Wednesday, December 17, 2025
Google search engine
HomeTop NewsBihar: दसवीं बार मिस्टर बिहार - नीतीश कुमार

Bihar: दसवीं बार मिस्टर बिहार – नीतीश कुमार

Bihar: कहानी जो दो दशक पहले शुरू हुई थी। संघर्ष की, बदलाव की, स्थिरता की, रणनीति की और गहरी राजनीतिक समझ की कहानी। और इस पूरी कहानी का केंद्र आज भी वही है—नीतीश कुमार..

Bihar: कहानी जो दो दशक पहले शुरू हुई थी। संघर्ष की, बदलाव की, स्थिरता की, रणनीति की और गहरी राजनीतिक समझ की कहानी। और इस पूरी कहानी का केंद्र आज भी वही है—नीतीश कुमार..

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की कहानी किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं लगती। इसमें उतार-चढ़ाव हैं, नाटकीय मोड़ हैं, जीत और हार के अनेक पल हैं, और सबसे बढ़कर वह लगातार चलने वाली राजनीतिक लड़ाई है जिसे उन्होंने कभी विराम नहीं लेने दिया।

यह सिर्फ एक नेता की व्यक्तिगत यात्रा नहीं, बल्कि उस राज्य की राजनीतिक तस्वीर भी है जहाँ हर बड़ा बदलाव किसी न किसी तरह नीतीश से जुड़ता रहा। कभी वे परिस्थिति के अनुसार बेहद संयमित दिखाई दिए, कभी बेहद कठोर और निर्णायक फैसले लेते नज़र आए, और कभी ऐसे रणनीतिकार साबित हुए जिन्होंने पूरा समीकरण बदल कर रख दिया। बिहार की राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं रहा, लेकिन एक चीज़ हमेशा कायम रही—नीतीश कुमार का भारी प्रभाव।

नीतीश की सबसे बड़ी ताकत यही रही कि उन्होंने हर दौर में खुद को नए सांचे में ढाला। शुरुआत में वे आंदोलनों में सक्रिय रहे, फिर लालू प्रसाद यादव के सबसे भरोसेमंद सहयोगी बने। वही लालू समय के साथ उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी बन गए। कभी वे बीजेपी के मजबूत साथी थे, फिर उसी पार्टी से दूर हो गए। कभी महागठबंधन के बड़े चेहरों में शामिल हुए, फिर उससे अलग होकर एक नया राजनीतिक रास्ता तैयार कर दिया।

यह उतार-चढ़ाव सिर्फ गठबंधन या दूरी बनाने भर के कदम नहीं थे, बल्कि यह दिखाते थे कि नीतीश सिर्फ राजनीति का हिस्सा नहीं—वे राजनीति की दिशा बदलने वाले नेता रहे हैं।

2025 का चुनाव इस बात की ताज़ा मिसाल है। 2020 में जब जेडीयू महज़ 43 सीटों के साथ सिमट गई थी, तब कई जानकारों ने मान लिया था कि उनका प्रभाव कम हो चुका है। लेकिन 2025 में उन्होंने 85 सीटें जीतकर न सिर्फ वापसी की, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि अनुभव, रणनीति और जनता पर भरोसा मिलकर राजनीति का पूरा चेहरा बदल सकते हैं। इस बार की जीत सिर्फ जीत नहीं थी, बल्कि एक ऐसी लहर थी जिसने पूरे राजनीतिक मुकाबले को नया मोड़ दे दिया।

नीतीश का राजनीतिक रास्ता कभी आसान नहीं रहा। 2005 में वे 88 सीटें जीतकर पहली बार पूरे बहुमत के साथ सत्ता में पहुंचे। 2010 में उनके काम, प्रशासनिक फैसलों और कानून-व्यवस्था सुधारों ने उन्हें 115 सीटों की ऐतिहासिक जीत दिलवाई। लेकिन 2015 में उनकी सीटें घटकर 71 रह गईं और 2020 में वे 43 सीटों पर आ गए। तब यह चर्चा तेज हो गई कि नीतीश का असर कमजोर पड़ रहा है। लेकिन बाज़ार की हर अटकल के उलट उन्होंने फिर दिखाया कि उनका राजनीतिक सफर रुकता नहीं—वह नए रूप में दोबारा लौटता है।

