा आएगा
हमें मज़ा ही मज़ा चाहिए
हम मज़ाक़ बन गए हैं
एक सौ चालीस करोड़ लोग मज़ाक़ बन गए हैं
लेकिन हमें मज़ा चाहिए
—
मेरी कविता पर टिप्पणी कीजिये
मुझे भला-बुरा कहिये
कहिये कि यह कविता नहीं है
फिर मैं आपको जवाब दूंगा
फिर हमारी लड़ाई होगी
जो लड़ेंगे उन्हें लड़ने का मज़ा चाहिए
जो लड़ते हुए देखेंगे उन्हें देखने का मज़ा चाहिए
हमें मज़ा चाहिए
—
चाहिए चाहिए चाहिए
क्योंकि देने के नाम पर
हमारे पास
केवल घंटा बचा है दोस्तो!
(मनमीत सोनी)



