Tuesday, March 17, 2026
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Kolkata Airport में मस्जिद कैसे बनी? – प्रश्न उठा संसद में, बहस गरमाई

Kolkata Airport के भीतर सेकेंडरी रनवे के पास 130 साल पुरानी मस्जिद का होना सुरक्षा पर सवाला उठाता है और खतरे को दावत देता नजर आता है..सरकारी जवाब और पुरानी ज़मीनदारी की पूरी कहानी..

Kolkata Airport के भीतर सेकेंडरी रनवे के पास 130 साल पुरानी मस्जिद का होना सुरक्षा पर सवाला उठाता है और खतरे को दावत देता नजर आता है..सरकारी जवाब और पुरानी ज़मीनदारी की पूरी कहानी..

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंटरनेशनल एयरपोर्ट में एक ऐसा तथ्य है, जिसे सुनकर देश के ज्यादातर लोग हैरान रह जाते हैं—हवाई अड्डे के परिसर के भीतर लगभग 130 वर्ष पुरानी बांकरा मस्जिद मौजूद है। यह मस्जिद सेकेंडरी रनवे से 300 मीटर से भी कम दूरी पर स्थित है और कई वर्षों से सुरक्षा और विमान संचालन से जुड़ी चिंताओं के कारण विवादों के केंद्र में रही है।

यह मुद्दा तब फिर सुर्खियों में आ गया जब पश्चिम बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य द्वारा लोकसभा में पूछे गए सवाल और नागरिक उड्डयन मंत्रालय (MoCA) का जवाब सार्वजनिक हुआ। मंत्रालय ने स्वीकार किया कि उन्हें रनवे के बिल्कुल पास स्थित मस्जिद की जानकारी है, और यह स्थिति विमान परिचालन को प्रभावित भी करती है।

बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि मंत्रालय के मुताबिक मस्जिद सुरक्षित संचालन में बाधा बनती है और आपात स्थिति में सेकेंडरी रनवे का इस्तेमाल सीमित हो जाता है क्योंकि इसके चलते रनवे का 88 मीटर हिस्सा उपयोग में नहीं आ पाता।

पहले भी उठ चुका है विवाद

बांकरा मस्जिद को लेकर यह पहला विवाद नहीं है। इस साल की शुरुआत में विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने एयरपोर्ट बाउंड्री को तुरंत सील करने की मांग की थी। उनका कहना था कि हवाई अड्डे की सुरक्षा के लिहाज़ से यह स्थिति बेहद चिंताजनक है क्योंकि मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए रोजाना लोग आते हैं, जिससे संवेदनशील क्षेत्र में आम नागरिकों की आवाजाही बढ़ती है।

हवाई अड्डे के अंदर मस्जिद होने की कहानी क्या है?

यह विवाद नया नहीं है। पिछले कई दशकों से केंद्र और राज्य की विभिन्न सरकारें मस्जिद को एयरपोर्ट परिसर से बाहर पास के किसी स्थान पर शिफ्ट करने का प्रस्ताव देती रही हैं, पर मुस्लिम समुदाय ने ऐसे प्रस्तावों को बार-बार अस्वीकार कर दिया। सवाल एक बार फिर उठ रहा है—एयरपोर्ट के भीतर मस्जिद आखिर आई कैसे?

130 साल पुरानी मस्जिद—एयरपोर्ट से भी पहले की

एयरपोर्ट अथॉरिटी और स्थानीय लोगों के अनुसार, मस्जिद 1890 के दशक से वहां मौजूद है, यानी उस समय से जब ब्रिटिश शासन ने कलकत्ता के उत्तरी हिस्से में एयरस्ट्रिप बनाना भी शुरू नहीं किया था।

1890 के दशक में जहां आज सेकेंडरी रनवे है, वह एक गांव हुआ करता था। बांकरा मस्जिद उसी गांव का हिस्सा थी। 1924 में ब्रिटिश काल का एयरोड्रोम (जो अब दमदम एयरपोर्ट से पहले अस्तित्व में आया) पुरानी आर्टिलरी आर्मरी के पास बनाया गया, लेकिन तब भी मस्जिद के आसपास आबादी मौजूद थी।

1950–60 के दशक: एयरपोर्ट बढ़ा, रनवे बना, गांव हटे, मस्जिद न हटी

1950 और 60 के दशक में जब एयर ट्रैफिक बढ़ने लगा, तो एयरपोर्ट को पश्चिम की ओर विस्तार दिया गया और नया सेकेंडरी रनवे बनाया गया। उस समय प्राइमरी रनवे के उत्तर और पश्चिम के गांवों को हटाया गया। निवासियों को जेसोर रोड के पार आधुनिक ‘मध्यमग्राम’ क्षेत्र में बसा दिया गया। 1962 में जब राज्य सरकार ने जमीन अधिग्रहण कर AAI को सौंपी, तब यह माना जाता है कि सौ साल पुरानी मस्जिद को सुरक्षित रखने की सहमति बनी रही। इस तरह मस्जिद एयरपोर्ट परिसर के भीतर रह गई।

आज स्थिति क्या है?—रनवे के बेहद नजदीक

बांकरा मस्जिद फिलहाल सेकेंडरी रनवे के उत्तरी छोर से 300 मीटर से भी कम दूरी पर है।
केंद्र और राज्य सरकारें वर्षों से मस्जिद को पास के नए स्थान पर स्थानांतरित करने का प्रस्ताव देती रही हैं, लेकिन समुदाय ने इसे स्वीकार नहीं किया है। अधिकारियों ने कभी भी मस्जिद को गिराने की बात नहीं कही—सिर्फ शिफ्ट करने की कोशिश की गई।

बीजेपी के सवाल और मंत्रालय की पुष्टि—तीन बड़े मुद्दे फिर खड़े

 मस्जिद पहले बनी या एयरपोर्ट?

इतिहास साफ बताता है—मस्जिद पहले की है, एयरपोर्ट बाद में विस्तारित हुआ।

बार-बार कोशिशें, लेकिन नतीजा शून्य

कई सरकारों ने बातचीत से समाधान खोजने की कोशिश की, पर सहमति नहीं बन सकी।

सुरक्षा और विमान संचालन की गंभीर चुनौती

नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अनुसार—

मस्जिद की वजह से सेकेंडरी रनवे का 88 मीटर हिस्सा उपयोग से बाहर रहता है।

अगर मुख्य रनवे बंद हो, तो आपात लैंडिंग में दिक्कत होती है।

रोजाना 50–60 लोग नमाज़ पढ़ने आते हैं; शुक्रवार को 200–250 और रमज़ान में इससे भी ज्यादा।

सुरक्षा नियमों के अनुसार संवेदनशील हवाई अड्डा क्षेत्र में आम लोगों की नियमित आवाजाही खतरा पैदा कर सकती है।

कोलकाता एयरपोर्ट के अंदर स्थित बांकरा मस्जिद की कहानी सौ साल पुराने इतिहास, प्रशासनिक निर्णयों और धर्मस्थल की संवेदनशीलता से जुड़ी हुई है। एक ओर यह मस्जिद स्थानीय समुदाय की आस्था का प्रतीक है, तो दूसरी ओर यह आधुनिक हवाई सुरक्षा मानकों के सामने एक बड़ी चुनौती भी बन गई है। बीजेपी द्वारा मुद्दा उठाए जाने और मंत्रालय द्वारा रनवे सुरक्षा पर चिंता जताने के बाद यह विवाद एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गया है।

 

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