Wednesday, December 17, 2025
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Crime Time: चचेरे बहन-भाई ने एक साथ फाँसी लगाई

यह पता नहीं चल पाया कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि पूनम का व्यवहार इतना अनुचित हो गया। वह बिना किसी कारण ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगती, और कभी-कभी यूँ कड़ुवे आँसू बहाती मानो किसी नज़दीकी रिश्तेदार की मौत हो गई हो। अगर वह ऐसा न करती, तो मन-ही-मन बड़बड़ाती रहती और असंबद्ध बातें करती रहती।

ससुराल वाले परेशान थे—आख़िर उनकी बहू को हुआ क्या है! वे लोग पुरानी सोच वाले थे। वे भूत-पिशाच, टोने-टोटके और झाड़-फूँक पर विश्वास करते थे। इसलिए वे पूनम को एक ओझा (झाड़-फूँक करने वाले) के पास ले गए। उसने कुछ क्रियाएँ कीं और फिर कहा,
“जब किसी स्त्री के मासिक धर्म समाप्त होते हैं और वह नहाते समय बाल धोती है, तब उसका रूप और निखर जाता है और उसके शरीर से एक आकर्षक गंध निकलती है। पूनम भी बाल खोले घर के बाहर निकली थी। संयोग से एक जिन्न आसमान में कहीं जाने के लिए उड़ रहा था। उसने पूनम को देखा और मोहित होकर उसके शरीर पर क़ब्ज़ा कर लिया।”

पूनम के पति folded hands के साथ विनती करने लगे,
“महाराज, कृपया मेरी पत्नी को इस जिन्न से मुक्त कर दीजिए।”

ओझा बोला,
“यह जिन्न बहुत शक्तिशाली है। मेरे सभी शक्तियाँ इसके सामने कमजोर पड़ जाती हैं। तुम्हें इसे किसी और बड़े गुरु के पास ले जाना चाहिए।”

पूनम के पति उसे दूसरे तांत्रिक के पास ले गए। उसने भी पहले वाले ओझा की बातों की पुष्टि कर दी और इलाज शुरू कर दिया। लेकिन सुधार होने के बजाय पूनम की विचित्र हरकतें और बढ़ने लगीं। अब तो वह अपने परिजनों पर हमला करने भी लगी थी।

ससुराल वालों ने उसे तीसरे, चौथे और पाँचवें तांत्रिक के पास भी ले जाया। सभी दावा करते रहे कि वे मंत्र-तंत्र से उसे ठीक कर देंगे, लेकिन कोई भी उसे ठीक नहीं कर सका।

हर तरफ़ असफल होने के बाद पूनम के ससुराल वालों को विश्वास हो गया कि उस पर कोई अत्यंत शक्तिशाली प्रेत काबिज़ है, जिसे कोई तांत्रिक काबू नहीं कर सकता। उन्हें यह डर भी सताने लगा कि यदि पूनम और दिन घर में रही तो यह प्रेत पूरे परिवार को हानि पहुँचा सकता है। इसलिए उन्होंने तय किया कि उसे उसके मायके ही छोड़ देना उचित होगा।

एक दिन वे पूनम को मायके ले गए और कहा,
“इसका ख़याल रखना। हम अपनी जान जोखिम में डालकर इसे अपने घर में नहीं रख सकते। जब इस पर से भूत-प्रेत का असर उतर जाए, तो हमें सूचना दे देना—we will take her back.”

पूनम तो उनके लिए बेटी थी, इसलिए माता-पिता ने उसे घर में रख लिया।

31 वर्षीय पूनम बलकिशुन राजभर की बेटी थी। वह जौनपुर जिले के सतमेहसरा गाँव में रहता था। उसका एक भाई भी था—फेनकू। दोनों भाइयाँ अलग-अलग अपने परिवारों के साथ रहते थे।

बलकिशुन ने अपनी बेटी पूनम की शादी चंदवक थाना क्षेत्र के हिसमपुर गाँव में की थी। विवाह के एक वर्ष बाद पूनम ने एक बेटी—इच्छा—को जन्म दिया। इसी बीच किसी बीमारी से बलकिशुन की मौत हो गई। उनकी मृत्यु के बाद फेनकू ने अपने दिवंगत भाई के परिवार की जिम्मेदारी उठा ली, और किसी भी परेशानी से बचाने के लिए वह भाई के घर में रहने लगा।

फेनकू का अपना भी परिवार था—उसका 43 वर्षीय बेटा कमटा, जिसकी पत्नी राजवंती देवी थी। उनके दो बेटे और एक बेटी—अनिता—थी।

