Wednesday, February 4, 2026
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UGC Controversy: बटेंगे तो कटेंगे ..लेकिन बांटेंगे तो ? – नई मुसीबत को न्योता दे दिया मोदी सरकार ने

UGC Controversy: भारत में आज के दौर में वैसे भी जातीय भेदभाव पहले जैसा नहीं है..पुलिस थानों और अदालतों में भी ऐसे मामले कम ही दिखाई दे रहे हैं, ऐसे में क्यों ये एकतरफा भेदभाव की नीति लागू की जा रही है ?

UGC Controversy: बर्र के छत्ते पर हाथ डालना किसी भी पार्टी के लिये खतरे से खाली नहीं..देखना होगा कि ऐसा क्या है यूजीसी की नई गाइड लाइन में जिसने नाराज कर दिया है सवर्ण समाज को?

देशभर के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में UGC की नई गाइडलाइंस को लेकर असंतोष बढ़ता जा रहा है। ऊपरी तौर पर इन नियमों का उद्देश्य जातिगत भेदभाव रोकना है, लेकिन छात्रों और शिक्षकों का मानना है कि ये प्रावधान असंतुलित हैं, अनुपयोगी भी हैं और इनका दुरुपयोग होने की आशंका बहुत अधिक है। सीधी तौर पर जनरल कैटेगरी के छात्रों को लग रहा है कि इन गाइडलाइंस से उन्हें निशाना बनाया जा सकता है।

नई गाइडलाइंस कब और क्यों लागू हुईं?

UGC ने 15 जनवरी 2026 से “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” लागू कर दिए। इन नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकना है। इसमें अब OBC को भी SC/ST के साथ जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है, जिससे विवाद और नाराजगी बढ़ गई है। लेकिन बात इतनी ही नहीं है।

आक्रोशित लोगों का कहना है कि प्रावधान न केवल एकतरफा हैं बल्कि उनमें सख्ती भी जरूरत से ज्यादा कर दी गई है जिससे लगता है कि इनका सही इस्तेमाल कम होगा, लेकिन बदले की भावना से शिकायतें ज्यादा होंगी।

पृष्ठभूमि: रोहित वेमुला & पायल तडवी केस से जुड़ा मामला

रोहित वेमुला की आत्महत्या और पायल तडवी केस ने दिखाया कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव मौजूद है। हालांकि, आज से तीस साल पहले तक ऐसी बातें सुनी जाती थीं पर आज के तकनीकी दौर में जब देश की भेड़िया-धसान जनसंख्या रोजी-रोटी की मारा-मारी में फंसी हुई है -इस तरह की नीतियां अप्रासंगिक हैं।

उपरोक्त दोनो मामलों को लेकर  सुप्रीम कोर्ट ने UGC को निर्देश दिया था कि 2012 के पुराने नियमों को मजबूत किया जाए। इसके बाद नई गाइडलाइंस तैयार की गईं ताकि SC/ST/OBC छात्रों को सुरक्षित माहौल मिल सके और उन्हें भेदभाव से बचाया जा सके। पर उसमें कहीं ये नहीं कहा गया था कि सवर्ण छात्रों को खलनायक बना दिया जाये -इस तरह से तो ये समाजिक भेदभाव का कानूनी चेहरा बन गया है।

संसदीय समिति की भूमिका

संसद की शिक्षा, महिला, बाल और युवा मामलों की समिति ने 8 दिसंबर 2025 को रिपोर्ट सरकार को सौंपी। ध्यान देने वाली बात ये है कि समिति के अध्यक्ष कांग्रेस के खारिज कर दिये गये नेता दिग्विजय सिंह थे। दिग्गी राजा जी को अध्यक्ष बना कर उनको साधा जा रहा था या ओबीसी-एससी-एसटी को -ये समझने वाली बात है। इस समिति ने नया सुझाव दिया या शायद इस समिति को सुझाव दिया गया कि OBC को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया जाए।

साथ ही Equity Committee में SC/ST/OBC का बहुमत हो और Disability को भी भेदभाव के आधार में जोड़ा जाए। इन सिफारिशों के बाद UGC ने फाइनल रेगुलेशंस में बदलाव किए और जनवरी 2026 में इन्हें नोटिफाई कर दिया।

