West Bengal: बिहार की तरह ही जंगलराज का दूसरा उदाहरण भारत में पश्चिम बंगाल है..वामपंथी विष और मुस्लिम ‘तुष्टिकरण’ का कोढ़ पश्चिम बंगाल को लगभग खा ही गया है, अब आखिरी उम्मीद बीजेपी के मॉडल से ही है..
पश्चिम बंगाल पहले भारत का एक चमकता हुआ राज्य था। यहाँ की कला, सोच और उद्योग देश में सबसे आगे थी। कोलकाता को भारत की बुद्धि और ज्ञान की राजधानी कहा जाता था। बंगाल के कारखानों में लाखों लोगों को काम मिलता था। यहाँ कई महान राष्ट्रवाद लोग पैदा हुए, जिन्होंने देश को नई दिशा दी थी। इनमें बंकिमचंद्र, स्वामी विवेकानंद, अरविंदो, सुभाष चंद्र बोस और श्यामा प्रसाद मुखर्जी शामिल थे। इन्हीं राष्ट्रवादी लोगों ने भारत को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने का सपना दिखाया था।
लेकिन आज की तस्वीर बहुत अलग है। जो जमीन कभी तरक्की की मिसाल थी, वह अब पीछे रह गई है। बंगाल के युवा अब काम की तलाश में बाहर चले जाते हैं। गाँव सुनसान हो गए हैं क्योंकि काम करने वाले लोग घर छोड़ चुके हैं। राज्य के उद्योग बंद हो गए हैं। जो लोग व्यापार करना चाहते हैं, वे भ्रष्टाचार में फँस जाते हैं। यहाँ की राजनीति अब इस्लामी तुष्टिकरण की ओर झुक गई है। इससे यहाँ रहने वाले आम हिंदू लोगों की परेशानी और बढ़ गई है।
यह बर्बादी किस्मत का खेल नहीं है, बल्कि यह एक धोखा है। पहला धोखा कम्युनिस्टों ने दिया। उन्होंने बंगाल पर 34 साल राज किया और सब कुछ बर्बाद कर दिया। फिर ममता बनर्जी आईं। उन्होंने कम्युनिज़्म की जगह मुस्लिम तुष्टिकरण को अपनाया। इन दोनों ने मिलकर बंगाल की अर्थव्यवस्था और सम्मान को मिटा दिया। अब जो बचा है, वह बंगाल नहीं, जैसा पहले था। यह राज्य अब ‘माँ-माटी-मानुष’ से नहीं चलता। यह अब ‘माइग्रेंट, मिसरूल और ममता’ से चल रहा है। यानि पलायन, बदहाली और गलत नेतृत्व से।
वामपंथी अभिशाप: राष्ट्र से ऊपर वर्ग-युद्ध
34 साल तक लेफ्ट फ्रंट ने बंगाल पर राज किया। उन्होंने मार्क्सवादी सोच से लोगों का दिमाग भरा और उद्योगों को शोषण कहा। कारोबार को दुश्मन की तरह देखा। जो भी बंगाल में कारखाना लगाना चाहता था, उसे डराया गया। टाटा और बिड़ला जैसे बड़े उद्योगपति भी राज्य छोड़कर चले गए। हज़ारों फैक्ट्री बंद हो गईं। लाखों लोग बेरोज़गार हो गए। धीरे-धीरे गरीबी ने जड़ पकड़ ली और बंगाल की तरक्की रुक गई।
मार्क्सवादी सिर्फ उद्योगों के खिलाफ नहीं थे। वो देशभक्ति के भी विरोधी थे। उन्होंने हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाया। संस्कृति को भी नीचा दिखाया। उन्होंने दुर्गा पूजा को सिर्फ एक ‘लोक उत्सव’ कहा। लेकिन वो खुद लेनिन की पूजा करते रहे। उन्होंने लोगों के दिल से देश का गर्व निकाल दिया। देश में अवैध घुसपैठियों के लिए रास्ता खोल दिया।
2011 में जब ममता बनर्जी सत्ता में आईं। तब तक बंगाल बहुत बुरी हालत में था। मानो, जैसे कोई मरीज आखिरी साँसें गिन रहा हो। लेकिन ममता बनर्जी ने उसे संभालने की वजह हालात और बिगाड़ दिए। जो राज्य पहले से ही बीमार था, ममता की नीतियों ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया।
ममता का मुस्लिम तुष्टिकरण राज
ममता बनर्जी खुद को बंगाल की ‘दीदी’ कहती हैं। लेकिन सवाल ये है कि वो किसकी दीदी हैं? क्या वो उस बंगाली हिंदू मजदूर की दीदी हैं, जो केरल की ईंट भट्टियों में काम कर रहा है?क्या वो मालदा के उस बेरोजगार नौजवान की दीदी हैं, जो रोज़ काम की तलाश में भटकता है? या फिर वो बांग्लादेश से आए घुसपैठिए की दीदी हैं, जिसे राशन कार्ड, आधार और राजनीति का पूरा सहारा मिला है?
