India Vs US: मोदी-ट्रंप की मुलाकात के पूर्व सामने आई अमेरिका की भारत-विरोधी सोच – इंडो-पैसिफिक से ‘इंडो’ शब्द हटाकर दिया रणनीतिक संदेश भारत को..
फ्रांस में पीएम नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात से पहले अमेरिका ने इंडो-पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर फिर से पैसिफिक कमांड कर दिया है। इस फैसले के रणनीतिक और कूटनीतिक मायनों को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
मोदी-ट्रंप मुलाकात से पहले अमेरिका का बड़ा कदम, इंडो-पैसिफिक कमांड का नाम बदलने पर उठे सवाल
फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है। दोनों नेताओं के बीच कई महत्वपूर्ण वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है। मगर इस बहुप्रतीक्षित बैठक से ठीक पहले अमेरिका के एक फैसले ने नई बहस छेड़ दी है।
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने अपनी प्रमुख सैन्य कमान “इंडो-पैसिफिक कमांड” का नाम बदलकर फिर से “पैसिफिक कमांड” कर दिया है। यह फैसला सामने आते ही रणनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कई विशेषज्ञ इसे सिर्फ प्रशासनिक बदलाव मान रहे हैं, जबकि कुछ लोगों का मानना है कि इसके पीछे बड़ा भू-राजनीतिक संदेश भी छिपा हो सकता है।
आखिर क्या बदला है?
अमेरिका की यह सैन्य कमान दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय सैन्य संरचनाओं में गिनी जाती है। इसका मुख्यालय हवाई में स्थित है और इसकी जिम्मेदारी हिंद महासागर से लेकर प्रशांत महासागर तक फैले विशाल क्षेत्र की सुरक्षा और सैन्य गतिविधियों की निगरानी करना है।
इसी कमान के अंतर्गत अमेरिकी नौसेना का प्रसिद्ध सातवां बेड़ा भी आता है। यह वही बेड़ा है जिसका नाम 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भी चर्चा में आया था।
करीब आठ वर्ष पहले अमेरिका ने इस कमान का नाम बदलकर “यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड” कर दिया था। उस समय इसे भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी का प्रतीक माना गया था। अब अचानक “इंडो” शब्द हटाकर पुराने नाम की वापसी ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्यों अहम माना जा रहा है यह फैसला?
सामान्य तौर पर देखें तो यह सिर्फ नाम बदलने जैसा कदम लगता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रतीकों और संकेतों का महत्व काफी बड़ा होता है।
इंडो-पैसिफिक की अवधारणा पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच रणनीतिक सहयोग का आधार बन चुकी है। यही सोच आगे चलकर QUAD जैसे समूहों की मजबूत नींव बनी।
ऐसे में जब अमेरिका अपनी सैन्य कमान के नाम से “इंडो” शब्द हटाता है तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या वाशिंगटन की प्राथमिकताएं बदल रही हैं? क्या अब उसका ध्यान हिंद महासागर की तुलना में प्रशांत क्षेत्र पर अधिक केंद्रित होगा?
हालांकि इन सवालों के जवाब फिलहाल स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन रणनीतिक विशेषज्ञ इस कदम का बारीकी से विश्लेषण कर रहे हैं।
पेंटागन ने क्या सफाई दी?
