Brahmos ने रक्षा की देश की – उल्टी कर दी चीन की शातिर चाल – दुश्मन की मेहनत के बर्बाद हुए कई साल..
भारत की एक्सटेंडेड रेंज ब्रह्मोस-ए मिसाइल ने चीन के उन सभी सीक्रेट एयरबेस को निशाने पर ले लिया है जो हिमालय की आड़ में बने थे। जानिए कैसे सुखोई बिना चीनी सीमा में घुसे 800 किमी दूर तबाही मचा सकता है।
जरा सोचिये – कोई इंसान सालों मेहनत करे, अरबों रुपये खर्च करे, पहाड़ों के पीछे छुपकर जाल बिछाए… और फिर एक दिन अचानक पता चले कि उसका सारा प्लान उसी के ऊपर उल्टा पड़ गया। यही हुआ है चीन के साथ। और मजा ये है कि उसे खुद अभी तक ठीक से हजम नहीं हो रहा होगा।
चीन ने भारत की सीमा के पास – खासकर LAC यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा के आसपास – कई बड़े-बड़े मिलिट्री एयरबेस खड़े किए। ये काम रातोरात नहीं हुआ। इसमें सालों लगे। पैसा बेतहाशा बहाया गया। और सबसे बड़ी बात – चीन को पूरा भरोसा था कि हिमालय की ऊंची-ऊंची पहाड़ियां उसे बचाती रहेंगी। उसके कमांडर बैठे सोचते थे कि भारत के फाइटर जेट इन तक पहुंच ही नहीं पाएंगे। पर भाई, हिसाब गलत निकला।
ब्रह्मोस-ए आई और सब बदल गया
भारतीय वायुसेना ने एक ऐसा दांव खेला जिसकी शायद किसी ने उम्मीद नहीं की थी। सुखोई Su-30MKI – जो वैसे भी दुनिया के सबसे खतरनाक लड़ाकू विमानों में गिना जाता है – उसे अब एक्सटेंडेड रेंज ब्रह्मोस-ए मिसाइल से लैस कर दिया गया है। और इस मिसाइल की मारक रेंज? पूरे 800 किलोमीटर।
मतलब सीधा समझो – सुखोई को चीन की हवाई सीमा में घुसने की कोई जरूरत ही नहीं। वो भारत की अपनी एयरस्पेस में आराम से उड़ता रहे, और ब्रह्मोस मिसाइल जाकर चीन के एयरबेस पर कहर बरपाए। ये वाली बात चीन की नींद उड़ाने के लिए काफी है।
सैन्य रणनीतिकार इसे “स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक कैपेबिलिटी” कहते हैं। मतलब – दुश्मन के दरवाजे तक जाने की जरूरत नहीं, घर बैठे मार करो। और ब्रह्मोस इसी काम में माहिर है।
किन-किन चीनी एयरबेस पर मंडरा रहा है खतरा?
अब बात करते हैं उन ठिकानों की जो भारत की इस नई ताकत के दायरे में आ चुके हैं।
ल्हासा गोंগগार – तिब्बत में बना यह एयरबेस सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के बिल्कुल करीब है। चीन की नजर में यह उसका सबसे अहम मिलिट्री बेस था। पर अब? सीधे सुखोई की रेंज में है।
शिगात्से – नेपाल और सिक्किम की सीमा के नजदीक। इसे भी चीन बड़े रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहता था। अब यह भी असुरक्षित है – बिना भारत की सीमा पार किए भी।
न्यिंगची – अरुणाचल प्रदेश की सीमा से बिल्कुल लगा हुआ। पूर्वी मोर्चे पर चीन का यह बेस ब्रह्मोस के नक्शे पर एकदम साफ दिखता है।
नगारी गुंसा – उत्तराखंड और लद्दाख के पास। यह बेस भी भारतीय एयरस्पेस के भीतर से ही आसानी से तबाह किया जा सकता है।
बांग्दा – तिब्बत के पहाड़ी और दुर्गम इलाके में छुपा हुआ यह बेस भी अब ब्रह्मोस-ए की पकड़ से बाहर नहीं।
