Sunday, August 16, 2026
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Vande Maataram: कभी जुर्माना लगता था वन्दे मातरम बोलने पर -अब जो न बोलेगा उस पर लगेगा

Vande Maataram: आज सुबह प्राचीर पर गूंजा वो गीत सिर्फ एक समारोह नहीं था, बल्कि रंगपुर के उन दो सौ बच्चों का हिसाब पूरा होना था..

Vande Maataram: आपने वंदे मातरम् पहली बार कब और कहां गाया था? स्कूल की प्रार्थना में, किसी मैदान में, या किसी ऐसी सुबह जो आज भी याद है?..

सुबह लाल किले पर राष्ट्रगान से पहले वह गीत गाया गया, जिसे गाने पर बंगाल के एक स्कूल के दो सौ बच्चों से जुर्माना वसूले गए थे।
1905 में बंगाल के रंगपुर में, हर बच्चे से 5 रुपये जुर्माना। उस समय यह रकम बहुत बड़ी थी, उन बच्चों के लिए।
आज सुबह जब यह गीत गया गया। वायुसेना के दो हेलिकॉप्टर ऊपर से फूल बरसा रहे थे। एक पर तिरंगा था। दूसरे पर लिखा था- वंदे मातरम्।
आज फूल बरसे। तब जुर्माना लगा।
बीच में एक सौ बीस बरस से ज्यादा हैं। और एक आदमी, जिसने इसमें से कुछ भी नहीं देखा।
तीन दिन पहले, 12 अगस्त को, बंगाल के एक कस्बे नैहाटी में, कांठालपाड़ा मोहल्ले के एक पुराने घर के सामने सेना की पूर्वी कमान का बैंड पहुंचा और वही धुन बजाई जो आज प्राचीर पर बजी।
वहां वो घर था, उसका परिवार, मोहल्ले के लोग, और आसपास के स्कूलों के बच्चे और शिक्षक।
पूर्वी कमान ने अपनी आधिकारिक पोस्ट में एक नाम लिखा, शांतनु चट्टोपाध्याय। और यह भी, कि वो बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की पांचवीं पीढ़ी के वंशज हैं।
अब उस घर के भीतर चलिए। असली कहानी वहीं है।
कांठालपाड़ा। 1838।
एक कट्टर ब्राह्मण परिवार में एक बच्चा पैदा हुआ। नाम, बंकिमचंद्र।
पिता जादबचंद्र चट्टोपाध्याय सरकारी अफसर थे, आगे चलकर मेदिनीपुर के डिप्टी कलेक्टर बने। घर में कलम पहले से चलती थी-उनके एक भाई संजीबचंद्र भी उपन्यासकार बने, पलामौ उन्हीं की किताब है।
बंकिम ने हुगली के जिला स्कूल में अपनी पहली कविता लिखी। फिर हुगली मोहसिन कॉलेज, फिर प्रेसीडेंसी।
और यहां एक बात ऐसी है जो आज सुनने में अविश्वसनीय लगती है।
कलकत्ता विश्वविद्यालय की पहली फाइनल परीक्षा में सिर्फ दो उम्मीदवार पास हुए। वही दोनों उस विश्वविद्यालय के पहले स्नातक बने।
उनमें एक बंकिम थे।
1858 में वो सरकारी सेवा में आ गए, जैसोर के डिप्टी मजिस्ट्रेट। ठीक वही पद, जिस पर उनके पिता रह चुके थे।
बेटे ने पिता का रास्ता चुना। किसी को अंदाजा नहीं था कि वो उसी रास्ते पर चलते हुए कुछ और भी लिख देगा।
अब वो हिस्सा, जो आमतौर पर कोई नहीं बताता।
शुरुआत उन्होंने कविता से की। ईश्वरचंद्र गुप्त के साप्ताहिक संवाद प्रभाकर में उनकी शुरुआती रचनाएं छपीं।
फिर उन्होंने बांग्ला में एक उपन्यासिका लिखी और उसे एक घोषित इनाम की प्रतियोगिता में भेज दिया।
वो हार गए।