कमटा के परिवार में बच्चों की शादी जल्दी करने की परंपरा थी। जैसे ही उसके बेटे जवानी की दहलीज़ पर पहुँचे, उसने उनकी शादी करा दी। जल्दी विवाह होने पर बच्चे भी जल्दी हो जाते हैं। इसी परंपरा के चलते कमटा ने बेटी अनिता की शादी भी कम उम्र में कर दी। दोनों बेटे रोज़गार के लिए मुंबई चले गए।

कमटा के पास पैतृक उर्वर ज़मीन थी और खेती से घर का ख़र्च चल जाता था। ऊपर से बेटे भी पैसे भेजते थे। जीवन ठीक-ठाक चल रहा था कि अचानक राजवंती को किसी बीमारी ने जकड़ लिया। कमटा ने बहुत इलाज कराया, पर कोई सुधार नहीं हुआ और अंततः 18 महीने पहले उसकी मृत्यु हो गई।

राजवंती की मौत को एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था कि पूनम के ससुराल वाले उसे मायके छोड़ गए।
“इसके शरीर पर भूतों ने कब्ज़ा कर लिया है। कोई कहता है जिन्न चढ़ा, कोई कहता है प्रेत सताता है। हम इलाज कराकर थक चुके हैं—अब आप जो कर सकते हैं, करें।”

फेनकू ने अपनी भतीजी के सिर पर हाथ रखा,
“बेटी, अगर बलकिशुन नहीं रहे, तो मैं हूँ। जब तक मैं ज़िंदा हूँ, तुम चिंता मत करो।”

फेनकू ने पूनम और इच्छा की ज़िम्मेदारी कमटा को सौंपते हुए कहा,
“बेटा, पूनम तुम्हारी छोटी बहन जैसी है। इसका अच्छा इलाज करवाओ। ठीक हो जाएगी तो ससुराल चली जाएगी—और तुम्हें भी पुण्य मिलेगा। बहन-बेटी पर खर्चा कभी कम नहीं होता, बढ़ता ही है।”

फेनकू ने पूनम और इच्छा को कमटा के साथ भेज दिया,
“जब तक पूनम पूरी तरह ठीक न हो जाए, अपने घर पर रखना। राजवंती की मौत से जो मनहूस माहौल छाया है, वह इनके रहने से दूर भी हो जाएगा।”

पूनम कमटा से 12 साल छोटी थी। वह राखी बाँधती थी, भाई-दूज पर तिलक करती थी, और कमटा भी उसे असली बहन की तरह ही मानता था। इसलिए वह पूनम और इच्छा को घर ले आया।

कमटा भूत-प्रेत में विश्वास नहीं करता था। उसे लगा कि पूनम पर भूत नहीं चढ़ा है; बल्कि वह किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित है। उसका डॉक्टर से इलाज होना चाहिए।

अगले दिन कमटा उसे जौनपुर के मानसिक रोग विशेषज्ञ के पास ले गया। जाँच के बाद डॉक्टर ने कुछ परीक्षण और दवाएँ लिखीं और कहा,
“एक साल तक ये दवाएँ नियमित रूप से दें—पूरी तरह ठीक हो जाएगी।”

कमटा ने महँगी दवाएँ दिलाईं, पर कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ। उसे लगा कि इलाज ठीक नहीं है, और किसी दूसरे डॉक्टर से दिखाना चाहिए।

लेकिन किसे दिखाया जाए?
कमटा को एक झोला-छाप डॉक्टर (क्वैक) के बारे में पता था। वह उसके पास गया और समस्या बताई। कुछ सोचने के बाद झोलाछाप बोला,
“ये बड़े डॉक्टर दिखावा ज़्यादा करते हैं। अगर तुम चाहो, तो मैं तुम्हारी बहन को ठीक कर सकता हूँ।”

कमटा चकित था, “आप… ठीक करेंगे?”

“क्यों नहीं! बड़ी तलवार नाकाम हो जाए तो सुई काम कर जाती है। मुझे एक मौका दो—भगवान चाहेंगे तो यह पूरी तरह ठीक हो जाएगी।”

कमटा ने सोचा—अगर यह भी कोशिश कर ले, तो क्या हर्ज है।

अगले दिन वह पूनम को झोलाछाप के पास ले गया। उसने आँखें, जीभ, सिर दबाया, फिर गर्दन, कमर, पीठ और शरीर के कई हिस्सों में उँगलियाँ फेरकर जाँच की। फिर पूछा,

“शादी को कितना समय हुआ?”

