Saturday, January 24, 2026
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Unknown Gunmen: जब न्याय सोता है,तो बंदूकें जागती हैं – भारत आ गये अज्ञात बंदूकधारी

Unknown Gunmen: जब न्याय सोता है,तो बंदूकें जागती हैं: जनता की बेहद मांग पर विदेशों के बाद अब भारत में भी अज्ञात बंदूकधारी हुये सक्रिय..

Unknown Gunmen: जब न्याय सोता है,तो बंदूकें जागती हैं: जनता की बेहद मांग पर विदेशों के बाद अब भारत में भी अज्ञात बंदूकधारी हुये सक्रिय..

अहिल्यानगर में दिनदहाड़े सनसनीखेज शूटआउट हुआ जिसमें 2010 पुणे जर्मन बेकरी ब्लास्ट का सह-आरोपी बंटी जाहगीरदार मारा गया। इस शख्स को ‘अनजान’ हमलावरों ने भरी सड़क पर गोलियों से छलनी किया।

अहिल्यानगर (पूर्व में अहमदनगर) की शुक्रवार की दोपहर वैसे तो तेज़ धूप से तप रही थी, लेकिन श्रीरामपुर स्थित जर्मन हॉस्पिटल के मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर का माहौल उससे कहीं ज़्यादा सुलग रहा था। अस्पताल के सामने की व्यस्त सड़क पर अचानक दो मोटरसाइकिलें आकर रुकीं। दोनों बाइक सवारों ने हेलमेट पहन रखे थे, जिससे उनकी पहचान पूरी तरह छिपी हुई थी।

चश्मदीदों के अनुसार, यह पूरा घटनाक्रम कुछ ही सेकंडों में घटित हुआ। बाइक से उतरे दोनों हमलावर बेहद शांत और योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़े, कुछ क्षण रुके… और फिर ताबड़तोड़ गोलियों की बौछार शुरू हो गई। गोलियां सीधे 2010 पुणे जर्मन बेकरी बम धमाके के सह-आरोपी बंटी जाहगीरदार पर दागी गईं। देखते ही देखते वह सड़क पर लहूलुहान होकर गिर पड़ा और कुछ ही पलों में उसकी मौके पर ही मौत हो गई।

दर्जनों गंभीर मुकदमे, लेकिन सज़ा एक भी नहीं

बंटी जाहगीरदार, जिसका असली नाम असलम शब्बीर शेख था, केवल जर्मन बेकरी धमाके तक सीमित एक नाम नहीं था। उसके खिलाफ पुणे सीरियल ब्लास्ट (2012), हत्या, गंभीर मारपीट, जबरन वसूली, जान से मारने की धमकी और संगठित अपराध से जुड़े अनेक मामलों में एफआईआर दर्ज थीं। वर्षों से उसका नाम पुलिस के खतरनाक अपराधियों की सूची में बना हुआ था।

न्यायिक दस्तावेज़ों के अनुसार, 2002 से लेकर 2023 तक उसके खिलाफ कई संगीन आपराधिक मामले दर्ज किए गए। कुछ में उसे अदालत से बरी कर दिया गया, कुछ केस आज भी वर्षों से लंबित पड़े हैं, और कई मामलों में चार्जशीट तक पूरी नहीं हो पाई। प्रशासन ने उसकी ‘अत्यंत खतरनाक प्रवृत्ति’ को देखते हुए उसे कई जिलों से तड़ीपार भी किया था, क्योंकि आम नागरिकों और गवाहों के बीच उसके खिलाफ गवाही देने को लेकर जबरदस्त डर का माहौल बना हुआ था।

गवाहों का पलटना और सिस्टम की सुस्ती

जांच और सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि कई गवाह, जो अदालत के बाहर उसके खिलाफ खुलकर बयान देते थे, कोर्ट में पहुंचते ही या तो पूरी तरह चुप हो जाते थे या अपने पुराने बयान से पलट जाते थे। इससे न सिर्फ मामलों की सुनवाई लंबी खिंचती रही, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया भी कमजोर पड़ती चली गई।

जब सिस्टम चुप रहता है, तो ‘अज्ञात’ बोलते हैं

घटना के बाद पुलिस का आधिकारिक बयान वही पुराना है —
“दो अज्ञात बाइक सवारों द्वारा हमला किया गया है, जांच के लिए विशेष टीमें गठित कर दी गई हैं, हमलावरों की तलाश जारी है और फिलहाल हमले का उद्देश्य स्पष्ट नहीं है।”

लेकिन ज़मीनी हकीकत और जनता की जुबान कुछ और ही कहानी कह रही है। स्थानीय लोगों में यह भावना खुलकर सामने आ रही है कि:

“जो अदालत नहीं कर पाई, वो अज्ञात लोगों ने कर दिया।”

“सालों से लटके केस अब एक झटके में खत्म हो गए।”

भले ही यह सोच कानूनी दृष्टि से बेहद खतरनाक और गलत है, लेकिन यह न्यायिक व्यवस्था के प्रति जनता के भीतर गहराते अविश्वास की एक गंभीर और डरावनी तस्वीर पेश करती है।

समाज में बनती ‘शैडो जस्टिस सिस्टम’ की धारणा

जब अदालतों में तारीख़ पर तारीख़ पड़ती हैं, एजेंसियों पर राजनीतिक दबाव के आरोप लगते हैं, और गवाह डर के कारण बयान बदलते रहते हैं, तब समाज के एक हिस्से में यह खतरनाक धारणा पनपने लगती है कि “अज्ञात बंदूकधारी ही असली अदालत हैं” — जो बिना अपील, बिना बहस, सीधे फैसला सुना देते हैं।

यह घटना सिर्फ एक मर्डर नहीं, बल्कि भारतीय न्याय प्रणाली के सामने खड़े एक गहरे, असहज और गंभीर सवाल की तरह उभर रही है।

(प्रस्तुति – त्रिपाठी पारिजात)

 

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