Tuesday, February 24, 2026
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Subhash Chandra Bose: कौन था वह रहस्यमय सन्यासी फैजाबाद में ?

Subhash Chandra Bose: शाम के समय 88 वर्ष की परिपक्व आयु का एक संन्यासी अंतिम सांस लेता है। उस समय संन्यासी के इर्द गिर्द उसके कोई चार पांच शिष्य ही थे..

Subhash Chandra Bose: शाम के समय 88 वर्ष की परिपक्व आयु का एक संन्यासी अंतिम सांस लेता है। उस समय संन्यासी के इर्द गिर्द उसके कोई चार पांच शिष्य ही थे..

उस शाम अंतिम समय में इस संन्यासी के इर्द गिर्द उसके कोई चार पांच शिष्य ही थे जोकि अयोध्या/फैज़ाबाद के रसूखदार और प्रसिद्ध लोग थे।

इन शिष्यों में से एक थे डॉ. आर पी मिश्र, उस समय के अयोध्या के सबसे प्रसिद्ध MS सर्जन जिनसे लोग अपॉइंटमेंट के लिए तरसते थे। एक थे डॉ. टी सी बैनर्जी, जिन्हें ‘होम्योपैथ ऑफ द ईस्ट’ कहा जाता था। पंडा रामकिशोर भी थे, जो अयोध्या के तीर्थ पुरोहित थे। फैज़ाबाद डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल के डॉ. बी राय, एक प्राध्यापक श्रीवास्तव जी, महात्मा शरण जो फर्नीचर का काम करते थे आदि उपस्थित थे।
ये सभी अपने गुरु को ‘भगवनजी’ कहकर संबोधित करते थे।

भगवन जी, 1983 में अयोध्या के सिटी मजिस्ट्रेट ठाकुर गुरुदत्त सिंह की कोठी ‘राम भवन’ में रहने आये थे। भगवन जी की विशेषता यह थी कि उनका चेहरा अमूमन किसी ने नहीं देखा था। वे सार्वजनिक जगहों पर नहीं जाते थे और हमेशा एक मोटे पर्दे के पीछे बैठकर लोगों से बात करते थे।
अस्तु, आज उन भगवन जी की पार्थिव देह भी उसी सीक्रेसी के साथ राम भवन में रखी हुई थी। उनके देहावसान का समाचार कुछ महत्वपूर्ण लोगों को देने के साथ साथ एक संदेश कोलकाता भी भिजवाया गया। कोलकाता इसलिए कि भगवन जी शरीर से बंगाली थे और उनके पूर्वाश्रम के संबंधी कोलकाता में रहते थे।

17 सितंबर को दिनभर प्रतीक्षा करने के बाद शाम को यह तय किया गया कि अगले दिन 18 सितंबर को भगवनजी का अंतिम संस्कार कर दिया जाये।

18 सितंबर 1985 को बड़े ही गुपचुप तरीके से भगवनजी के पार्थिव शरीर को अयोध्या के ‘गुप्तार घाट’ ले जाया गया। गौरतलब है गुप्तार घाट सरयू नदी का वही घाट है जहाँ त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने जलसमाधि ली थी। यह स्थान आर्मी के कैंट एरिया में आता है और वहां डोगरा रेजिमेंट की छावनी है। इस स्थान पर किसी भी प्रकार के अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं है किन्तु भगवनजी की इच्छानुसार उनका अंतिम संस्कार यहीं होना था।

शीघ्रता से सब बंदोबस्त कर के मात्र 13 लोगों की उपस्थिति में भगवनजी की चिता गुप्तार घाट पर हल्की हल्की रिमिझिम बूंदों के बीच सज गयी।

पंडा रामकिशोर, ने चिता पर भगवनजी की पार्थिव देह को रखा देखकर बड़े मार्मिक स्वर में कहा अब तो भगवनजी के मुखमंडल के अंतिम दर्शन कर निशानी के लिए एक फोटो ही ले लो…! किन्तु डॉ. मिश्र ने रोकते हुए कहा, क्या गुरु आज्ञा का उल्लंघन करोगे? देश में क्या तूफान लाना है। भगवनजी की साधना गुप्त थी। उनकी आज्ञा का सम्मान हो।