“चार साल।”

“बच्चे हुए?”

“एक दो साल की बच्ची है।”

“तुम्हारा पति हर रोज़ तुम पर प्रेम लुटाता है?”

कमटा पास बैठा था, इसलिए पूनम कैसे अपनी वैवाहिक बातें खुलकर बताती! वह शर्म से सिर झुका गई।

झोलाछाप ने उसकी झिझक समझ ली,
“तुम्हें शर्माने की ज़रूरत नहीं है। तुम्हारे इलाज की कुंजी इसी सवाल में है। खुलकर बताओ—क्या तुम्हारा पति रोज़ तुम्हारे साथ संबंध बनाता है या नहीं?”

पूनम ने धीमी आवाज़ में कहा,
“वह महीने में दो-तीन बार ही मिलता है…”

“बस! मुझे कोई और सवाल करने की ज़रूरत नहीं।”

उसने पूनम को हटाकर कमटा को बुलाया,
“मैंने बीमारी पकड़ ली है। मेरी सलाह मान ली, तो जल्दी ठीक हो जाएगी।”

कमटा बोला,
“डॉक्टर साहब, मैं आपकी हर बात मानूँगा—बस बहन ठीक हो जाए।”

झोलाछाप ने विटामिन की एक सीलबंद डिब्बी दी,
“सुबह-शाम एक गोली दूध के साथ देना।”

कमटा ने पूछा, “कोई परहेज़?”

“इसके दिमाग़ में गर्मी भर गई है। जब तक ये गर्मी शांत नहीं होगी, ठीक नहीं होगी। इसे मसालेदार भोजन मत देना—सादा और ठंडे प्रभाव वाला भोजन दें।”

“ठीक है, डॉक्टर साहब।”

“अगर इसे ससुराल भेज दो और पति रोज़ इसके साथ संबंध बनाए, तो यह ‘दिमाग़ की गर्मी’ जल्दी उतर जाएगी। इससे बेहतर इलाज कुछ नहीं है।”

कमटा और पूनम स्तब्ध रह गए। वे चुपचाप लौट आए।

घर पहुँचते समय कमटा सोचता रहा—
क्या सच में पति-पत्नी का संबंध न होने से ‘दिमाग़ में गर्मी’ चढ़ जाती है?
क्या पूनम इसलिए पागलों जैसी हरकतें कर रही थी?
अगर ऐसा है, तो राजवंती की मौत के बाद मेरे दिमाग़ में भी ‘गर्मी’ चढ़ जाएगी?
क्या मैं भी पूनम जैसा बड़बड़ाने लगूँगा?

घर पहुँचकर वह और उलझ गया कि पूनम भी यही सोच रही होगी—कि अगर वह ससुराल में रहती, तो कभी-कभी पति का स्नेह मिल ही जाता और शायद उसका मन शांत रहता।

कमटा ने कहा,
“तुमने डॉक्टर की बातें सुन लीं। अगर तुम हिसमपुर लौटना चाहो, तो मैं छोड़ दूँ?”

पूनम ने तुरंत कहा,
“नहीं भैया। वहाँ से एक बार निकल आई हूँ—अब उस नर्क में नहीं जाऊँगी। चाहे ठीक हो जाऊँ या मर जाऊँ—ससुराल नहीं जाऊँगी।”

बहन ने इंकार किया—तो भाई क्या करता। वह खेत में चला गया।

पर खेत में भी वह डॉक्टर की बातें भूल नहीं पा रहा था।
पूनम पति के अभाव में पीड़ित थी, और कमटा पत्नी के अभाव में।
फिर उसके मन में एक गंदी सोच उठी—
दोनों एक ही पीड़ा झेल रहे हैं… दोनों एक-दूसरे को राहत दे सकते हैं…
वैसे भी चचेरे भाई-बहन के संबंधों को आजकल कुछ ख़ास नहीं माना जाता…

जब वासना आदमी पर हावी हो जाए और सोच भ्रष्ट हो जाए—तो रिश्ता भी पवित्र नहीं रहता। कमटा ने सोचा—पूनम और मैं दोनों एक ही दर्द झेल रहे हैं। शायद पूनम भी मेरे बारे में उसी तरह सोच रही हो—तभी तो वह ससुराल नहीं जाना चाहती।

