Team India: टीम इंडिया को आखिर हो क्या गया? घर में ही क्यों बिखर रही है ताकत? 30 साल में पहली बार हो रहा है ऐसा..
कभी ऐसा वक्त था जब भारतीय टेस्ट टीम को दुनिया की सबसे मजबूत टीमों में गिना जाता था। खास तौर पर घरेलू मैदानों पर तो भारत को हराना लगभग असंभव माना जाता था। भारत सिर्फ जीतता नहीं था, बल्कि विरोधी टीमों का हौसला भी तोड़ देता था। मजबूत बल्लेबाज, खतरनाक स्पिनर और अपने मैदानों की गहरी समझ—इन तीन चीज़ों ने टीम इंडिया को लगभग अजेय बना दिया था।
लेकिन पिछले 13 महीनों में यह पूरा किस्सा उलट गया। वही टीम, जो अपनी धरती पर राज करती थी, अब वहीं लगातार कमजोर होती दिख रही है।
गिरावट की वजह कहाँ से शुरू हुई?
जुलाई 2024 में गौतम गंभीर को भारतीय क्रिकेट टीम का मुख्य कोच बनाया गया। खिलाड़ी के रूप में गंभीर अपने संघर्ष और बड़े मैचों के खेल के लिए जाने जाते थे। उम्मीद थी कि कोच के तौर पर वे टेस्ट टीम में भी वही कठोरता और स्थिरता लाएँगे। लेकिन मैदान में जैसे वह असर उनकी बल्लेबाज़ी में दिखता था, वैसा प्रभाव टेस्ट टीम में नहीं उतर पाया।
कोच का काम खिलाड़ी से अलग होता है। खिलाड़ी रन बनाकर जीत दिलाता है, लेकिन कोच पूरी टीम के लिए सही ढांचे और रणनीति का निर्माण करता है। गंभीर के समय में टीम का यही ढांचा असंतुलित दिखने लगा।
सबसे चौंकाने वाला आँकड़ा
गंभीर की कोचिंग में भारत ने कुल 19 टेस्ट खेले जिनमें से सिर्फ 7 जीते और हम 10 हार गए। 2 टेस्ट ड्रॉ भी रहे।
यह प्रदर्शन उस टीम के लिए बेहद हैरान करने वाला है जो लगभग दो दशकों तक घरेलू टेस्ट क्रिकेट में लगातार जीत हासिल करती रही थी।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि गंभीर के दौर में भारत ने घर में 9 टेस्ट खेले और उनमें से 5 हार गया।
जबकि पहले भारत को घर में 5 टेस्ट हारने में 13 साल लग गए थे। अब वही रिकॉर्ड सिर्फ 13 महीनों में टूट गया।
यह सिर्फ आँकड़ों की बात नहीं है—यह भारत की टेस्ट पहचान के लिए बड़ा झटका है।
हार की शुरुआत कहाँ से हुई?
सबसे पहले न्यूजीलैंड ने भारत को घर में 3–0 से क्लीन स्वीप किया।
वेस्टइंडीज के खिलाफ दो जीत से थोड़ी राहत मिली,
लेकिन इसके तुरंत बाद दक्षिण अफ्रीका ने भारत को दोनों टेस्ट में हरा दिया।
गुवाहाटी टेस्ट में मिली 408 रनों की हार तो इतिहास की सबसे शर्मनाक हारों में गिनी गई। 549 रन का लक्ष्य पीछा करते हुए भारतीय टीम 140 पर ढह गई।
घरेलू पिचें, जो कभी भारत की सबसे बड़ी ताकत थीं, अब खुद टीम के लिए समस्या बन रही हैं।
टेस्ट टीम में T20 वाली मानसिकता
गंभीर का कहना है कि टीम बदलाव के दौर में है और युवा खिलाड़ियों को समय चाहिए। यह बात कुछ हद तक सही है, लेकिन असली दिक्कत इससे कहीं बड़ी है –
टीम की सोच एकदम स्पष्ट नहीं है।
टीम चयन लगातार बदल रहा है।
हर टेस्ट में नई संयोजन आज़माने की कोशिश हो रही है।
ऐसा लगता है कि टेस्ट मैच को भी टी20 की तरह खेला जा रहा है।
नंबर 3 की जगह प्रयोगशाला
टीम में विशेषज्ञ बल्लेबाजों की बजाय ऑलराउंडर्स को ज्यादा मौका दिया जा रहा है।
दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ भारत सिर्फ 3 स्पेशलिस्ट बल्लेबाजों के साथ उतरा।
नतीजा—बल्लेबाजी बार-बार तेजी से ढहती रही।
