Poetry by Manmeet Soni: कविता नहीं कविता से भी आगे बढ़ कर भाव चित्र बनाते हैं अपनी सुन्दर कलम से, मनमीत सोनी..देखिये एक और काव्य शिल्प..
जब वे फर्स्ट ईयर में आईं थीं
तब मैं उन्हें सिर्फ़ लड़कियां समझता था
पढ़ाता था उन्हें
पढ़ाने के सिवा मतलब नहीं रखता था
कोई बात भी करना चाहती थी
तो आड़े आ जाती थी :
मेरी पुरुष ग्रंथि!
वे
मुझे सर कहती थीं
लेकिन मैं उन्हें न बहनें समझ सका न बेटियां !
—
मैं
कभी-कभी यह भी सोचता था
कि किसी लड़की से दोस्ती हो जाए
तो क्या बुरा है
व्हाट्सअप पर चैटिंग
कोई बुरा ऑप्शन तो नहीं है
क्या फ़र्क़ पड़ता है
अगर दोस्ती गहरी हो जाए
और बहुत ही गहरी हो जाए
क्या आज से पहले
किसी टीचर का दिल नहीं आया
अपनी स्टूडेंट पर
अपने व्यभिचार के लिए
हज़ारों मॉडर्न तर्क थे मेरे पास
—
मैं
एक अच्छा “टीचर” था
जिसे हिंदी में “अध्यापक” कहते हैं
लेकिन मैं
एक अच्छा “गुरु” नहीं था
जिसके लिए
अंग्रेजी में कोई शब्द नहीं होता –
यहाँ तक कि
दुनिया की किसी भाषा में नहीं होता !
—
सेकंड ईयर आते आते
सबके व्हाट्सअप नंबर आ गए थे मेरे पास
कोई मैसेज करती थी : “नोट्स मिल जाएंगे क्या सर”
कोई मैसेज करती थी : “कल छुट्टी है क्या सर”
कोई मैसेज करती थी : “आप बहुत अच्छा पढ़ाते हैं”
कोई मैसेज करती थी : “आपका बनाया हुआ पेपर ही आया”
मैं
इन मैसेजेस के प्रति भी
कोई बहुत ईमानदार नहीं था
मैं
बहुत जवान था
मेरी शादी नहीं हुई थी
मैं हर लड़की में ढूंढता था सपनों की रानी
और
नाक़ामी ही मेरा मुक़द्दर थी
—
थर्ड ईयर आते-आते
बहुत खुल गई थीं यही लड़कियां
कभी-कभी तो
ऐसे मज़ाक़ भी कर लेती थीं
जैसे मेरी स्टूडेंट्स नहीं
बल्कि सालियाँ हों!
इसी बीच
शादी हो गई मेरी
पहली बार चखा
किसी देह को आपादमस्तक
भोग में प्रवीण हुआ
कुंठाएं तिरोहित हुईं
मन मुक्त हुआ मेरा
मैं सक्षम हुआ :
किसी कुंवारी लड़की को बहन या बेटी कहने में!
—
आज
जब विदा हो रहीं हैं यह बच्चियां कॉलेज से
और फेयरवेल का फंक्शन चल रहा है
मैं उन्हें अकेले में सबसे दूर ले जाता हूँ
और बड़ी विनम्रता से पूछता हूँ :
“क्या मैं आप लोगों की एक फ़ोटो ले सकता हूँ?”
“क्या मैं फेसबुक पर इसे कविता के साथ पोस्ट कर सकता हूँ?”
और हंसती हैं बच्चियां :
सर! ये क्या बात कह दी आपने / अभी ले लीजिये!
—
आँखों में
गंगाजल से भी पवित्र आँसू की दो बूँदें लिए
निहारता जाता हूँ
इन थर्ड ईयर की बच्चियों को
जिन्हें लड़कियों से बच्चियां समझने में
मुझे तीन बरस की कठोर तपस्या लगी
—
सोचता हूँ
काश मेरा पहला बच्चा
एक बच्ची हो
उसे बड़ा करूँ
उसे कपड़े दिलाऊं
उसे तरह तरह से सजाऊं
उसे कॉलेज भेजूँ
उसे कोई प्यार करे
वह भी किसी को प्यार करे
उसकी शादी करूँ
अपने जंवाई को कार दूँ
अहा!
यह मेरा मध्यमवर्गीय आदर्शवादी मन!
—
तुम्हारी फ़ोटो को
ब्लर कर रहा हूँ बच्चियों
कांट्रास्ट बढ़ा रहा हूँ
ब्राइटनेस इंक्रीज़ कर रहा हूँ
ताकि तुम्हें कोई पहचान न सके
किसी भी शैतान की
बुरी नज़र न पड़े तुम पर
तुम सुरक्षित लौटो अपने घर
टैक्सी में
स्कूटी में
बस में या रेल में!
—
अब तक
जितनी भी लड़कियों से मिला हूँ मैं
वे सब
मेरी बहन बेटियां होती हैं आज
आगे जिन भी लड़कियों से मिलूंगा मैं
वे भी मेरी बहन बेटियां हो गईं हैं
अपने लंगोट को
कपास का नहीं
लोहे की पतली चद्दर से सिलता हूँ आज
वह धर्म निभाता हूँ
जो देवताओं और ऋषियों के बस का भी नहीं
एक सच्चा मनुष्य बनने के यज्ञ में
देता हूँ
अपनी वासनाओं की समिधा
आग के शोले से
पौंछता हूँ
अपने माथे पर आया हुआ पसीना
—
बेटियों,
व्हाट्सअप करती रहना
चाहे जितनी दूर भी चली जाना
याद आना मुझे
याद करना मुझे
और कभी मत समझना
कि पीहर और ससुराल के अलावा
तुम्हारा कोई तीसरा घर नहीं है..
याद रखना
इस असिस्टेंट प्रोफेसर मनमीत को
बेटियों,
आज मैं
तुम्हारा पिता हुआ हूँ
मुझसे जो माँगना है मांग लो!
(मनमीत सोनी)