उस रात उसने कोशिश करने की ठान ली।

रात में दोनों एक ही कमरे में थे—कमटा खाट पर और पूनम इच्छा के साथ लकड़ी के बिस्तर पर। रात गहराने लगी और उसके मन में वासना उबलने लगी। वह पूनम की ओर देखने लगा। फिर उसने हाथ बढ़ाकर उसके स्तन पर रख दिया।

पूनम के शरीर में कंपन हुआ, पर उसने आँखें बंद रखीं। इससे कमटा और बढ़ गया और उसने उसके शरीर को सहलाना शुरू किया।

पूनम के मुँह से एक धीमी-सी साँस निकली और उसने आँखें खोल दीं। कमटा हटना चाहता था, पर उसने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे आलिंगन में भर लिया,
“मैं तुम्हारे लिए ही ससुराल नहीं गई,” उसने फुसफुसाया।

फिर कोई झिझक या भय न रहा।
कमटा ने उसे बाँहों में भरकर चूमना शुरू किया—और दोनों ने सारी हदें पार कर दीं।

इसके बाद दोनों काफ़ी समय तक अनैतिक संबंधों में लिप्त रहे।

धीरे-धीरे पूनम ने बताया कि न तो उस पर कोई भूत था, न प्रेत—वह सिर्फ़ अपने पति और ससुराल वालों से नाखुश थी। इसलिए उसने मानसिक बीमारी का नाटक रचा, ताकि छुटकारा मिले। और उसकी मंशा पूरी हो गई।

मायके आकर पूनम कमटा के घर ही रहने लगी और दिल-ही-दिल में उससे प्रेम करने लगी। वह चाहती थी कि काश… कमटा उससे शादी कर ले। इसलिए उसने पहली रात तुरंत समर्पण कर दिया।

लेकिन यह रिश्ता ज़्यादा दिन छिप न सका। रिश्तेदारों और पड़ोसियों को पता चल गया। सब हैरान थे। बहुत समझाया गया, मगर दोनों नहीं माने।

गाँव में चर्चा फैलते ही बुज़ुर्गों ने पंचायत बुलाई। उन्हें डाँटा गया कि यह भाई-बहन के रिश्ते को कलंकित कर रहे हैं और गाँव का माहौल बिगाड़ रहे हैं। उन्होंने सुधार का वादा किया, लेकिन चाल-चलन नहीं बदला।

कुछ दिन बाद फिर पंचायत बैठी। इस बार चेतावनी दी—दो दिन में सुधार करो, वरना गाँव छोड़ दो।

वे न सुधरे, न सुधरना चाहते थे। पति-पत्नी की तरह रहने लगे।

तीसरी पंचायत 10 मार्च 2015 को बुलाई गई। फैसला हुआ कि यदि दो दिनों में गाँव न छोड़ा, तो उनकी चेहरे काले करके गाँव से बाहर निकाल दिया जाएगा।

फैसला सुनकर दोनों घर लौट आए।

11 मार्च को सुबह देर तक कमटा का दरवाज़ा न खुला। पड़ोसी बाल्मुकुंद ने कई बार खटखटाया, आवाज़ दी—कोई जवाब नहीं। उसने चंदवक थाने के एसएचओ शशिभूषण राय को सूचना दी।

राय और केराकत के CO अशोक सिंह तुरंत सतमेहसरा गाँव पहुँचे। पुलिस ने दरवाज़ा तोड़कर अंदर प्रवेश किया—तो देखा कि पूनम और कमटा फाँसी के फंदे से लटके हुए थे। तीन वर्ष की इच्छा फर्श पर मृत पड़ी थी।

कोई सुसाइड नोट नहीं मिला।
जाँच में पुलिस ने निष्कर्ष निकाला कि पूनम और कमटा समाज के दबाव में अलग-अलग नहीं रहना चाहते थे। इसलिए पहले उन्होंने मासूम इच्छा का गला दबाकर हत्या की, फिर खुद फाँसी लगा ली।

पोस्ट-मार्टम ने भी यही पुष्टि की—इच्छा की मौत गला दबाने से हुई, और दोनों की फाँसी से।
और चौंकाने वाली बात—पूनम छह महीने की गर्भवती थी।

एक साल से वह ससुराल नहीं गई थी, और पति भी नहीं आया था—इसलिए साफ था कि गर्भ कमटा का था। संभवतः इसी कारण दोनों ने आत्महत्या कर ली।

पोस्ट-मार्टम के बाद दोनों का अंतिम संस्कार सतमेहसरा गाँव में किया गया।

(कौशलेंद्र देवगिरी, जौनपुर)

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