Poetry by Manmeet Soni: साहित्य की दुनिया का अविष्कार और कविता की दुनिया का चमत्कार हैं मनमीत सोनी, जिनसे मन प्रश्न करता है – लिखते हो या क्रान्ति करते हो भाई?..
यह भी एक बाज़ार है
जिसमें पुरुष सदियों-सदियों से
दीवारों से सर भिड़ा रहे हैं
और उन्हें अब तक वह चीज़ हाथ नहीं लगी है
जो उन्हें स्त्रियों में धंसने में
“परफेक्ट” और “मास्टर” बना दे!
—
कितने ख़ुश हुए थे पुरुष
जब 1980-1990 में सिदेनीफिल साइट्रेट के परीक्षण के दौरान
यह पाया गया कि इससे पुरुष लिंग में तनाव आता है
दुनिया भर के पुरुषों में
ख़ुशी की लहर दौड़ गई थी
उन्होंने समझा था
कि अब वे किसी भी स्त्री पर कब्ज़ा कर सकते हैं!
—
यह जादुई नीली टिकिया
धड़ाधड़ बिकती है बाज़ार में
स्वयं से हारे हुए पुरुष
इसकी एक खूराक लेकर
चढ़ाई कर देते हैं स्त्री नाम के रूई के ढेर पर :
लेकिन सुखद दाम्पत्य की
यह भी कोई ख़ास गारंटी नहीं है!
—
आयुर्वेद तो खोज ही चुका है –
घोड़े की गंध वाली अश्वगंधा
स्वर्ण भस्म
शिलाजीत
सफ़ेद मूसली
केसर
कौच
गोक्षुर
जायफल
लौंग
इलायची
लहसुन
अदरक
और भी न जाने क्या क्या
लेकिन स्त्री का हृदय
अब भी नहीं पिघलता
वह धज्जियाँ उड़ा देती है “आर्गेज़्म” की
अगर वह सबसे पहले
गीली पलकों को चूमने के ज़रिये नहीं आया हो!
—
होम्योपैथिक दवाइयों का तो कहना ही क्या
वे तो लक्षणों पर चलती हैं
और सभी पुरुषों के लक्षण एक जैसे हैं :
“ढीलापन”
“उत्तेजना में कमी”
“इच्छा नहीं होती”
“इच्छा तो होती है लेकिन होता नहीं”
“थकान हो जाती है”
“स्त्रियों से बात करते हुए धात निकल जाता है”
फिर दी जाती हैं
लाइकोपोडियम
एग्नस कास्टस
नक्स वोमिका
सेलेनियम
कैलेडियम
डेमियाना जैसी दवाइयाँ
लेकिन मीठी गोलियों को चूस कर भी
फीके रह जाते हैं चुम्बन
स्त्रियों को
होम्योपैथिक दवाइयों से जीतने की इच्छा रखने वाले
बरसों तक दवाइयाँ बदलते रहते हैं
लक्षणों के आधार पर!
—
कम नहीं है यूनानी भी
वहाँ तो ढेर लगा है दवाइयों का
मैं तो नाम पढ़ते हुए शब्द-सौंदर्य से ही नहीं उबर पाया
असबगोल रोमि
सलाब मिसरी
मग़्ज़ अखरोट
मग़्ज़ पिस्ता
मग़्ज़ बादाम
खसक
अकरकरा
मुसली सियाह
इलायची खुर्द
अंबर
कस्तूरी
जाफ़रान
मूसली सफ़ेद
अहा! यह सुंदर-सुंदर सोने के हरिण जैसे नाम :
लेकिन घरेलू सीताओं को
कोई अंतर नहीं पड़ता
कि उनके घरेलू राम किस लंका के रावण को
धूल चटा कर शाम को घर लौटे हैं
कोई माई का लाल नहीं बता सकता
कि क्या चाहिए स्त्रियों को
माँसल पेशियां या आँसू भरी आँखें?
—
कितना विज्ञान
कितनी कला
कितना दर्शन
कितना अर्थशास्त्र
ख़र्च हो गया सिर्फ़ इस बात पर :
कि पुरुष स्त्री में कैसे धंसे
कि कितनी देर तक धंसा रहे
कि कितनी देर तक मचाता रहे एक सात्विक उत्पात स्त्री की देह में!
—
आह!
