Bangladesh: भारत-पाकिस्तान में फिर युद्ध हुआ तो क्या बांग्लादेश खोलेगा दूसरा मोर्चा? जानिए कितनी है इसकी संभावना
बांग्लादेश के मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट से जुड़ने की चर्चा के बीच सवाल उठ रहा है कि भारत-पाकिस्तान युद्ध की स्थिति में क्या ढाका भारत के खिलाफ सैन्य मोर्चा खोल सकता है। जानिए इसकी वास्तविक संभावना और रणनीतिक समीकरण।
भारत के पड़ोसी बांग्लादेश को लेकर इन दिनों एक बड़ा रणनीतिक सवाल चर्चा में है। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच बने मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट से बांग्लादेश के जुड़ने की अटकलों ने इस बहस को और हवा दे दी है। सवाल सीधा है – अगर भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच फिर सैन्य टकराव होता है और भारत पाकिस्तान के खिलाफ कोई बड़ा ऑपरेशन करता है, तो क्या बांग्लादेश भी पाकिस्तान के साथ खड़ा होकर भारत के खिलाफ मोर्चा खोल सकता है?
इस सवाल की वजह सिर्फ बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच बढ़ते संपर्क नहीं हैं। शेख हसीना सरकार के सत्ता से बाहर होने के बाद ढाका की भारत नीति में भी बदलाव दिखाई दिया है और दोनों देशों के रिश्तों में पहले जैसी गर्मजोशी नहीं रही। सीमा, पानी के बंटवारे, व्यापार और रोहिंग्या संकट जैसे कई मुद्दों पर मतभेद सामने आते रहे हैं। ऐसे माहौल में पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश की बढ़ती नजदीकी को भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक घटनाक्रम के तौर पर देखा जा रहा है।
‘इस्लामिक NATO’ की चर्चा आखिर क्यों हो रही है?
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट की शुरुआत को पश्चिम एशिया और मुस्लिम देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसी वजह से कुछ जगहों पर इसे आम बोलचाल में ‘इस्लामिक NATO’ कहा जा रहा है। हालांकि इसे सीधे NATO के बराबर मानना सही नहीं होगा, क्योंकि दोनों गठबंधनों की संरचना, कानूनी व्यवस्था और सैन्य प्रतिबद्धताएं अलग हैं।
NATO की सबसे चर्चित विशेषता सामूहिक रक्षा की व्यवस्था है, जिसके तहत किसी सदस्य देश पर हमला होने की स्थिति में बाकी सदस्य उसकी सहायता के लिए आगे आ सकते हैं। लेकिन मक्का समझौते को लेकर यह मान लेना कि इसमें शामिल हर देश किसी भी परिस्थिति में भारत जैसे किसी तीसरे देश के खिलाफ युद्ध करने के लिए बाध्य होगा, फिलहाल सही निष्कर्ष नहीं होगा। किसी सैन्य या सुरक्षा समझौते की वास्तविक भूमिका उसके नियमों और सदस्य देशों के फैसलों पर निर्भर करती है।
क्या बांग्लादेश भारत के खिलाफ युद्ध कर सकता है?
