Poetry by Manmeet Soni: तिलचट्टों के षडयन्त्र पर मनमीत सोनी की ये कविता उनको उनकी ही भाषा में सीधा जवाब है..
चुने हुए प्रधानमंत्री को गाली देकर
वह यह समझता है
उसने गुलाम भारत के वायसराय को गाली दी है
शिक्षा मंत्री की बात करते हुए
वह अपने लिंग की ओर इशारा करता है –
कहता है :
मेरी झांट का बाल है शिक्षा मंत्री!
अपनी ही पुलिस का सर फोड़ता है
तो इतना ख़ुश होता है
जैसे सरहद पर
दुश्मन से ख़ून-ख़राबा करके आया हो
सुट्टा मारने के बाद
फेसबुक पर लाइव ऐसे करता है
जैसे रविश कुमार हो
और अभी मैगसेसे मिल जाएगा
दिल्ली पहुँचने की अपील ऐसे करता है
जैसे ख़ुद गाँधी ने
पुनर्जन्म लेकर
भारत छोड़ो आंदोलन के लिए उसे पर्सनल कार्ड भेजा हो
कैमरे के सामने
कभी चीखता है
कभी चिल्लाता है
कभी बेहोश होता है
कभी नारे लगाता है
जिस भी आदमी को देखता है
उसकी कॉलर पकड़ लेता है
कहता है :
इधर आ बे यू फ़किंग फासिस्ट!
ढफली ऐसे बजाता है
जैसे कोई खाया पिया अघाया अय्याश
अपना भरा हुआ पेट बजाता हो
पत्थर फेंकता है
जैसे सतौलिया खेल रहा हो
लोकतंत्र की ईंट से ईंट बजाता है
माँ-बाप के भेजे हुए पैसों से
विद्रोह नहीं
विद्रूप का अश्लील उत्सव रचाता है
और नंगा होकर
फैल जाता है बीच सड़क पर
इससे बेहतर जीवन में
कुछ ख़ास नहीं कर पाया
यह भी जानता है कि ख़ास कुछ नहीं कर पाएगा
इसलिए ढूंढता है
अपनी प्रासंगिकता दिल्ली के जंतर मंतर पर
हे भगवान!
ज़ेन जी के बजाय
इस भारत माता को
बाँझ रखता
तो ज़्यादा भला होता तेरा!!!