संयोग ही था चिता में अग्नि देते ही डोगरा रेजिमेंट की फायरिंग रेंज में फायरिंग प्रैक्टिस शुरू हो गयी। मानों भगवनजी के पूर्ववर्ती जीवन के प्रति सैन्य सम्मान देना प्रकृति ने स्वयं निर्धारित किया हो!

कुछ ही दिनों के भीतर कैंट एरिया के अंदर गुप्तार घाट पर हुये इस गुप्त दाह संस्कार की खबर अयोध्या में आग की तरह फैल गयी। पत्रकारों ने अयोध्या में गुमनाम ज़िंदगी गुजारने वाले भगवनजी को नया नाम दिया, गुमनामी बाबा।

आने वाले महीनों में जब सरकारी हस्तक्षेप के बाद राम भवन में भगवनजी के कमरों को खोला गया तो सब दंग रह गये। उनके कमरों से 28 ट्रंक/ बक्से भरकर समान निकला जिसमें अधिकतर भारत और विश्व के जियोपोलिटिकल स्थिति से संबंधित पुस्तकें थीं। कुछ हस्तनिर्मित नक्शे थे जिनमें 62 की लड़ाई में लखीमपुर के रास्ते चायना पर हमला किया जाए तो कौन सा रूट भारतीय सेना को लेना चाहिए इसकी विस्तृत जानकारी थी। बाद में सैन्य अधिकारियों ने जब नक्शा देखा तो आश्चर्य से कह उठे इस तरह का मिलिट्री स्ट्रेटेजिक मैप तो आर्मी का कोई टॉप कमांडर बन सकता है। टाइम मैगजीन और द स्टेट्समैन न्यूज़पेपर भी सामान में थे।

और थे बक्से भर भर के पत्र चिट्ठियां, जिनमे चौकाने वाली थीं डॉ संपूर्णानंद से लेकर, बाबू बनारसी दास, चौधरी चरण सिंह जैसे उत्तर प्रदेश के पांच पांच मुख्यमंत्रियों को लिखी चिट्ठियां जिनमें भगवनजी इन नेताओं के राजनीति संबंधी प्रश्नों के उत्तर और दिशा निर्देश दे रहे थे।

कुछ चिट्ठी RSS के द्वितीय सरसंघचालक गोलवलकर जी की भी थीं। गोलवलकर जी ने भगवन जी को पूज्यपाद श्रीमान विजयानंद जी महाराज संबोधित कर चरण स्पर्श किया था।

फिर देखने वालों को आश्चर्य हुआ जब भगवनजी के बक्से से नेताजी सुभाषचंद्र बोस के माता पिता की तस्वीर और आजाद हिंद फौज की वर्दी मिली। नेताजी की गोल डायल वाली सोने की रोलेक्स और ओमेगा घड़ियां और गोल फ्रेम के चश्में मिले। जर्मन मेड दूरबीन, इंग्लिश मेड टाइपराइटर, सिगार और पिस्टल मिलीं।

कोलकाता से आयीं नेताजी की भतीजी, ललिता बोस ने जब ये सामान और भगवनजी के लिखे पत्र देखे तो देखते ही कह उठीं ये तो उनके सुभाष चाचा की हैंडराइटिंग और सामान हैं।
यह सब सामान अब अयोध्या के ‘रामकथा संग्रहालय’ में सरकार द्वारा सुरक्षित रखवा दिए गए हैं।
भगवनजी के अंतिम संस्कार के समय उपस्थित लोगों की संख्या मात्र 13 थी। उस समय पंडा रामकिशोर और डॉ. मिश्र, डॉ. बनर्जी आदि ने सजल नेत्रों से कहा..

(आरती सिंह)

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