बांग्लादेश अगर इस तरह के किसी रक्षा ढांचे का हिस्सा बनता भी है, तब भी उसके लिए भारत के खिलाफ सीधे युद्ध में उतरना बहुत बड़ा फैसला होगा। भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 4,000 किलोमीटर लंबी सीमा है और बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि उसके तीन तरफ भारत का क्षेत्र पड़ता है। ऐसे में भारत के साथ सीधा सैन्य टकराव ढाका के लिए बेहद जोखिम भरा कदम साबित हो सकता है।
युद्ध सिर्फ सीमा पर सैनिकों की लड़ाई का नाम नहीं होता। संघर्ष बढ़ने पर व्यापार, परिवहन, ऊर्जा आपूर्ति, सीमा पार आवाजाही और आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ता है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों पर इसका सीधा दबाव पड़ सकता है, इसलिए ढाका के लिए किसी भी सैन्य फैसले में अपने राष्ट्रीय हित को सबसे ऊपर रखना जरूरी होगा।
शेख हसीना के बाद बदले भारत-बांग्लादेश रिश्ते
शेख हसीना के लंबे कार्यकाल के दौरान भारत और बांग्लादेश के संबंधों को दक्षिण एशिया के अपेक्षाकृत मजबूत द्विपक्षीय रिश्तों में गिना जाता था। दोनों देशों ने सुरक्षा, कनेक्टिविटी, व्यापार और ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाया था। सीमा सुरक्षा और उग्रवाद से निपटने जैसे मुद्दों पर भी दोनों देशों के बीच सहयोग देखने को मिला था।
अब राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं और रिश्तों में पहले जैसा भरोसा दिखाई नहीं देता। बांग्लादेश में भारत को लेकर राजनीतिक बहस भी ज्यादा तेज हुई है। पानी के बंटवारे, सीमा से जुड़े सवाल और व्यापारिक मुद्दे अक्सर दोनों देशों के बीच चर्चा का कारण बनते हैं। इसी दौरान पाकिस्तान के साथ ढाका के राजनयिक संपर्क बढ़ने से नई रणनीतिक अटकलों को भी जगह मिल गई है।
क्या पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत से लड़ सकता है ढाका?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी देश का दूसरे देश को राजनीतिक या कूटनीतिक समर्थन देना और उसके लिए युद्ध लड़ना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच अगर भविष्य में सैन्य संघर्ष होता है, तो बांग्लादेश पाकिस्तान के पक्ष में बयान दे सकता है या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ राजनीतिक रुख अपना सकता है।
ढाका संयुक्त राष्ट्र या इस्लामिक देशों से जुड़े मंचों पर पाकिस्तान के पक्ष में अपनी बात रख सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं होगा कि बांग्लादेश अपनी सेना को भारत के खिलाफ युद्ध में भेज देगा। ऐसा कदम उठाने से पहले उसे सैन्य क्षमता, आर्थिक नुकसान, सीमा सुरक्षा और घरेलू राजनीति समेत कई पहलुओं पर विचार करना पड़ेगा।
बांग्लादेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी भौगोलिक स्थिति
अगर भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष होता है, तो पाकिस्तान के लिए यह निश्चित रूप से फायदेमंद हो सकता है कि उसे ज्यादा से ज्यादा देशों का समर्थन मिले। लेकिन बांग्लादेश की स्थिति पाकिस्तान से बिल्कुल अलग है। पाकिस्तान भारत से सीधे सीमा साझा करता है, जबकि बांग्लादेश का भारत के साथ बेहद लंबा और संवेदनशील सीमा क्षेत्र है।
यही कारण है कि भारत के खिलाफ कोई सैन्य कदम बांग्लादेश के लिए बहुत बड़ा जोखिम पैदा कर सकता है। संघर्ष की स्थिति में सीमावर्ती इलाकों में तनाव बढ़ेगा और व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। बिजली, ईंधन, परिवहन और दूसरे जरूरी सामानों की आपूर्ति पर भी दबाव पड़ने की आशंका रहेगी। ऐसे में युद्ध का आर्थिक असर केवल सरकार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम नागरिक भी इसकी कीमत चुकाएंगे।
क्या ‘इस्लामिक NATO’ बांग्लादेश को भारत के खिलाफ मजबूर करेगा?
