Tuesday, March 3, 2026
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Poetry by Manmeet Soni: “प्रिय कामरेड! हमारे प्रधानमंत्री को कोई ट्रम्प नहीं उठवा सकता”

 Poetry by Manmeet Soni: भावों के महाबलि कवि मनमीत सोनी को पढ़िये राष्ट्रभक्ति की सुरभि के अद्भुत वातावरण में..

 Poetry by Manmeet Soni: भावों के महाबलि कवि मनमीत सोनी को पढ़िये राष्ट्रभक्ति की सुरभि के अद्भुत वातावरण में..

प्रिय कामरेड!
ट्रम्प की औक़ात नहीं है कि वह मोदी को उठा ले
हम तो
लालू और ममता बैनर्जी तक को भी ट्रम्प को नहीं उठाने देंगे
असदुद्दीन ओवैसी तक को भी नहीं
यह सब हमारे लोग हैं
हमारे चुने हुए
बैलेट पेपर पर ठप्पा लगाकर
ईवीएम का बटन दबाकर
तर्जनी अंगुली को
नीली स्याही से सुहागन करवा कर चुने हुए लोग
इन्हें उठाना तो दूर
खरोंच भी नहीं आने देंगे
प्रिय कामरेड!
हम तो तुम पर भी आंच नहीं आने देंगे
तुम हमारे सगे हो
हालाँकि तुम्हारे सारे कारनामे परायों जैसे हैं!

1975 में
उस तथाकथित दुर्गा की
तानाशाही के आगे भी नहीं झुका हमारा लोकतंत्र
मुंडियां मोड़ दी थीं
उस दुर्गा ने
अमेरिका की पनडुब्बियों की
हवाई जहाजों के बेड़े लौटा दिए थे हवा की हवा में
हाथ काट दिए थे
पश्चिमी पाकिस्तान जैसे आतंकी सरगना के!

प्रिय कामरेड!
दिन में सपना नहीं देखते
और वह भी भारत की तबाही का सपना तो बिलकुल नहीं देखते
उस पचपन बरस के
घर घुस्सू राजकुमार को समझाओ
कि यह पचपन सौ बरस पुरानी सभ्यता है
सिकंदर लौटते रहे हैं ख़ाली हाथ
नालंदाओं के भस्म हो जाने पर भी
एक प्रतिशत कम नहीं हुआ
हमारा महान साहित्य और ज्ञान
फतेह सिंह और जोरावर सिंह को
दीवारों में चुन देने के बाद भी
इतिहास में हारा हुआ हुआ बरामद होता है
औरंगज़ेब जैसा राक्षस
कोई भगत नाम का बच्चा
मिट्टी उठा लेता है जलियाँवाला बाग़ की
उसे चेहरे पर पोत लेता है
कोई खुदीराम बोस
उन्नीस बरस की उम्र में फंदा चूम लेता है
प्रिय कामरेड!
तुम तो फिर भी दलाल हो
दलालों के साथ तो
ख़ुदा भी इन्साफ़ नहीं करता..

प्रिय कामरेड!
पूँजी को
लोगों में बराबर बांटने की योजना बनाते बनाते
भारत को
टुकड़ों में बांटने की साज़िश क्यों करने लगे..?
तुम्हें पता ही नहीं
कि हिन्दू होना
एक विश्व नागरिक होना है
कि जो भी आदमी
दूसरे आदमी के बारे में सोचता है
उसे ही हिन्दू कहते हैं
हिन्दुओं के देश का
एक चुना हुआ नेता
किसी शक्तिशाली भूरे बंदर से नहीं उठवाया जा सकता
हम ऐसे भूरे बंदरों को
हनुमान जी के मंदिर के बाहर
अपनी हथेली में भुने हुए चने खिलाते आए हैं!
—-
प्रिय कामरेड!
तुम इस देश से नाराज़ हो
कि उमर खालिद को नहीं मिली जमानत
तो याद रखो
कि जब तक जेल में है
तभी तक सुरक्षित है वह जिहादी गुंडा
यह न्यायपालिका
अभी इतनी भ्रष्ट नहीं हुई है
कि बिके हुए वकीलों पर अंधा भरोसा कर ले..
उमर खालिद का गुस्सा
मोदी पर मत निकालो प्रिय कामरेड
वैनेज़ुयेला के मादुरो की तुलना
मत करो उससे
कि जिसे जनता ने चुना है अपनी इच्छा से
हमारा चुना हुआ शासक
हम पर तब तक शासन करेगा
जब तक हमारा विश्वास नहीं हार जाता
लेकिन तुम कौन हो प्रिय कामरेड?
तुम पर तो
एक सीट का भी भरोसा नहीं जनता को!
—-
प्रिय कामरेड!
अगर ईश्वर को नहीं मानते
तो ईश्वर से प्रार्थना क्यों कर रहे हो
कि ट्रम्प मोदी को उठा ले
तुम्हारा ईश्वर
कितना मतलबी है प्रिय कामरेड!
प्रिय कामरेड!
बचाएंगे तुम्हें
तुम्हारे अंत तक
किसी और के हाथों नहीं
तुम्हारे ही हाथों देखेंगे तुम्हारा अंत
कि जाग उठी है
सदियों की सोई हुई राख़
आग की गोदी में
बदल रही है करवट!

काश!
तुम एक बर्तन होते कामरेड
तो उस राख़ से
बर्तन की तरह मांज देता तुम्हें –
तुम्हें
तुम्हारा ही विकृत चेहरा दिखाता
थोड़ी भी शर्म और गैरत होती
तो बचा लेता तुम्हें
अपनी ही नज़रों में गिर जाने से!

वैसे इतिहास यही कहता है
कि कोई भी कामरेड
अपनी नज़र में नहीं गिर सकता –
आत्मा कहाँ होती है कामरेड में?
वह तो माँस का लोथड़ा होता है
घिनौना
बदबूदार
सड़ा हुआ
गलीज़! 
(मनमीत सोनी)
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