सच बहुत साफ़ है। ममता बनर्जी ने बंगाल को तुष्टिकरण का राज्य बना दिया है। त्योहारों पर करोड़ों रुपए खर्च होते हैं। यह पैसा संस्कृति के लिए नहीं, बल्कि वोट खरीदने के लिए दिया जाता है। जो लोग बांग्लादेश से गैरकानूनी तरीके से आए हैं, उन्हें आम नागरिकों से भी ज़्यादा सुविधाएँ मिलती हैं। मदरसों को बढ़ावा दिया जा रहा है। लेकिन नौजवानों को काम सिखाने वाली ट्रेनिंग पर ध्यान नहीं है। पुलिस का काम सुरक्षा देना है। लेकिन यहाँ पुलिस हिन्दुओं को नहीं बचाती, बल्कि हमला करने वालों को बचाती है।
ममता बनर्जी की पार्टी की सांसद सुष्मिता देव ने एक अजीब बात कही। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का बंगाल से बाहर काम कर रहे मजदूरों की जानकारी लेना ‘नस्लीय भेदभाव’ है। क्या सच में? जब लाखों बंगाली लोग बेरोजगारी के कारण घर छोड़कर बिहार जैसे राज्यों में मजदूरी कर रहे हैं, तब यह सरकार घुसपैठियों का बचाव कर रही है। अपने ही लोगों की मदद नहीं कर रही। इसे सरकार चलाना नहीं कहते। इसे धोखा कहते हैं।
जनसांख्यिकीय टाइम बम
बॉर्डर से जुड़े ज़िले जैसे मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर अब बदल चुके हैं। इन जगहों पर अब हिन्दू लोग अल्पसंख्यक बन गए हैं, यानि अपनी ही धरती पर वे अब कम संख्या में हैं। यह कोई अचानक हुआ बदलाव नहीं है। यह सब सरकार की योजना का हिस्सा है। यह वोट-बैंक बनाने के लिए किया गया है। घुसपैठियों को बसाकर वोट जुटाए जा रहे हैं और हिंदुओं पर हमला करवाकर उन्हें पलायन के लिए मजबूर किया जा रहा है। जिससे बंगाल की सत्ता ममता बनर्जी के इशारों पर ही चल सके।
हर हिन्दू बच्चा जो नौकरी की तलाश में बंगाल छोड़ता है, उसकी जगह एक घुसपैठिया आ जाता है। हर बार जब बंगाली हिन्दू पलायन करता है तो उसकी भरपाई बांग्लादेश से आए लोगों से होती है। इसका नतीजा साफ है। बंगाल के अंदर ही धीरे-धीरे एक नया बँटवारा हो रहा है। यह वही चेतावनी है जो आरएसएस ने बहुत पहले दी थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1947 में कहा था कि अगर तुष्टिकरण नहीं रोका गया तो हिन्दू अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाएँगे। आज ममता के बंगाल में वही बात सच होती दिख रही है। हिन्दू पीछे हट रहे हैं और घुसपैठिए बढ़ते जा रहे हैं।
पलायन की त्रासदी
किसी भी बिल्डिंग साइट को देखिए- चाहे वो बेंगलुरु हो, हैदराबाद या गुरुग्राम। वहाँ आपको बंगाली भाषा सुनाई देगी। ये युवक मुर्शिदाबाद, मालदा, बीरभूम और जलपाईगुड़ी से आए होते हैं। इन्हें मजबूरी में अपना घर छोड़ना पड़ा है। उनकी जमीन उन्हें पेट भरने लायक काम नहीं दे पाती। ये लोग शौक से नहीं, बल्कि मजबूरी से प्रवासी बने हैं।
बंगाल की हालत बहुत दुखद है। पहले बंगाल को ‘पूरब का मैनचेस्टर’ कहा जाता था। अब बंगाल सामान नहीं, बल्कि मजदूर बाहर भेजता है। यहाँ के पढ़े-लिखे युवा दिल्ली में ओला कैब चलाते हैं। जबकि बंगाल में घुसपैठिये सरकारी मदद पा रहे हैं। यह प्रवासन नहीं, अपमान है। ऐसे में ममता बनर्जी केंद्र सरकार को दोष देती हैं। बीजेपी को भी जिम्मेदार ठहराती हैं। ‘बाहरी लोगों’ को भी दोष देती हैं। इस बीच, पूजा के लिए करोड़ों रुपए खर्च करती हैं। अल्पसंख्यकों को खुश करने में भी पैसा लगाती हैं। यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं है। यह संस्कृति के साथ धोखा है।