होतान – लद्दाख के उत्तर में शिनजियांग की तरफ। यह बड़ा चीनी बेस भी भारत की बढ़ी हुई मारक क्षमता के सामने पूरी तरह नंगा हो चुका है।
छह के छह बेस। सब एक ही झटके में दायरे में।
चीन का एयर डिफेंस? वो भी काम नहीं करेगा
चीन अपने हवाई सुरक्षा तंत्र की बड़ी-बड़ी बातें करता है। रडार सिस्टम, मिसाइल डिफेंस, फाइटर पेट्रोल्स – सब। पर असलियत यह है कि ब्रह्मोस की रफ्तार के सामने ये सब चीजें बहुत हद तक बेकार हो जाती हैं।
ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल है। एक बार सुखोई से छूट जाए तो यह इतनी तेजी से उड़ती है कि चीनी रडार तक ठीक से रिस्पॉन्ड नहीं कर पाते। इंटरसेप्ट करना – यानी हवा में रोकना – लगभग नामुमकिन है। और जब तक चीन कुछ समझे, मिसाइल अपना काम कर चुकी होती है।
इसका एक और बड़ा फायदा है। भारतीय पायलटों को चीनी मिसाइलों या उनके गश्ती विमानों का सामना ही नहीं करना पड़ेगा। अपनी सीमा में रहो, मिशन पूरा करो, वापस आ जाओ। सीधा-साफ।
यह सिर्फ हथियार की बात नहीं – यह मनोवैज्ञानिक चोट है
डिफेंस एक्सपर्ट्स एक और बात कह रहे हैं जो बहुत जरूरी है। यह सिर्फ मिसाइल बनाम एयरबेस की कहानी नहीं है। यह चीन के दिमाग पर एक बहुत गहरी चोट है।
जो एयरबेस चीनी सेना को अजेय लगते थे – जिन पर उन्हें गर्व था, जिनके बारे में वे यह सोचते थे कि भारत इन तक कभी पहुंच ही नहीं सकता – वो अब एक झटके में कमजोर पड़ गए हैं। पहाड़ों की आड़ में छुपे थे, पर ब्रह्मोस ने वो आड़ भी हटा दी।
जब कोई देश यह सोचे कि उसके सैन्य ठिकाने सुरक्षित हैं और अचानक उसे पता चले कि वो सुरक्षित नहीं – तो यह झटका बहुत गहरा होता है। रणनीति बदलनी पड़ती है। हिसाब-किताब फिर से करना पड़ता है। और सबसे बड़ी बात – अगला कदम उठाने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है।
यही तो भारत चाहता था।
हिमालय अब चीन का ढाल नहीं रहा
कभी हिमालय को चीन अपनी सबसे बड़ी ताकत मानता था। ऊंचे पहाड़, दुर्गम रास्ते, खराब मौसम – यह सब मिलकर एक कुदरती दीवार बनाते थे। चीन ने इसी दीवार के पीछे अपने मिलिट्री बेस खड़े किए। यह सोचकर कि कोई इन तक आसानी से नहीं पहुंच पाएगा।
पर ब्रह्मोस ने सोच बदल दी। 800 किलोमीटर रेंज के सामने पहाड़ क्या चीज है? मिसाइल को पहाड़ से होकर नहीं जाना – वो ऊपर से गुजर जाती है। सीधे निशाने पर।
अब आगे क्या?
भारत की यह बढ़ती ताकत सिर्फ एक मिसाइल की कहानी नहीं है। यह पूरे हिमालयी क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति को एक नए स्तर पर ले जाने की कहानी है। Su-30MKI और ब्रह्मोस-ए का यह कॉम्बिनेशन शायद अब तक का सबसे घातक “स्टैंड-ऑफ” हथियार है जो भारत के पास है।
चीन के लिए सबक यह है कि अब वो भारत के खिलाफ कोई भी कदम उठाने से पहले यह जरूर सोचेगा कि उसके अपने ठिकाने कितने सुरक्षित हैं। और जवाब? उतना अच्छा नहीं जितना वो सोचता था।
ड्रैगन ने जाल तो बहुत सोच-समझकर बिछाया था। पर अब वो खुद उसी में उलझ गया है।
(मंजू सिंह)