अभी ऐसा मानने का कोई ठोस आधार नहीं है। ‘इस्लामिक NATO’ शब्द सुनने में जितना बड़ा और प्रभावशाली लगता है, वास्तविक स्थिति को समझने के लिए उसके कानूनी और सैन्य प्रावधानों को अलग-अलग देखना जरूरी है। किसी भी संगठन या समझौते का सदस्य बनना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि सदस्य देश हर संभावित युद्ध में एक-दूसरे के लिए सैन्य लड़ाई लड़ेंगे।
इसी तरह ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी OIC को भी NATO जैसी सामूहिक सैन्य रक्षा व्यवस्था समझना ठीक नहीं होगा। OIC मुख्य रूप से मुस्लिम देशों के बीच राजनीतिक, कूटनीतिक और सहयोग से जुड़े मामलों का मंच है। इसलिए भारत-पाकिस्तान के बीच संभावित युद्ध को सीधे किसी व्यापक ‘इस्लामिक युद्ध’ में बदलते हुए देखना अभी जल्दबाजी होगी।
फिर बांग्लादेश पाकिस्तान के लिए क्या कर सकता है?
अगर भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव बढ़ता है, तो बांग्लादेश का सबसे संभावित रुख कूटनीतिक स्तर पर दिखाई दे सकता है। ढाका किसी एक पक्ष के समर्थन में बयान दे सकता है, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अपना पक्ष रख सकता है या युद्ध रोकने की अपील कर सकता है। वह पाकिस्तान के साथ राजनीतिक संबंधों को भी इस दौरान ज्यादा महत्व दे सकता है।
लेकिन सैन्य हस्तक्षेप बिल्कुल अलग स्तर का फैसला होगा। इसके लिए बांग्लादेश को अपनी सेना की तैयारी, रक्षा संसाधनों, सीमा सुरक्षा और संभावित भारतीय प्रतिक्रिया का आकलन करना होगा। भारत के खिलाफ सीधे युद्ध में उतरने से उसे आर्थिक और रणनीतिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए केवल पाकिस्तान के साथ बढ़ती दोस्ती को सैन्य गठबंधन की गारंटी मानना उचित नहीं होगा।
क्या भारत के खिलाफ दो मोर्चे खुलने की आशंका है?
यही वह सवाल है जिसने सबसे ज्यादा चर्चा पैदा की है। भारत-पाकिस्तान के बीच किसी भविष्य के युद्ध में पाकिस्तान की कोशिश हो सकती है कि भारत पर राजनीतिक, कूटनीतिक या रणनीतिक दबाव कई दिशाओं से बने। मगर इसका यह मतलब नहीं कि बांग्लादेश भी भारत के खिलाफ दूसरा सैन्य मोर्चा खोलने के लिए तैयार बैठा है।
मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए बांग्लादेश के सीधे सैन्य रूप से भारत के खिलाफ उतरने की संभावना काफी कम दिखाई देती है। पाकिस्तान के साथ रिश्ते बढ़ना एक बात है और भारत के साथ युद्ध छेड़ना दूसरी। ढाका के सामने अपने आर्थिक हित, घरेलू राजनीतिक स्थिरता, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय संबंधों को संतुलित रखने की बड़ी चुनौती है।
अभी डर से ज्यादा जरूरी है रणनीतिक समझ
बांग्लादेश का किसी नए क्षेत्रीय रक्षा समझौते के करीब जाना भारत के लिए नजरअंदाज करने वाला घटनाक्रम नहीं है। भारत को निश्चित तौर पर ढाका और इस्लामाबाद के बीच बढ़ते संपर्क, बदलते क्षेत्रीय समीकरण और मुस्लिम देशों के बीच बन रहे नए सुरक्षा ढांचों पर नजर रखनी होगी।
लेकिन फिलहाल यह कहना कि अगला ऑपरेशन सिंदूर हुआ तो बांग्लादेश निश्चित रूप से पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत पर हमला कर देगा, तथ्यों से कहीं आगे की बात होगी। ज्यादा वास्तविक संभावना यही है कि ऐसी स्थिति में ढाका पहले कूटनीतिक और राजनीतिक विकल्पों पर विचार करेगा। भारत के खिलाफ सीधा सैन्य मोर्चा खोलना बांग्लादेश के लिए बेहद महंगा और जोखिम भरा फैसला होगा, इसलिए आने वाले समय में असली तस्वीर उसके राजनीतिक फैसलों और क्षेत्रीय रणनीति से ही साफ होगी।
(त्रिपाठी पारिजात)



