Dhar Bhojshala वस्तुतः एक ऐतिहासिक विजय है भारतवर्ष में सनातन की और यह उपलब्धि अपने अयोध्या राममन्दिर से किसी भी तरह कम नहीं है..
धार मे जो भोजशाला का निर्णय आया है वो उतना ही ऐतिहासिक है जितना अयोध्या का राम मंदिर। इसे तवज्जो नहीं मिल रही क्योंकि हिन्दुओ ने कभी इस जमीन को वैसे नहीं खोया जैसे अयोध्या मे गवा दिया था।
आपको एक हजार साल पीछे जाना होगा ज़ब मध्यप्रदेश मे परमार वंश का शासन था, धार इनकी राजधानी थी और भोपाल शहर की स्थापना का काम चल रहा था। उस समय राजा भोज शासक थे, उन्हें माँ सरस्वती ने सपने मे दर्शन दिये।
राजा भोज बैचेन हो गए, उन्ही दिनों धार मे कुछ जैन मुनि आये हुए थे जिन्होंने राजा की चिंता जानकर उन्हें सुझाव दिया कि वे वाघदेवी का मंदिर तथा गुरुकुल बनवाये क्योंकि सरस्वती ज्ञान की देवी है। राजा तैयार हुए मूर्ति पूजा और स्थापना का कार्य जैन मुनियो को ही दे दिया और तब मुनिजन एक ऐतिहासिक मूर्ति लेकर आये।
कहा जाता था कि ये 22वे तीर्थकर भगवान नेमिनाथ द्वारा बनाई अम्बिका यक्षिणी की प्रतिमा थी, दरसल जैन संप्रदाय मे माँ सरस्वती का यह पर्याय नाम है। राजा भोज मूर्ति देखकर खुश हो गए और जैन मुनियो को बड़ी जगह उपलब्ध करा दी। मुनियो ने मंदिर स्थापित किया और गुरुकुल बनाया जो एक प्रकार से मध्यप्रदेश का नालंदा था।
लेकिन ज़ब इस्लाम भारत आया और खिलचियों के माध्यम से मध्यप्रदेश तक पहुंचा तो मंदिर तोड़ दिया गया, स्थायी हिन्दुओ ने अपना खून बहाया लेकिन अपने मंदिर को बचा नहीं सके। मुसलमानो ने गुरुकुल के एक हिस्से को मस्जिद मे बदल दिया, अब पूजा अर्चना बंद हो चुकी थी।
हिन्दू बसंत पंचमी के दिन इसके खंडित शिखर को दूर से देखकर पूजते रहे, फिर 400 साल बाद अंधेरा छटा, सूरज निकला और पेशवा बाजीराव ने धार को मुगलो से आजाद करा दिया। पवार वंश को धार की सूबेदारी मिली और इस तरह प्राचीन मंदिर का उद्धार किया गया।
गुरुकुल तो दोबारा स्थापित नहीं हो पाया मगर जैन मुनियो ने सत्संग शुरू कर दिये, बसंत पंचमी पर वाघदेवी की पूजा शुरू हो गयी। इस तरह हिन्दू 400 साल बाद अपने मंदिर मे जा सका।
अम्बिका यक्षिणी की जो मूर्ति गायब हो गयी थी वो भी एक खुदाई मे मिल गयी, लेकिन अंग्रेजो की नजर इस पर पड़ गयी थी। वे वाघदेवी की मूर्ति लंदन ले गए जो आज भी वही रखी है, ये अंग्रेजो के काका की सम्पत्ति नहीं है बल्कि भगवान नेमिनाथ की धरोहर है जिसे वापस लाने का प्रयास हो रहा है।
गुस्सा इस बात पर भी आता है कि आजादी के बाद मानो दोबारा मुग़ल सल्तनत आ गयी थी क्योंकि मुसलमानो को नमाज का अधिकार दे दिया गया था। खैर अयोध्या की तर्ज पर धार को भी न्याय मिला और अब यह सिर्फ मंदिर ही है, इसकी चर्चा ज्यादा नहीं होंगी क्योंकि माँ सरस्वती के नाम पर उतने वोट नहीं मिलते जितने राम के नाम पर मिले।
जैन समाज की आबादी कम है जो है उनमे से कई लोगो को पता भी नहीं है कि यह स्थान जैन मत के लिए कितना आवश्यक है। अभी तो लड़ाई और लम्बी है, ज़ब तक वाघदेवी की प्रतिमा भारत नहीं आ जाती हम इसे पूर्ण विजय नहीं मान सकते। बस इतना है कि शुक्रवार को बसंत पंचमी आएगी तो अपने ही मंदिर के लिए लड़ना नहीं पड़ेगा।
मोहन यादव का यू तो आलोचक हूँ मगर इस बार गुड जॉब, मुख्यमंत्री तुरंत धार पहुंचे और योजनाओं की घोषणा कर दी। ये दिखावा नहीं था क्योंकि धार यात्रा अचानक ही हुई थी, ये धर्म के प्रति समर्पण है और श्रद्धांजली है उन मुनियो को जिन्होंने वाघदेवी के लिए अपने प्राण न्योछावर किये।
(परख सक्सेना)