ड्राफ्टिंग कमेटी के मुखिया दिग्गी

UGC की ड्राफ्टिंग कमेटी का नेतृत्व तत्कालीन चेयरमैन डॉ. विनीत जोशी ने किया। इसमें UGC के आंतरिक विशेषज्ञ और कमीशन सदस्य शामिल थे। दिग्गी राजा की अध्यक्षता वाली इस कमेटी से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है। कांग्रेसी दिग्गी राजा की पार्टी देश में जातिगत ही नहीं धार्मिक भेदभाव भड़का कर वोट कबाड़ने के लिये दुनिया में कुख्यात है।

विरोध क्यों हो रहा है?

देश के प्रधानमंत्री भी ओबीसी समुदाय से आते हैं। यह समुदाय वास्तव में पिछड़ा नहीं है जैसा वोटखोरी के मकसद से इसे दिखाया जाता है। अब जब ड्राफ्ट में OBC को रखा गया है तो विरोध तो लाजमी है।जनरल कैटेगरी के छात्र इसे “दूसरा SC/ST एक्ट” बता रहे हैं।

इसमें झूठी शिकायतों पर जुर्माने का प्रावधान हटाने से भी चिंता बढ़ी है। एक पक्ष को पीड़ित दिखा कर दूसरे पक्ष को जबर्दस्ती पीड़क सिद्ध किया जा रहा है। समाज में जातीय भेदभाव क्या कम है जो इस तरह से और बढ़ाया जा रहा है?

एकतरफा नियम-कानून के उदाहरण

मंडल कमीशन हो, वक्फ कानून हो, दहेज कानून हो, एससी-एसटी कानून हो – देश में नये यूजीसी कानून जैसे कई कानून पहले से मौजूद हैं जो एकतरफा बात करते हैं। देश के सवर्ण वर्ग का कहना है कि हमें अपनी ही सरकार से इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा नहीं थी। अब इससे देश की सामाजिक एकता तो टूट कर बिखरेगी ही, देश में राजनीतिक एकता का भी नाश हो सकता है।

 जनरल कैटेगरी की नाराजगी

उनका कहना है कि नये नियमों के माध्यम से सवर्ण वर्ग को पहले से ही दोषी मान लिया गया है। SC/ST/OBC को “पीड़ित वर्ग” मान लिया गया है, जबकि जनरल कैटेगरी के लिए कोई सुरक्षा नहीं है। जनरल कैटेगरी को पहले से ही कोई कोटा नहीं मिला है बाकी हर कैटेगरी लोटे में कोटे को लेकर चल रही है। एससी एसटी ओबीसी दिव्यांग महिला – कितने कोटे हैं लेकिन न किसी सवर्ण के लिये कोई कोटा है न किसी गरीब के लिये।

और तो और, इन रेग्युलेशन्स के लागू होने के बाद सवर्ण छात्राओं और छात्रों पर दिन-रात झूठे मुकदमें दर्ज होंगे, जो होने ही हैं, तो ऐसे में उनके बचाव का कोई प्रावधान नहीं है -झूठे मुकदमें करके फंसाने वाले लोगों के विरुद्ध कोई धारा नहीं लगाई जायेगी. स्पष्ट है कि सवर्ण छात्र, छात्राये, उनके माता-पिता, कॉलेज -यूनिवर्सिटीज़ के प्राध्यापक, प्राचार्य, कर्मचारी वर्ग सभी को निशाना बनाया जायेगा और उनको किसी तरह की सुरक्षा का कोई अधिकार नहीं होगा। क्या यही वो समता है जो सरकार चाहती है?

ये इम्प्लिसिट क्या बला है?

