आज जब कांग्रेस मुख्यालय पर बंकिम चंद्र चटोपाध्याय रचित “वन्दे मातरम” गाया – बजाया जा रहा था तो श्री राहुल गाँधी, श्री मल्लिकार्जुन खड़गे और श्रीमती सोनिया गाँधी इस तरह व्यवहार करने लगे जैसे उनके पांवों पर लाल चींटियाँ चढ़ गई हों।
मैंने इससे पहले फुटबाल और क्रिकेट के मैचों और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों की इतनी सारी विडियो खंगाली लेकिन मैंने किसी भी राष्ट्र के किसी भी नेता / नेत्री द्वारा अपने ही देश के गान / गीत को अपमानित करते हुए नहीं देखा।
आज जो हुआ वह कल्पना से परे है, शर्मनाक है और हृदय को तोड़ देने वाला है।
लेकिन आश्चर्यजनक बिलकुल नहीं है।
—
यदि पंद्रह अगस्त को राष्ट्रगीत नहीं गाया बजाया जाएगा तो कब गाया बजाया जाएगा? क्या कांग्रेस मुख्यालय पर
“इल कैंटो डेगली इटालियानी” गाया बजाया चाहिए था, जो कि इटली का राष्ट्रगान है, जिसे गोफ्रेडो मामेली ने लिखा और मिशेल नोवारो ने संगीतबद्ध किया?
क्या कांग्रेस ने अधिकारिक रूप से अपने आचरण द्वारा यह स्वीकार कर लिया है कि वह बंकिम दादा रचित वन्देमातरम को स्वीकार नहीं करती? क्या कांग्रेस भी वही दलीलें देगी, जो कुछ अल्पसंख्यक देते हैं या भारत के टुकड़े – टुकड़े करने का इरादा रखने वाले देते हैं? क्या कांग्रेस पूरी तरह से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को नकार चुकी है?
क्या कांग्रेस का आचरण यह साबित करता है कि वन्देमातरम केवल हिन्दुओं का गीत है? क्या कांग्रेस के अनुसार वन्देमातरम गाना – बजाना और सार्वजनिक रूप से “परफॉर्म” करना संविधान के दायरे से बाहर का आचरण है?
—
इन सवालों के जवाब कांग्रेस को देने होंगे। वीडियो में साफ़ दिख रहा है कि वन्देमातरम के पहले अंतरे के बाद कांग्रेस की मुखिया और बड़े नेताओं ने अपना “टेम्पर” लूज़ कर दिया था?
ऐसा लगा जैसे वे किसी मजबूरी में वहाँ खड़े हैं!
सोनिया जी तो जैसे सोनिया गाँधी के मुखौटे को नोचकर फेंक देती हैं और सामने आ जाता है एंटोनिया एडविज अल्बिना माइनो का चेहरा। मल्लिकार्जुन खड़गे के चेहरे पर कितनी लाचारगी थी। राहुल गाँधी की हवाइयाँ उड़ी हुई थीं।
—
कांग्रेस जवाब दे कि वह “त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी”
अर्थात — तुम ही दस अस्त्र धारण करने वाली दुर्गा हो, से क्यों चिढ़ती है? आख़िर वह कौन है, जिसे संतुष्ट करने के लिए वन्देमातरम की दो ही कड़ियों को कांग्रेस स्वीकार करती है? आख़िर वह कौन है जिसे “कमला कमल दल विहारिणी” से समस्या है? आख़िर वह कौन है जिसे “वाणी विद्यादायिनी” के नाम से चुन्ने खाते हैं?
आख़िर वह कौन है जिसे सनातन परम्परा से सिंचित इस भारत भूमि पर “तोमारै प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे” गाने से आपत्ति है? आख़िर वह कौन है जिसे “श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्, धरणीं भरणीं मातरम्” गाते हुए किसी दूसरी और परायी भूमि की याद सताती है?
—
यह शर्मनाक है। चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाली बात है। यह अपराध की सीमा तक देश का अपमान है। ठीक जिस दिन एक सौ चालीस करोड़ की आबादी वाला यह देश लाल क़िले पर वन्देमातरम के सुरों को हिमालय की बुलंदी तक उठकर और हिन्द महासागर की गहराई तक धंसकर सुन रहा था, एक राष्ट्रीय दल वन्देमातरम का उद्घोष सुनकर उसे बीच में रोक रहा था।
कल रहा था : “स्टॉप इट स्टॉप इट!”
—
आज एक काला दिन है। आनंदमठ के ज़माने से लेकर 2026 के 15 अगस्त तक ऐसा अशोभनीय व्यवहार वन्देमातरम के साथ कभी नहीं हुआ। क्या क़ानून और सरकार इतने लाचार हैं कि इसका संज्ञान तक नहीं ले सकते? क्या हम एक बिना रीढ़ और हड्डियों के देश हैं? क्या हमारे भीतर थोड़ी भी आंच शेष नहीं रही? क्या कांग्रेस मुख्यालय में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था, जो वहीं अड़ कर खड़ा हो जाता कि पूरा वन्देमातरम गाया – बजाया जाएगा?
क्या कांग्रेस में सब के सब (सफ़ेद बालों वाले सहित) एक मैडम के चपरासी ही चपरासी हैं?
—
मेरा हृदय रोता है। आँखों में लालिमा उतरती है। होंठ फड़फड़ा कर रह जाते हैं। स्वतंत्र भारत में विश्व के सबसे लोकप्रिय नारे “वन्देमातरम” का ऐसा अपमान? वह भी ऐसे दल द्वारा कि जिसका जुड़ाव इस वन्देमातरम से एक सदी से भी पुराना है।
कहाँ जाएं? किसे रोयें?
इसलिए जी चाहता है कि इस देश में एक ठीक ठाक तानाशाही हो? कोई तो हो जो हाथ में क़ानून का डंडा लेकर उनके पिछवाड़े पर टूट पड़े, जिन्हें यह देश, देश नहीं बल्कि खाला का घर लगता है।
—
अपनी उदास आत्मा से कहता हूँ : बोल : वन्देमातरम बोल! आशा मत छोड़। सुंदर और प्यारे और ख़ुद्दार भारत के दिन भी आएँगे। एक दिन वह आएगा जब वन्देमातरम की चारों बहिष्कृत कड़ियाँ पहली दो कड़ियों से जुड़कर एक माला बन जाएगी, और वह माला भाजपा तो पहनेगी ही पहनेगी, कांग्रेस भी पहनेगी, आप भी पहनेगी और ओवेसी की पार्टी भी।
हालांकि सीपीएम पहनेगी या नहीं, इसकी गारंटी तो भगवान भी नहीं ले सकता!
(मनमीत सोनी)