सिंडिकेट राज: सरकार नहीं, माफिया
अगर बंगाल में कुछ भी अच्छा होने की थोड़ी भी उम्मीद थी, तो TMC ने उसे ‘सिंडिकेट राज’ से खत्म कर दिया। यहाँ कोई भी निर्माण कार्य, व्यापार, या छोटा-मोटा कारोबार तब तक नहीं हो सकता, जब तक TMC के सिंडिकेट को पैसा न दिया जाए। कोयला हो या रेत, स्कूल में नौकरी हो या स्वास्थ्य सेवा, सब कुछ एक माफिया की तरह यहाँ चलाया जाता है।
यहाँ तक कि नौकरियाँ भी बेची जाती हैं। SSC घोटाला, शिक्षक भर्ती घोटाला, और कोयला घोटाला- हर घोटाले से एक बात साफ होती है कि बंगाल को चलाया नहीं जा रहा, बल्कि उसे लूटा जा रहा है। व्यापारी भाग जाते हैं, क्योंकि कोई भी व्यापारी ऐसे नेताओं के साथ काम नहीं करना चाहता। जो नेता जैसे दिखते हैं, लेकिन असल में वह गुंडे हैं।
2011 से 2024 के बीच, 6600 से ज्यादा कंपनियाँ बंगाल छोड़ गईं। यह सिर्फ लोगों का जाना नहीं है, बल्कि एक तरह का पलायन है। बंगाल सिर्फ अपने लोगों को नहीं खो रहा, बल्कि अपनी उम्मीदें भी खो रहा है।
बीजेपी का रास्ता: गौरव और प्रगति साथ-साथ
अब बंगाल को BJP शासित राज्यों से तुलना करके देखते हैं। गुजरात में मोदी ने बड़े बदलाव किए। वहां बंदरगाह, सड़कें, बिजली के प्लांट और फैक्ट्रियाँ बनीं। इससे गुजरात भारत की आर्थिक ताकत बना। योगी के उत्तर प्रदेश को ही देख लीजिए, पहले ये एक बीमार राज्य था, लेकिन आज निवेश का केंद्र बन चुका है। यहाँ ग्लोबस समिट हो रहे हैं और एक्सप्रेसवे बन रहे हैं। असम में हिमंता सरकार ने गैरकानूनी घुसपैठ और बाल विवाह पर रोक लगाई। साथ ही, असम में आईटी पार्क, मेडिकल कॉलेज और विश्वविद्यालय बनाए गए। यह BJP का डबल इंजन वाला मॉडल है। यहाँ देशभक्ति और विकास साथ-साथ चलते हैं। संस्कृति में गर्व और अर्थव्यवस्था में समृद्धि। यह RSS की ‘समग्र मानवतावाद’ की सोच को साकार करता है।
यह वहीं प्रगति, विकास है जिसकी जरुरत बंगाल को है। बंगाल को अब मजदूर भेजने की बजाय सामान बेचना चाहिए। घुसपैठियों को खुश करने के बजाय, उसे अपने ही युवाओं को मजबूत बनाना चाहिए। त्यौहारों पर पैसा लुटाने के बजाय, बंगाल को कारखानों, नौकरियों और सम्मान की जरूरत है।
बंगाल की नियति: ममता का मुस्लिम तुष्टिकरण या बीजेपी का प्रगति
आज बंगाल एक चौराहे पर खड़ा है। एक तरफ ममता का रास्ता है, जहाँ सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण, घुसपैठ, पलायन और अपमान है। दूसरी तरफ बीजेपी का रास्ता है, जो विकास, राष्ट्रवाद, सम्मान और गौरव का वादा करता है। सवाल बहुत स्पष्ट है कि क्या बंगाल घुसपैठियों की कॉलोनी बनकर रहेगा या फिर से ज्ञान और प्रगति का केंद्र बनेगा। बंगाल ने भारत को बंकिम, विवेकानंद, सुभाष और श्यामा प्रसाद जैसे महान लोग दिए हैं।
क्या अब यह घुसपैठियों और माफियाओं के सामने हार मान लेगा या फिर एक राष्ट्रवादी सरकार के साथ मिलकर, गौरव और प्रगति के लिए फिर से खड़ा होगा। लोगों का पलायन किस्मत नहीं है, यह ममता के धोखे का नतीजा है। बंगाल का विकास न तो वामपंथ में है और न ही ममता में, बल्कि यह मोदी, योगी, हिमंता और RSS के ‘विकसित भारत’ के सपने में छिपा है। जब तक ऐसा नहीं होता, बंगाल अपनी दुखी हालत में फँसा रहेगा। यह ‘माँ-माटी-मानुष’ नहीं, बल्कि प्रवासी, कुशासन और ममता के भरोसे चलेगा।
(डॉक्टर प्रोसेनजीत नाथ)