इस एकतरफा जबरन की नियमावली में यूजीसी ने एक्सप्लिसिट और इम्प्लिसिट दो स्थितियों का उल्लेख किया है। एक्सप्लिसिट तो समझ आता है, पर ये इम्प्लिसिट क्या चीज है? अगर किसी को लगा कि कहीं न कहीं कुछ न कुछ ऐसा हो रहा है कि सामने वाला उसका अपमान कर रहा है -तो वह सामने वाले पर तुरंत केस कर सकता है। इसको कहते हैं इम्प्लिसिट अटैक विद लाइसेन्सी गन।

साफ तौर पर यह आरक्षण जैसी एकतरफा नीति दिखाई दे रही है। इस एकतरफा नीति के दुरुपयोग पर विचार क्यों नहीं किया गया? झूठी शिकायतों से छात्र का करियर बर्बाद हो सकता है- उसकी भरपाई क्या सरकार करेगी ? – करेगी तो कैसे करेगी?

कॉलेजों और संस्थानों को क्या करना होगा?

हर संस्थान में Equity Committee बनानी होगी। इसमें SC, ST, OBC, महिलाएं और दिव्यांग प्रतिनिधि होंगे, लेकिन कोई जनरल कैटेगरी से नहीं होगा।

शिकायत मिलने पर 24 घंटे में प्राथमिक कार्रवाई और 15 दिनों में रिपोर्ट देनी होगी। शिकायत ऑनलाइन, ईमेल, लिखित या 24×7 हेल्पलाइन से दर्ज की जा सकेगी। और हां, गंभीर मामलों में पुलिस को सूचना देनी होगी। गंभीर मामले क्या होंगे – किस तरह के होंगे – ये सब कौन बतायेगा?

 गाइडलाइंस की मुख्य बातें

Equity Committee का गठन अनिवार्य। SC/ST/OBC के खिलाफ जातिगत भेदभाव को स्पष्ट परिभाषित किया गया।

शिकायतों के लिए 24×7 हेल्पलाइन और सख्त समय-सीमा। 24 घंटे में कार्रवाई और 60 दिनों में जांच पूरी करनी होगी।

नियमों का उल्लंघन करने पर संस्थान की मान्यता रद्द हो सकती है या UGC फंडिंग रोक सकता है। ये गाइडलाइंस 2012 के पुराने नियमों को नया मसाला मार कर अपडेट की गई हैं।

 प्रक्रिया और समय सीमा

ड्राफ्ट गाइडलाइंस फरवरी 2025 में जारी हुईं। फाइनल नियम 13 जनवरी 2026 को नोटिफाई हुए। पूरी प्रक्रिया में लगभग 11 महीने लगे।

 छात्रों पर कार्रवाई

शिकायत मिलने पर Equity Committee जांच करेगी। आरोपी छात्र पर चेतावनी, जुर्माना, निलंबन, डिग्री छीन लेना और निष्कासन अथवा अरेस्ट जैसी गंभीर कार्यवाही भी हो सकती है। गंभीर मामलों में छात्रावास से हटाना, परीक्षा से वंचित करना या संस्थान से निकालना या गिरफ्तारी संभव है। पुलिस केस बना तो सरकारी परीक्षायें, सरकारी नौकरी हाथ से जायेगी और करियर चौपट हो कर सौपट हो सकता है।

असंतुष्ट पक्ष 30 दिनों में Ombudsperson को अपील कर सकता है। संस्थान सभी शिकायतों का रिकॉर्ड रखेंगे। कोई किसी को झूठे केस में फंसायेगा तो उस फंसाने वाले पर कोई कार्यवाही नहीं होगी -क्योंकि इसका कोई उल्लेख नहीं है।

कुल मिला कर कहा जा सकता है कि 

UGC की नई गाइडलाइंस का उद्देश्य जातिगत भेदभाव रोकना है, लेकिन इसके आने से उलटा हो रहा है। अब देश भर के छात्रों में ही नहीं, आमजनों में भी जातिगत भेदभाव दिखाई देगा। आपसी नफरत पनपेगी और न जाने कितनी हिन्सक घटनायें सामने आयेंगी।

साफ जाहिर है कि इन एकतरफा गाइडलाइन्स के असंतुलित नियमों से जनरल कैटेगरी के छात्रों को समझ में आ रहा है कि उनको टारगेट किया जा रहा है और अब उनके विरुद्ध इन नियम-कानूनों का जबर्दस्त दुरुपयोग होने वाला है। यही कारण है कि देशभर में इस पर विवाद और विरोध बढ़ रहा है।

(प्त्रिपाठी पारिजात)

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