Poetry by Manmeet Soni: मनमीत सोनी की कविता मात्र कविता नहीं होती, यह किसी भी शीर्षक के अन्तर्गत सभ्यता और मानवता की दिशा में मार्गदर्शन भी होती है..
तुम्हें शायद यह ग़लतफ़हमी हो सकती है
कि मनमीत तुमसे जलता है
लेकिन ख़ुदा की क़सम मेरे दोस्त
न मुझे ग़ज़ल कहनी आती है
न मुझे उर्दू लिखनी पढ़नी आती है
न मुझे दुबई जाने का कोई शौक है
मैं तो चूरू से बस में बैठकर
जयपुर जाना भी पसंद नहीं करता!
—
लेकिन पिछले कुछ दिनों से
तुम कुछ बदल गए हो मेरे दोस्त
अब तुम थोड़े कम हिन्दू
अब तुम थोड़े ज़्यादा मुसलमान हो गए हो
कई बार तो ऐसा लगता है
कि तुम्हें इस बात है अफ़सोस है
कि तुम नरेन्द्र या सुरेश या रोहित या आयुष क्यों हो?
जबकि तुम्हारा नाम
इक़बाल या रौशन या आफ़ताब या सलमान होना चाहिए था!
—
पहले तुम बातों बातों में कह देते थे
कि राहत इंदौरी हो या मुनव्वर राणा या मंज़र भोपाली
या नवाज़ देओबंदी ही क्यों न हो
इन्होंने बड़े सलीके से
लखनऊ से भोपाल
आज़मगढ़ से मुर्शिदाबाद
जयपुर से दिल्ली
कलकत्ता से अमरावती तक
बहुत नफ़रत फैलाई है
वरना क्या ज़रूरत थी
राहत इंदौरी को यह कहने की :
“घुटनों से काम जब लिया ही नहीं / तो फिर घुटनों में दर्द कैसा है”
वरना क्या ज़रूरत थी
मुनव्वर राणा को यह कहने की :
“हमारे घर के इक बर्तन पर आईएसआई लिखा है”
वरना क्या ज़रूरत थी
मंज़र भोपाली को यह कहने की
“हाथ फैलाए मुसलमान बुरा लगता है”
और इनकी तो बात ही क्या
दुबई जा कर तो
आंटा खा जाती हैं
चरण सिंह “बशर” और राजेश रेड्डी तक की ज़ुबानें
—
ख़ैर!
अब तुम बदल गए हो दोस्त
अब तुम कनाट प्लेस, दिल्ली
या मोची का बास, सीकर के
वो लौंडे नहीं रह गए हो जो यह कहता था :
चाहे शायरी में नुक़सान उठाना पड़े / लेकिन झूठ नहीं बोलूंगा!
—
बहुत अच्छी है दुबई
अल्लाह करे ज़ोरे कलाम और ज़्यादा
बुर्ज़ खलीफा से बुलंद हो तुम्हारा क़द
लेकिन उस रावण की ऊंचाई को भूल मत जाना
जिस पर भगवान राम को तीर मारते हुए देखकर
तुमने पहला मिसरा कहा था!
मेरे दोस्त!
बहुत अच्छी है दुबई
वहाँ कभी सलीम ज़ाफ़री नाम का शख़्स
जश्न ए जॉन एलिया, जश्न ए मजरूह, जश्न ए कैफ़ी आज़मी मुनक्किद करता था
लेकिन बहुत ख़राब भी है दुबई
कि उन्हीं मुशायरों में बैठा करता था
मुंबई को बारूद से ख़ाक कर देना वाला वह कायर दाऊद इब्राहिम
यह वही दुबई है
जहाँ धूल उड़ती थी कभी
जहाँ गधे और ऊंट बहुतायत में पाए जाते थे
यह वही दुबई है
जहाँ बॉलीवुड की हीरोइनों को
एक रात साथ सोने के लिए बुलाया जाता था
और अंडरवर्ल्ड तय करता था
कौनसी फ़िल्म का कौन प्रोडयुसर और डायरेक्टर होगा
जहाँ के शेखों को
उर्दू से कोई मतलब न था
वो थोपना चाहते थे अरबी पूरे संसार पर
वे
पाकिस्तान को कुत्ते का पिल्ला
और हिंदुस्तान को
मरियल गाय का गोश्त कहते थे!
—
मेरे दोस्त!
दुबई ज़रूर जाना
लेकिन अपने क़स्बे की मिट्टी भर लेना जेब में
उसे बिखेर देना उस रेत पर
ज़ार ज़ार रोना
कि उसी ज़मीन से बशीर बद्र ने यह ऐलान किया था :
“फ़ाख्ता की मजबूरी यह भी कह नहीं सकती / कौन सांप रखता है उसके आशियाने में”
—
मेरे दोस्त!
तख़ल्लुस कुछ भी रख लेना
लेकिन नाम मत बदल लेना अपना
कि यह जो नाम है तुम्हारा
इस नाम में बोलता है तुम्हारे माता पिता का प्यार
कि इस नाम से जानते हैं
तुम्हें तुम्हारे अज़ीज़ दोस्त और रिश्तेदार
कि यही नाम
तुम्हें क़ब्र नहीं
बल्कि चिता नसीब करेगा!
—
मैं फिर कहता हूँ
मैं तुमसे जल नहीं रहा
मैं चूरू में मज़े से हूँ
लिख रहा हूँ फेसबुक पर
चाहने वालों तक पहुँच रहा हूँ चुपचाप
मेरी पंक्तियाँ
दोहराई जा रही हैं पूरे हिंदुस्तान में
और यह सब मेरी शर्तों पर हो रहा है
कि मैंने नहीं किया “मनमीत” नाम को “सलमान”
कि मैंने नहीं किया “सोनी” सरनेम को “फ़राज़ या जोश या मुसाफ़िर”
—
दुबई जा रहे हो दोस्त!
ज़रूर जाओ
मगर वहाँ जाकर यह मत कहना
कि मैं यह शेर
हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों के नाम कर रहा हूँ
यह मत कहना
कि हमारा मुल्क़भी आपके मुल्क़ जैसा है
कराची और इस्लामाबाद जैसे आतंकी अड्डों को
दिल्ली और मुंबई से मत तौल देना दोस्त
ताकि शायरी में
तुम्हारा कैरियर बचा रहे :
हिंदुस्तान को दांव पर मत लगा देना पागल लड़के!
—
मैं फिर कह रहा हूँ
कि यह ग़लतफ़हमी मत पाल लेना
कि मनमीत तुमसे जलता है!
दुबई जा रहे हो
बेशक जाओ
मगर लौट के यहीं आना है
भूल मत जाना!
(मनमीत सोनी)