आज वे दसवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री बन चुके हैं। यह उपलब्धि देश के किसी भी अन्य मुख्यमंत्री के नाम नहीं है। तमिलनाडु की जयललिता हों या हिमाचल के वीरभद्र सिंह, ओडिशा के नवीन पटनायक हों या बंगाल के ज्योति बसु—ये सभी नेता छह बार या उससे कम बार ही मुख्यमंत्री बन पाए। लेकिन बिहार में यह अनोखा रिकॉर्ड केवल एक ही नेता के पास है—और वह हैं नीतीश कुमार।

उनकी यह यात्रा बख्तियारपुर की मिट्टी से शुरू हुई। परिवार में उन्हें प्यार से ‘मुन्ना’ बुलाया जाता था। पिता आयुर्वेदिक डॉक्टर थे और मां घर तथा खेत दोनों संभालती थीं। नीतीश पढ़ाई में हमेशा आगे रहे और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पटना पहुंचे। यहीं से उनकी नेतृत्व क्षमता सामने आने लगी। वे स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष बने, कई आंदोलनों में हिस्सा लिया और छात्रों के मुद्दों पर संघर्ष करते हुए राजनीति की ओर खिंचते चले गए।

इंजीनियर की नौकरी छोड़कर वे जेपी आंदोलन से जुड़े और यही आंदोलन उन्हें वास्तविक राजनीति में लेकर आया। 1977 और 1980 के चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 1985 में वे पहली बार विधानसभा पहुँचे। इसी दौरान वे लालू प्रसाद यादव के बेहद करीबी साथी बन गए। लेकिन जब लालू के शासन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगने लगे, तो नीतीश सबसे पहले उनसे अलग होने वाले नेता बने। समता पार्टी का निर्माण करके उन्होंने अपने स्वतंत्र राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत की और धीरे-धीरे अपनी पहचान मजबूत की।

2000 में वे पहली बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन यह कार्यकाल केवल सात दिन चला। हालांकि इन सात दिनों ने भी उनकी छवि को और मजबूत किया। 2005 में वे दोबारा सत्ता में आए और फिर उन्होंने बिहार के विकास, शासन सुधार और कानून-व्यवस्था पर बड़े बदलावों का दावा किया। 2010 में जनता ने इन्हीं बदलावों के भरोसे उन्हें और बड़ी जीत दी।

लेकिन जैसे-जैसे नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति में उभरते चले गए, बीजेपी और नीतीश के बीच दूरी भी बढ़ती गई। 2013 में नीतीश ने 17 साल पुराना गठबंधन खत्म कर दिया। 2014 में जेडीयू को केवल दो सीटें मिलीं और इस हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफा दे दिया। कुछ समय बाद उन्होंने जीतन राम मांझी से मुख्यमंत्री पद वापस लिया और फिर लालू के साथ हाथ मिलाया। 2015 में वे महागठबंधन के साथ सत्ता में लौटे। लेकिन यह गठबंधन कुछ ही वर्षों में टूट गया और 2017 में वे फिर बीजेपी के साथ आ गए।

2020 में जेडीयू कमजोर थी, लेकिन बीजेपी ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाए रखा। 2022 में वे फिर महागठबंधन में चले गए और 2024 में दोबारा बीजेपी के साथ आ गए। इन बार-बार बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच नीतीश ने हर बार अपना संतुलन बनाए रखा। और 2025 के चुनावों में जनता ने फिर स्पष्ट कर दिया कि बिहार में सबसे बड़ा राजनीतिक चेहरा अब भी वही हैं।

इस बार बिहार ने सिर्फ अपना वोट नहीं दिया, बल्कि उसने उस पुरानी कहानी को दोबारा जिंदा कर दिया है—वह कहानी जो दो दशक पहले शुरू हुई थी। संघर्ष की, बदलाव की, स्थिरता की, रणनीति की और गहरी राजनीतिक समझ की कहानी। और इस पूरी कहानी का केंद्र आज भी वही है—नीतीश कुमार।

(न्यूज़ हिन्दू ग्लोबल ब्यूरो)

 

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments