Tuesday, July 21, 2026
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Hunger Strike: शरीर कब देने लगता है जवाब भूख हड़ताल में – जानिए किडनी, दिल, दिमाग और लीवर पर भूख का खतरनाक असर

आमरण अनशन के दौरान सबसे पहले कौन सा अंग होता है खराब? जानिए भूख की हर स्टेज में शरीर के अंदर क्या-क्या होता है

आमरण अनशन के दौरान शरीर में क्या बदलाव होते हैं? किडनी, दिल, दिमाग, लिवर और पाचन तंत्र पर इसका क्या असर पड़ता है? जानिए भूख हड़ताल के हर चरण, ऑर्गन फेलियर, डिहाइड्रेशन, रिफीडिंग सिंड्रोम और इससे जुड़े गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों की पूरी जानकारी।

आमरण अनशन में शरीर कब देने लगता है जवाब? जानिए किडनी, दिल, दिमाग और लिवर पर भूख का सबसे खतरनाक असर

देश में जब भी कोई बड़ा आंदोलन या विरोध प्रदर्शन होता है, तब आमरण अनशन का नाम सबसे पहले सामने आता है। यह विरोध जताने का ऐसा तरीका है, जिसमें व्यक्ति अपनी मांगों को मनवाने के लिए भोजन छोड़ देता है और कई बार पानी भी नहीं पीता। देखने में यह केवल खाना छोड़ने जैसा लगता है, लेकिन मेडिकल साइंस बताती है कि लंबे समय तक भूखे रहना शरीर के लिए बेहद गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है।

इन दिनों सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के लंबे अनशन की चर्चा पूरे देश में हो रही है। लगातार कई दिनों तक भोजन न लेने के कारण उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया है। डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा है। स्वास्थ्य संबंधी शुरुआती जानकारियों के अनुसार उनके शरीर में ब्लड शुगर का स्तर गिरा है, पोटैशियम कम हुआ है, एनीमिया के संकेत मिले हैं और सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या भी सामान्य से कम पाई गई है। लगातार वजन घटने के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण अंगों पर भी दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

यहीं से एक बड़ा सवाल उठता है। आखिर लंबे समय तक भूखा रहने पर शरीर के अंदर क्या-क्या बदलाव होते हैं? सबसे पहले कौन सा अंग प्रभावित होता है? क्या केवल वजन कम होता है या शरीर धीरे-धीरे अंदर से टूटने लगता है?

दरअसल, आमरण अनशन केवल भोजन न करने का नाम नहीं है। यह शरीर की पूरी जैविक व्यवस्था को चुनौती देने वाली स्थिति बन जाती है। शुरुआत में शरीर अपने पास जमा ऊर्जा का इस्तेमाल करता है, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है, वह अपने ही ऊतकों और मांसपेशियों को तोड़कर ऊर्जा बनाने लगता है। यही वह समय होता है जब कई अंगों पर गंभीर असर दिखाई देने लगता है।

पहले 24 से 48 घंटे – शरीर अपने भंडार से ऊर्जा निकालता है

अनशन शुरू होने के बाद शुरुआती एक-दो दिन तक शरीर पूरी तरह असहाय नहीं होता। उसके पास पहले से जमा ग्लूकोज और ग्लाइकोजन मौजूद होता है। ग्लाइकोजन मुख्य रूप से लिवर और मांसपेशियों में जमा रहता है और जरूरत पड़ने पर यही शरीर की पहली ऊर्जा बनता है।

इसी दौरान ब्लड शुगर धीरे-धीरे कम होने लगती है। व्यक्ति को कमजोरी महसूस होने लगती है। कई लोगों को सिरदर्द, चक्कर, बेचैनी, अत्यधिक थकान और चिड़चिड़ापन भी महसूस होता है। दिमाग को पर्याप्त ग्लूकोज नहीं मिलने पर ध्यान लगाने में दिक्कत आने लगती है और सामान्य काम भी कठिन लगने लगते हैं।

तीसरे दिन से शरीर बदल देता है अपनी रणनीति

जब ग्लाइकोजन का भंडार लगभग खत्म हो जाता है, तब शरीर के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है कि वह ऊर्जा कहां से लाए।

यहीं से शरीर जमा चर्बी यानी फैट को तोड़ना शुरू करता है। फैट के टूटने से कीटोन बॉडी बनती हैं। यही कीटोन दिमाग समेत कई अंगों के लिए ऊर्जा का नया स्रोत बन जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया को मेडिकल भाषा में कीटोसिस कहा जाता है।

हालांकि यह प्रक्रिया शरीर को कुछ समय तक जीवित रखने में मदद करती है, लेकिन इसके कई दुष्प्रभाव भी सामने आते हैं। वजन तेजी से घटने लगता है। कुछ लोगों को उल्टी जैसा महसूस होता है। सांस से एसीटोन जैसी तेज गंध आने लगती है। बेचैनी और कमजोरी लगातार बढ़ती जाती है।

एक से दो सप्ताह बाद शुरू होती है सबसे खतरनाक स्थिति

अगर अनशन लगातार जारी रहता है तो शरीर के पास मौजूद फैट भी धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। अब शरीर के पास ऊर्जा बनाने का केवल एक रास्ता बचता है – अपनी ही मांसपेशियों को तोड़ना।

यहीं से असली संकट शुरू होता है।

मांसपेशियां तेजी से गलने लगती हैं। हाथ-पैर कमजोर हो जाते हैं। शरीर का संतुलन बिगड़ने लगता है। कई लोगों के लिए बिना सहारे खड़ा होना भी मुश्किल हो जाता है। सीढ़ियां चढ़ना, चलना या सामान्य काम करना बेहद कठिन हो जाता है।

याद रखने वाली बात यह है कि शरीर केवल हाथ-पैर की मांसपेशियां ही नहीं तोड़ता, बल्कि कई जरूरी अंगों की मांसपेशियां भी प्रभावित होने लगती हैं।

एक महीने के बाद बढ़ जाता है ऑर्गन फेलियर का खतरा

अगर भूख हड़ताल तीन से छह सप्ताह या उससे भी अधिक समय तक चलती है, तो शरीर के लगभग सभी महत्वपूर्ण सिस्टम प्रभावित होने लगते हैं।

रोग प्रतिरोधक क्षमता तेजी से गिरती है। मामूली संक्रमण भी जानलेवा साबित हो सकता है। शरीर नई कोशिकाएं बनाने में असमर्थ होने लगता है। घाव भरने की क्षमता कम हो जाती है।

डॉक्टरों के अनुसार इसी चरण में कई मरीजों में मल्टी ऑर्गन फेलियर का खतरा काफी बढ़ जाता है।

सबसे पहले कौन सा अंग प्रभावित होता है?

यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि केवल एक ही अंग सबसे पहले खराब होता है। भूख का असर लगभग पूरे शरीर पर एक साथ पड़ना शुरू हो जाता है। फिर भी कुछ अंग ऐसे हैं जिन पर इसका प्रभाव सबसे तेजी से दिखाई देता है।

किडनी पर क्यों आता है सबसे ज्यादा दबाव?

लंबे समय तक पर्याप्त भोजन और पानी नहीं मिलने से शरीर में पानी की मात्रा कम होने लगती है। यही डिहाइड्रेशन किडनी के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाता है।

किडनी का काम शरीर से विषैले पदार्थ बाहर निकालना होता है। जब पानी कम होता है तो ये जहरीले तत्व शरीर में जमा होने लगते हैं। यूरिक एसिड बढ़ सकता है। किडनी स्टोन बनने की संभावना बढ़ जाती है। गंभीर मामलों में किडनी फेलियर तक की नौबत आ सकती है।

यही कारण है कि लंबे अनशन के दौरान डॉक्टर सबसे पहले किडनी की कार्यक्षमता पर लगातार नजर रखते हैं।

लीवर पर भी बढ़ता है भारी बोझ

ऊर्जा बनाने की पूरी प्रक्रिया में लिवर की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।

जब शरीर लगातार फैट और प्रोटीन को तोड़कर ऊर्जा बनाने की कोशिश करता है तो लिवर पर काम का दबाव कई गुना बढ़ जाता है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो फैटी लिवर, सूजन और गंभीर मामलों में लिवर फेलियर जैसी समस्या भी सामने आ सकती है।

(त्रिपाठी पारिजात)

 

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