और जो पांडुलिपि भेजी थी, वो कभी छपी ही नहीं। आज उसका कोई नामोनिशान नहीं है।
सोचिए। जिस आदमी को आगे चलकर बांग्ला उपन्यास का जनक कहा जाना था- उसकी पहली किताब एक प्रतियोगिता हारकर हमेशा के लिए गुम हो गई।
शायद इसीलिए अगली बार उन्होंने भाषा ही बदल दी।
1864 में उनका पहला छपा उपन्यास आया- राजमोहन्स वाइफ। अंग्रेजी में।
जिस आदमी को सबसे अधिक जोश भरनेवाली पंक्तियां लिखनी थीं, उसने छपने की शुरुआत अंग्रेजों की जबान से की।
फिर नौकरी उन्हें आरामबाग ले गई। उस सब-डिवीजन के वो पहले प्रभारी मजिस्ट्रेट थे।
उसी इलाके में गड़ मंदारन का एक पुराना किला है। और उसी किले के खंडहर आगे चलकर उनके उपन्यास दुर्गेशनंदिनी की पृष्ठभूमि बने, जो 1865 में छपा।
बांग्ला भाषा का पहला उपन्यास।
एक हारी हुई प्रतियोगिता से बांग्ला के पहले उपन्यास तक, बीच में कुछ बरस, और एक आदमी की जिद।
इसके बाद कलम रुकी नहीं। कपालकुंडला, मृणालिनी, विषवृक्ष, कृष्णकांतेर उइल, एक के बाद एक। विषवृक्ष 1873 में आई, और आगे चलकर लंदन की मशहूर व्यंग्य पत्रिका पंच ने अपने पन्नों पर पाठकों से कहा कि बंकिमचंद्र की यह किताब पढ़ो।
गुलाम मुल्क का एक डिप्टी मजिस्ट्रेट। और उसकी किताब की चर्चा लंदन में।
1872 में उन्होंने अपनी पत्रिका शुरू की- बंगदर्शन। उसके पन्नों पर एक नौजवान भी लिखने लगा। नाम था रवींद्रनाथ ठाकुर।
रवींद्रनाथ ने आगे चलकर बंकिम को अपना गुरु माना। उन्होंने लिखा कि बंकिम सव्यसाची थे- एक हाथ से खुद बड़ा साहित्य रचते थे, और दूसरे हाथ से नए लेखकों को रास्ता दिखाते थे।
पर यह उस आदमी की एक ही तरफ है।
दूसरी तरफ तैंतीस साल की नौकरी थी। और उनके जीवनी-लेख के मुताबिक काम के वो बरस ऐसी घटनाओं से भरे रहे, जिनमें वो बार-बार औपनिवेशिक सरकार से टकराए।
तनख्वाह उसी सरकार से। टकराव भी उसी से।
एक किस्सा भी मशहूर है, जिसे छापते हुए द बेटर इंडिया ने खुद लिखा है कि इसकी सत्यता की पुष्टि नहीं हो सकी, कि बहरामपुर में उनकी पालकी अंग्रेज अफसरों के क्रिकेट खेल के बीच से निकल गई, कर्नल डफिन नाम के अफसर से तकरार हुई, मामला अदालत गया, और अदालत ने उस अंग्रेज अफसर को सार्वजनिक माफी मांगने को कहा।
यह सच है या नहीं, कोई नहीं जानता। पर इतना तय है कि नौकरी के उन बरसों में उनके भीतर कुछ जमा होता जा रहा था।
और एक दिन वो बाहर आ गया।
7 नवंबर 1875।
बंगदर्शन के पन्नों पर एक कविता छपी।
वंदे मातरम्।
‘वंदे’- मैं वंदना करता हूं। ‘मातरम्’ – मां।
लोगों ने कहा, भाषा बहुत कठिन है, कौन समझेगा। पर कुछ चीजें दिमाग से नहीं, सीने से पहुंचती हैं।
1882 में उन्होंने इसे अपने उपन्यास आनंदमठ में रख दिया, जो पहले उन्हीं की पत्रिका में किश्तों में छपा था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पिछले नवंबर में कहा था कि यह अमर गीत संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि में रचा गया, और 1905 के स्वदेशी आंदोलन में अंग्रेजी राज के खिलाफ प्रेरणा का स्रोत बना।
रवींद्रनाथ ने इसे धुन दी, और 1896 में कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया।
जिस शहर में बैठकर मैं यह लिख रहा हूं, उसी शहर की हवा ने वो पहली धुन सुनी थी।
और बंकिम के ‘अनुशीलन’ के विचार से प्रेरित होकर प्रमथनाथ मित्र ने अनुशीलन समिति बनाई- बंगाल का वही संगठन, जिससे आगे क्रांतिकारियों की पूरी पीढ़ी निकली।
एक आदमी की किताबें। और उनसे निकला एक आंदोलन।
अब उन दो शब्दों की कीमत।
नवंबर 1905। रंगपुर। एक स्कूल के दो सौ बच्चों पर पांच-पांच रुपये का जुर्माना। जुर्म- वंदे मातरम् बोल देना।
अप्रैल 1906। बरिसाल। हुकूमत ने इसे सार्वजनिक रूप से बोलने पर रोक लगाई, और आखिर में पूरा प्रांतीय सम्मेलन ही बंद करा दिया। प्रतिनिधि फिर भी बोलते रहे, और भारी पुलिस दमन झेला।
मई 1907। लाहौर। नौजवानों का जुलूस आदेश तोड़कर यही नारा लगाता निकला। लाठियां पड़ीं।
1908। बेलगाम। जिस दिन तिलक को मांडले भेजा जा रहा था, पुलिस ने वंदे मातरम् बोलने पर कई लड़कों को पीटा, कइयों को गिरफ्तार किया।
यह सब प्रेस सूचना ब्यूरो के दस्तावेज में दर्ज है।
आज सुबह जिस गीत पर आसमान से फूल गिरे- उसके लिए कभी बच्चों की जेब से पांच रुपये निकाले गए थे।
पर इसमें से कुछ भी बंकिम ने नहीं देखा।
1891 में वो नौकरी से रिटायर हुए। 1894 में अंग्रेजी साम्राज्य ने उन्हें अपना एक बड़ा सम्मान दिया – कंपेनियन ऑफ द ऑर्डर ऑफ द इंडियन एम्पायर।
और उसी बरस, 8 अप्रैल 1894 को, पचपन साल की उम्र में, कलकत्ता में उनकी मृत्यु हो गई।
गीत छपे उन्नीस साल हुए थे। रवींद्रनाथ को उसे गाने में अभी दो साल बाकी थे। रंगपुर के बच्चों पर जुर्माना लगने में ग्यारह साल। और आजादी अभी तिरपन साल दूर थी।
आखिरी बरसों में वो गीता पर टीका लिख रहे थे। वो पूरी नहीं हो सकी। मृत्यु के आठ साल बाद जो छपी, वो चौथे अध्याय के उन्नीसवें श्लोक पर आकर रुक जाती है।
एक अधूरा वाक्य। और एक पूरा देश।
अरविंद घोष ने उनके बारे में लिखा कि शुरुआती बंकिम सिर्फ एक कवि और शिल्पी थे, पर बाद वाले बंकिम द्रष्टा थे, राष्ट्र-निर्माता थे।
आगे क्या हुआ, यह आप जानते हैं। 1950 में संविधान सभा ने वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। बांग्ला कथा-साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार आज भी बंकिम पुरस्कार कहलाता है। और आज, रचना के डेढ़ सौवें बरस में, लाल किले के स्वतंत्रता दिवस समारोह के इतिहास में पहली बार वो गीत राष्ट्रगान से पहले गाया गया।
अब आखिरी बार कांठालपाड़ा लौटिए।
वो घर आज बंकिम भवन गवेषणा केंद्र है।
11 दिसंबर 2025 को संसद में सवाल उठा कि रखरखाव के अभाव में यह भवन अपनी उपयोगिता खो चुका है, और क्या इसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाएगा। केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने जवाब दिया कि ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है, और यह भी बताया कि यह केंद्र पश्चिम बंगाल सरकार के उच्च शिक्षा विभाग के अधीन एक स्वायत्त शोध संस्थान है।
दूसरा रुख भी है। खुद बंकिम भवन की वेबसाइट पर घर के जर्जर हिस्सों की पुरानी तस्वीरें हैं, और 2004 से 2009 के बीच हुई मरम्मत की तस्वीरें भी। काम हुआ है। सवाल बस इतना है कि उसके बाद कितना हुआ।
बंकिम के वंशज सजल चट्टोपाध्याय ने पिछले दिसंबर में समाचार एजेंसी IANS से कहा कि जैसे बंगाल में जगह-जगह रवींद्र भवन हैं, वैसे ही बंकिम भवन भी बनने चाहिए, जहां सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहें।
और आवाजें पहुंच भी रही हैं। पिछले नवंबर में NCC कैडेट वहां पहुंचे और बंकिम की वंशज बरनाली चट्टोपाध्याय को सम्मानित किया गया। और 12 अगस्त को शांतनु चट्टोपाध्याय उसी चौखट पर खड़े थे।
नैहाटी में स्टेशन का पता ही ऋषि बंकिमचंद्र रोड है। आजादी के कुछ महीने बाद, नवंबर 1947 में तय हुआ कि उनके नाम पर एक कॉलेज बनेगा – उसी घर से एक फर्लांग दूर। शहर का स्टेडियम बंकिमांजलि कहलाता है।
पूरा शहर उनका नाम पहनकर खड़ा है।
मैं अठारह साल से न्यूज डेस्क पर बैठा हूं। दूसरों की लिखी लाइनें पढ़ता हूं, ठीक करता हूं, आगे बढ़ा देता हूं।
और आज बार-बार उस पहली पांडुलिपि का खयाल आ रहा है। वो जो प्रतियोगिता हार गई। वो जो कभी छपी नहीं।
अगर उस दिन बंकिम टूट जाते, तो?
तो शायद आज सुबह लाल किले पर हेलिकॉप्टर कुछ और लिखा हुआ झंडा लेकर उड़ते।
तीन बातें, जो आज मेरी डायरी में गईं।
1. पहली हार आखिरी नहीं होती। जिस आदमी की पहली किताब इनाम से हारकर गुम हो गई, वही आगे उस भाषा का सबसे बड़ा नाम बना।
2. रास्ते में पड़ा हर खंडहर सिर्फ खंडहर नहीं होता। आरामबाग के एक टूटे किले से बांग्ला का पहला उपन्यास निकल आया था।
3. और जो बोता है, फल अक्सर वो नहीं देखता। बंकिम आजादी से तिरपन साल पहले चले गए।
इस पोस्ट को Save कर लें- कांठालपाड़ा, दुर्गेशनंदिनी, बंगदर्शन, 7 नवंबर 1875, आनंदमठ, 1896, रंगपुर 1905। ये नाम और तारीखें अगली बार बच्चों के सवाल पर आपके पास तैयार मिलेंगी।
और अगर आपको भी लगता है कि आज सुबह प्राचीर पर गूंजा वो गीत सिर्फ एक समारोह नहीं था, बल्कि रंगपुर के उन दो सौ बच्चों का हिसाब पूरा होना था तो इसे अपनी वॉल पर रहने दीजिए। शायद कोई पढ़कर अपने बेटे को यह कीमत बता दे।
मैं राहुल हूं। मैं उन लोगों और जगहों तक पहुंचने की कोशिश करता हूं, जिनके नाम तो सब जानते हैं, पर कहानी कोई नहीं। ऐसी ही खोदकर निकाली गई बातें आपको भी खींचती हों, तो साथ बने रहिए।
एक बात बताइए, आपने वंदे मातरम् पहली बार कब और कहां गाया था? स्कूल की प्रार्थना में, किसी मैदान में, या किसी ऐसी सुबह जो आज भी याद है?

(राहुल मिश्रा)

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