Wednesday, February 4, 2026
Google search engine
Homeसाहित्यUmakant Dixit presents: वीर तुम अड़े रहो, रजाई में पड़े रहो...

Umakant Dixit presents: वीर तुम अड़े रहो, रजाई में पड़े रहो !

Umakant Dixit presents: हर मौसम में देश के लोगों के बीच भेद मतभेद हो सकते हैं..सरदी के मौसम में सब एक होते हैं क्योंकि सरदी की मार सब पर धारदार बराबर पड़ती है..

Umakant Dixit presents: हर मौसम में देश के लोगों के बीच भेद मतभेद हो सकते हैं..सरदी के मौसम में सब एक होते हैं क्योंकि सरदी की मार सब पर एकसार धारदार पड़ती है..

 

वीर तुम अड़े रहो, रजाई में पड़े रहो !

ठंड ही ठंड है,
यह बड़ी प्रचंड है,
कक्ष शीत से भरा,
बर्फ से ढकी धरा,
यत्न कर संभाल लो,
यह समय निकाल लो,

वीर तुम अड़े रहो, रजाई में पड़े रहो !

चाय – चाय मची रहे,
पकौड़ियाँ सजी रहे,
मुंह कभी थके नहीं,
रजाई भी हटे नहीं,
लाख मिन्नतें करे,
स्नान से बचे रहो,

वीर तुम अड़े रहो, रजाई में पड़े रहो !

एक प्रण किए रहो,
रजाई मे घुसे रहो,
तुम निडर डटो वहीं,
पलंग से हटो नहीं,
मातृ की लताड़ हो,
या पितृ की दहाड़ हो

वीर तुम अड़े रहो, रजाई में पड़े रहो !

बधिर बन सुनो नहीं,
निष्कर्म से डरो नहीं,
प्रातः हो कि रात हो,
संग हो न साथ हो,
पलंग पर पड़े रहो,
तुम वहीं डटे रहो,,

वीर तुम अड़े रहो, रजाई में पड़े रहो !

(रजाईधारी सिंह ‘दिनभर’)

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments