Bihar: एक समय था, जब बिहार में चुनाव का मतलब ही हिंसा, दहशत, बूथ कब्ज़ा और दोबारा मतदान हुआ करता था। लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं..
दशकों तक बिहार की राजनीति खूनखराबे और हमलों की वजह से बदनाम रही। 1960 के दशक से लेकर 1990 तक कई बड़े नेताओं की हत्याएं हुईं। शक्ति कुमार, मंज़ूर हसन, अशोक सिंह और बृज बिहारी प्रसाद जैसे नाम आज भी राजनीतिक हिंसा की काली यादों में शामिल हैं। कई बार हालात ऐसे बने कि हत्या के बाद शव तक नहीं मिला, और इंसाफ़ सालों तक अधूरा रह गया।
भारत में बूथ कैप्चरिंग का सबसे पहला मामला भी बिहार से ही निकला। 1957 में बेगूसराय में यह शब्द पहली बार खबरों में आया और फिर लगभग हर चुनाव में हिंसा की घटनाएं दोहराई जाती रहीं। 1977 से लेकर 1995 तक तो हालत यह थी कि चुनाव का मतलब ही डर, धमकी, मारपीट और अपहरण माना जाने लगा।
1957—बेगूसराय से शुरू हुआ बूथ कैप्चरिंग का दौर
उसके बाद—हर चुनाव में हिंसा की खबरें
1977 से 1995—बिहार चुनाव बराबर दहशत का नाम
(gfx in)अब आंकड़ों के सहारे देखते हैं बिहार चुनावी हिंसा की असली कहानी—
बिहार में चुनावी हिंसा का सिलसिला पहले ही चुनाव से दिखाई देता है। 1951-52 में जब राज्य में पहली बार विधानसभा चुनाव हुए, तब कांग्रेस का दबदबा था। कांग्रेस और विपक्ष के प्रत्याशियों के बीच आए दिन मुकाबले, झड़पें और तनाव की खबरें आती थीं। उस दौर में मुख्य संघर्ष कांग्रेस बनाम कम्युनिस्ट उम्मीदवारों के बीच रहता था।
1952 से 1967 तक छोटी-मोटी घटनाएं तो होती रहीं, लेकिन 1969 के चुनाव ने पहली बार पूरे बिहार को हिंसा से हिलाकर रख दिया। इस चुनाव में 7 लोगों की मौत हुई और गरीब तथा दलित समुदाय के हजारों लोगों को वोट तक नहीं डालने दिया गया।
1977 में हालात और बिगड़ गए। इस चुनाव में 194 हिंसक घटनाएं दर्ज हुईं और 26 लोगों की जान चली गई।
1985 में तो अब तक की सबसे ज्यादा 1,370 घटनाएं सामने आईं, जिनमें 69 मौतें हुईं।
1990 में 520 हिंसक मामलों में 87 लोग मारे गए।
1995 में 1,270 घटनाओं में 54 मौतें दर्ज की गईं, जबकि 2000 के चुनावों में 61 लोगों की हत्या हुई।
लेकिन 2005 के बाद स्थिति बदलनी शुरू हुई। चुनाव आयोग की सख्ती, बेहतर सुरक्षा इंतज़ाम और कड़े नियमों ने हिंसा को काफी हद तक रोक दिया। 2005 के फरवरी और अक्टूबर चुनाव में 17 मौतें दर्ज की गईं।
2010 में यह संख्या घटकर 5 रह गई।
और 2015 में पहली बार—एक भी मौत नहीं हुई।
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2005 के बाद चुनावों की पूरी तस्वीर बदल गई—
CCTV की निगरानी, केंद्रीय सुरक्षा बलों की भारी तैनाती, माइक्रो-ऑब्ज़र्वर सिस्टम और हर बूथ पर कड़ी चौकसी ने हिंसा को लगाम लगा दी।
2005: 17 मौतें
2010: सिर्फ़ 5 मौतें
2015: पहली बार—ZERO डेथ्स
बिहार की राजनीतिक यादों में 1995 का विधानसभा चुनाव भी बहुत चर्चा में रहा। उस चुनाव में बूथ लूट और हिंसा में 14 लोग मारे गए थे, जिनमें एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट भी शामिल थे। सुरक्षा बलों की 450 कंपनियां होने के बावजूद हिंसा नहीं रुकी। आरोप लगे कि राज्य सरकार के इशारे पर अफसरों ने सुरक्षा बलों को वास्तविक संवेदनशील बूथों पर नहीं लगाया।
गया जिले में एक बूथ लूटकर वोटिंग मशीनें मैदान में फेंक दी गई थीं। हालात इतने बिगड़ गए कि चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन को पंजाब से विशेष कमांडो बुलाने पड़े और उन्हें हर संवेदनशील बूथ पर तैनात किया गया। जांच में 12 सीटों पर बड़े पैमाने पर गड़बड़ी सामने आई और नतीजतन, शेषन ने निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चार बार मतदान की तारीखें आगे बढ़ाईं।
बिहार के चुनावी इतिहास में 2005 का वर्ष बहुत अहम है। इसी साल राज्य में 15 साल के लालू शासन का अंत हुआ और दो बार विधानसभा चुनाव कराने पड़े। हिंसा और बूथ कब्ज़े की वजह से 660 बूथों पर दोबारा मतदान कराना पड़ा। लेकिन आज तस्वीर बिलकुल बदल चुकी है — 2025 के चुनाव पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से पूरे हुए।
2025 ने इतिहास रच दिया—
पहली बार—पूरे बिहार में ZERO REPOLL
“न कोई हिंसा…
न कोई बूथ कब्ज़ा…
न कहीं दोबारा वोटिंग…”
यानी—बिहार ने ‘जंगल राज’ से ‘ज़ीरो रिपोल’ तक की ऐतिहासिक यात्रा पूरी कर ली।
एक समय हिंसा और आतंक का उदाहरण बना यह राज्य—
आज शांतिपूर्ण चुनाव की मिसाल बन चुका है।
यह है—न्यू बिहार।
(अर्चना शेरी)