अमेरिकी रक्षा विभाग ने इस फैसले को लेकर आधिकारिक स्पष्टीकरण भी जारी किया है।
पेंटागन का कहना है कि यह बदलाव किसी नई रणनीति या नीति का संकेत नहीं है। विभाग के अनुसार इसका उद्देश्य ऐतिहासिक सैन्य विरासत को सम्मान देना और उस पहचान को फिर से स्थापित करना है जो दशकों तक इस कमान से जुड़ी रही।
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि नाम बदलने से कमान के अधिकार क्षेत्र, सैन्य मिशन, संचालन प्रणाली या जिम्मेदारियों में कोई बदलाव नहीं होगा। यानी हिंद महासागर और प्रशांत महासागर दोनों ही पहले की तरह इसके दायरे में बने रहेंगे।
ट्रंप के पहले कार्यकाल में हुआ था बड़ा बदलाव
साल 2018 में डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान अमेरिका ने “यूएस पैसिफिक कमांड” का नाम बदलकर “यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड” कर दिया था।
उस समय तत्कालीन अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने इस फैसले को बेहद महत्वपूर्ण बताया था। उनका कहना था कि यह बदलाव भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका और हिंद महासागर तथा प्रशांत महासागर के बीच बढ़ती रणनीतिक कनेक्टिविटी को दर्शाता है।
तब अमेरिका यह संदेश देना चाहता था कि भारत सिर्फ दक्षिण एशिया तक सीमित शक्ति नहीं है, बल्कि पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा संरचना में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
यही वजह है कि अब पुराने नाम की वापसी को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई हैं।
क्या भारत-अमेरिका रिश्तों से जुड़ा है यह फैसला?
पिछले कुछ महीनों में भारत और अमेरिका के बीच कई मुद्दों पर मतभेद देखने को मिले हैं। व्यापारिक शुल्क, वैश्विक सुरक्षा, पश्चिम एशिया की स्थिति और दक्षिण एशियाई राजनीति जैसे विषयों पर दोनों देशों के दृष्टिकोण हमेशा पूरी तरह समान नहीं रहे हैं।
इसी दौरान कुछ ऐसे बयान भी सामने आए जिनमें अमेरिकी नेतृत्व ने पाकिस्तान की भूमिका की सराहना की। इन घटनाओं के बाद कई विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देशों के संबंधों में पहले जैसी सहजता फिलहाल दिखाई नहीं दे रही।
हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि कमान का नाम बदलना सीधे तौर पर भारत को संदेश देने के लिए किया गया है। इसके बावजूद समय को देखते हुए इस फैसले को लेकर अटकलों का दौर तेज हो गया है।
QUAD और इंडो-पैसिफिक रणनीति पर क्या असर पड़ेगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नाम बदलने से QUAD या इंडो-पैसिफिक रणनीति पर तत्काल कोई व्यावहारिक असर नहीं पड़ेगा।
भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच सुरक्षा सहयोग, समुद्री निगरानी, आपदा प्रबंधन और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े कार्यक्रम पहले की तरह चलते रह सकते हैं।
फिर भी यह बदलाव प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कई बार छोटे दिखने वाले कदम भी बड़े राजनीतिक संदेश देने का काम करते हैं।
मोदी-ट्रंप मुलाकात पर बढ़ी नजरें
अब सबकी नजर फ्रांस में होने वाली मोदी और ट्रंप की मुलाकात पर टिकी हुई है। माना जा रहा है कि दोनों नेता व्यापार, रक्षा सहयोग, हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा, तकनीकी साझेदारी और वैश्विक चुनौतियों समेत कई अहम विषयों पर चर्चा करेंगे।
ऐसे समय में अमेरिका द्वारा अपनी सैन्य कमान का नाम बदलना निश्चित रूप से चर्चा का विषय बन गया है। आने वाले दिनों में यह साफ हो सकता है कि यह केवल प्रशासनिक निर्णय था या फिर इसके पीछे कोई व्यापक रणनीतिक सोच भी मौजूद है।
फिलहाल इतना तय है कि इस कदम ने भारत-अमेरिका संबंधों और इंडो-पैसिफिक रणनीति को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है। दुनिया के रणनीतिक विशेषज्ञ अब इस फैसले के दूरगामी प्रभावों पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।
पेंटागन ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि यह बदलाव ऐतिहासिक और प्रशासनिक कारणों से किया गया है तथा कमान की भूमिका, अधिकार क्षेत्र और जिम्मेदारियों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। इसलिए इसे लेकर विभिन्न विश्लेषणों और राजनीतिक व्याख्याओं को तथ्यात्मक दावों के बजाय विशेषज्ञों की राय के रूप में देखा जाना चाहिए।
(त्रिपाठी पारिजात)