यह महान धरती
जिस पर मैं चलता हूँ
तो वीर्य की चिकनाई और स्त्रियों के ख़ून के चलते फिसल जाता हूँ
यह सभ्यता
हज़ारों बरस की सभ्यता
सिर्फ़ इस बात पर कुर्बान की जा सकती है
कि स्त्री में कुछ ऐसा है
जो हज़ारों साल बाद भी पुराना नहीं हुआ है
और पुरुषों में भी कुछ ऐसा है
कि स्त्रियों ने बलात्कार झेल कर भी
भरोसा बनाए रखा है पुरुषों पर
—
मेरे पास ऐसा कुछ भी नहीं
जिससे मैं
इस सुंदर धरती की नज़र उतार सकूं
यह मेरा नवविवाहित जीवन
इस सुंदर धरती के नीले चेहरे पर
काजल का टीका बन जाए
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता
कि कब खोजी जाएगी वह दवाई
जो स्त्री-पुरुष संबंधों में रामबाण साबित होगी
लेकिन इतना तो तय है
कि पुरुषों के पसीने और स्त्रियों के आंसुओं का
अभी कोई स्थानापन्न नहीं!
—
आह!
मैं अपने हृदय को
बीच से चीर कर
लहू की एक धार से पौंछना चाहता हूँ सारे दाग़ धब्बे
कोई ऐसा टोटका करना चाहता हूँ
कि लगातार पैदा होते रहें बच्चे
कि लगातार मरते रहें बूढ़े
कि लगातार बिकती रहे वायग्रा
कि आयुर्वेद को प्रमोट करता रहे “आयुष”
कि होम्योपैथी पर ढीली-ढाली ही सही
आश्वस्ति बनी रहे!
—
स्त्रियो!
तुम्हारा हृदय अविजित रहे
उसे कोई न जीत सके
तुम पुरुष को विश्वास दिलाओ
कि उसने तुम्हें जीत लिया है
लेकिन पुरुष के मन में हमेशा यह धुकधुकी रहे
कि “त्रिया चरित्र” का क्या भरोसा?
(हालांकि “त्रिया चरित्र” एक बेहद बकवास बात है)
स्त्रियो!
इतनी ही गुप्त
इतनी ही बदनाम
इतनी ही सुंदर
इतनी ही अप्रत्याशित रहना
स्त्रियो!
वैज्ञानिक तुम्हारे मस्तिष्क की थाह नहीं पा सकते
कवि तुम्हारे सौंदर्य की परिक्रमा करते हुए मर जाएंगे
दार्शनिक तुम पर मिटते रहेंगे और कोसते भी रहेंगे
अर्थशास्त्री तुम्हारे आस-पास ही रचेंगे हर बाज़ार
खिलाड़ी तुम्हें रिझाने के लिए ही बहाएंगे पसीना
स्त्रियो!
इतने रिश्तों में
इतनी सतहों पर
इतनी किस्तों में
बार-बार टूटती और जुड़ती रहना..
कि कोई नहीं है तुम जैसा
कि शिव से भी हट जाए “इ” की मात्रा
तो शव है वह!
—
लोग हँसते हैं
जब रोडवेज की बस या रेल या दीवार पर देखते हैं
किसी हकीम के फ़ोन नंबर
पोस्टर पर लिखा होता है :
“ढीलेपन / धात की समस्या / नपुंसकता का एक पट्टी द्वारा पक्का इलाज”
लेकिन तुम मत हँसना स्त्रियो!
तुम नहीं जानती
इसी पोस्टर की फ़ोटो लेकर गुज़रा है कोई
ऐलोपैथी / आयुर्वेद / होम्योपैथी / यूनानी का मारा
इसी नंबर में ढूंढता है
खांसी की दवाई के नशे में चूर
कोई गरीब अपनी रात का सहारा –
—
आह!
यह मेरा बेचैन मन
डूबता जाता है
डूबता ही जाता है
किसी स्त्री की याद में –
काश!
स्त्रियों में धंसने की कोशिश करने वाले पुरुषों को
सिखा सकता
स्त्रियों की आँखों में डूबना
और
बिस्तर पर
भाप बनकर सूखती जा रही स्त्रियों को
सींच सकता
उनके रूप, गंध और देहयष्टि पर मुग्ध उन्हीं पर लट्टू
उनके प्रियतमों के माथों पर
इस डर से उभर आई पसीने की बूँदों से :
“आज रात सेक्स नहीं हुआ तो वो मेरे बारे में क्या सोचेगी”?
—
ऐसा क्या करूँ
कि मैं ही बन जाऊं वह दवाई
जो अब तक बनाई या खोजी नहीं जा सकी –
कवि मनमीत!
कोशिश करो
कोशिश करते रहो
तुम वह दवाई बन सकते हो!
(मनमीत सोनी)