नंबर-3 जैसी सबसे अहम जगह, जिसे कभी द्रविड़ और पुजारा जैसे दिग्गजों ने लगातार संभाला,
अब हर टेस्ट में नए खिलाड़ी के साथ आज़माई जा रही है।
इससे टीम की रीढ़ कमजोर हो गई है।
हर मैच में बदलती प्लेइंग इलेवन
अस्थिरता सिर्फ बल्लेबाजी में नहीं, बल्कि पूरी टीम में फैल गई है।
एक खिलाड़ी पहला टेस्ट खेलता है और दूसरे में बाहर कर दिया जाता है।
ऐसे माहौल में खिलाड़ी टीम के लिए नहीं, बल्कि अपनी जगह बचाने के दबाव में खेलते हैं—और इससे प्रदर्शन और बिगड़ जाता है।
स्पिन विभाग भी लड़खड़ा गया
कभी अश्विन और जडेजा की जोड़ी भारत की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती थी। लेकिन कोचिंग में “मल्टीस्किल्ड” खिलाड़ियों पर ज्यादा जोर दिया गया। अश्विन जैसे अनुभवी गेंदबाज को बैक-अप की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा। इसी माहौल में उन्होंने अचानक रिटायरमेंट ले लिया। उनके जाने से भारत ने सिर्फ एक बेहतरीन स्पिनर ही नहीं, बल्कि एक रणनीतिक नेता भी खो दिया।
फिर अचानक कोहली और रोहित शर्मा के रिटायरमेंट ने टीम को हिला दिया। उन्होंने कहा कि यह उनका निजी फैसला था, लेकिन चर्चा यह भी रही कि टीम मैनेजमेंट उन्हें प्लान से बाहर कर रहा था।
इन दोनों के हटते ही अनुभव और स्थिरता खत्म हो गई, और युवाओं पर तुरंत भारी जिम्मेदारी आ गई।
पिच रणनीति उलटी क्यों साबित हुई?
गंभीर चाहते थे कि भारत ऐसी पिचें बनाए जहाँ गेंद जल्दी टर्न ले, ताकि स्पिनर शुरुआत से ही हावी रहें। लेकिन यह योजना खुद भारत पर भारी पड़ गई।
कोलकाता टेस्ट की पिच इतनी जल्दी टूट गई कि मैच तीन दिन में खत्म हो गया।
भारतीय बल्लेबाज खुद स्पिन में फँसते गए और विरोधी टीम के गेंदबाज फायदा उठाते रहे।
गेंदबाजी भी पहले जैसी धार नहीं दिखा रही। जडेजा अकेले स्पिन की जिम्मेदारी उठा रहे हैं।
तेज गेंदबाजी में बुमराह कभी-कभी शानदार दिखते हैं, लेकिन एक गेंदबाज अकेले सीरीज नहीं जिता सकता। टेस्ट में जीत पार्टनरशिप से आती है, और भारत की गेंदबाजी अब वह तालमेल नहीं दिखा रही।
आँकड़े हकीकत साफ कर देते हैं
अक्टूबर 2024 से अब तक भारत घर में 7 टेस्ट हार चुका है, जो 93 साल के इतिहास का सबसे खराब घरेलू रिकॉर्ड है। इसके मुकाबले 2012 से 2024 तक 13 साल में सिर्फ 5 टेस्ट हारे थे। यानी पिछले 13 महीनों ने भारत के 13 साल पुराने रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया है।
असली सवाल—गंभीर नहीं, सोच का है
अब मुद्दा सिर्फ यह नहीं कि गंभीर को कोच रहना चाहिए या नहीं। असली सवाल यह है कि भारत टेस्ट क्रिकेट को किस नजर से देखना चाहता है।
क्या भारत फिर से वही ताकत बनेगा जिसे घर में हराना नामुमकिन लगता था? या टीम प्रयोगों और अस्थिर चयन में उलझकर अपनी सबसे मजबूत फॉर्मेट खो देगी?
अगर टीम ऐसा करे कि
स्थिर चयन पर लौटा जाये
विशेषज्ञ बल्लेबाजों को प्राथमिकता दी जाये
एक भरोसेमंद स्ट्राइक स्पिनर ढूंढा जाये
और घरेलू पिचों की रणनीति फिर से समझदारी से बनाई जाये
तो भारत एक बार फिर उसी टेस्ट महारथी की तरह उभर सकता है, जिसे दुनिया सम्मान से देखती थी। अभी भी देर नहीं हुई—ज़रूरत सिर्फ सही दिशा में मजबूत कदम उठाने की है।



