Joseph Stalin: प्रणाम हैं ऐसे लोगों को जिनकी सादगी पीढ़ियों तक निकम्मे ऐशपसंद नेताओं को मार्गदर्शन का प्रयास करती है..
विंस्टन चर्चिल ने अपनी किताब ‘Memoirs of Second World War’ में एक ऐसा वाकया लिखा है, जिसे पढ़ कर आप हैरान रह जाएंगे। यह कहानी रूस के बड़े नेता जोसेफ स्टालिन और उनकी सादगी की है। चर्चिल लिखते हैं कि एक बार वो समझौते के लिए मास्को गए थे।
लौटने से एक दिन पहले स्टालिन खुद उनके पास आए और बोले, “कल तो आप चले ही जाएंगे, आज थोड़ा वक्त साथ बिताते हैं। मेरे घर चलिए।” स्टालिन ने चर्चिल से कहा कि साथ में कोई बॉडीगार्ड ले जाने की ज़रूरत नहीं है।
जब वे स्टालिन के घर पहुंचे, तो चर्चिल हैरान रह गए। जिसे वो दुनिया का एक ताकतवर तानाशाह समझते थे, वो सिर्फ एक 3 कमरे के छोटे से फ्लैट में रहता था। ऊपर वाली मंजिल को उन्होंने अपने गुरू ‘लेनिन’ की याद में म्यूजियम बना दिया था और खुद नीचे के हिस्से में रहते थे।
लेकिन असली झटका तो अभी बाकी था।
जब चर्चिल ने पूछा कि खाना कौन बनाएगा, तो स्टालिन बोले, “मैं और मेरी पत्नी मिल कर खाना बनाते हैं। हमारे पास कोई रसोइया (Cook) नहीं है।”
चर्चिल ने कहा कि चलिए आज आप मेरे पास बैठिए, आपकी पत्नी खाना बना लेंगी। इस पर स्टालिन ने जवाब दिया, “वो अभी घर पर नहीं हैं, वो एक कपड़े के कारखाने (Factory) में काम करने गई हैं। 5 बजे छुट्टी होगी, तब आकर खाना बनाएंगी।”
सोचिए, दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में से एक रूस का लीडर, जिसकी एक आवाज़ पर दुनिया कांपती थी, उसकी पत्नी एक आम मजदूर की तरह कारखाने में काम करती थी और वो खुद अपना खाना बनाते थे।
यही फर्क होता है उन लोगों में जो जनता के लिए जीते हैं, जिनके लिए पद ‘ऐशो-आराम’ नहीं, बल्कि एक ‘जिम्मेदारी’ होता है। हरामखोरी और अय्याशी की आदत रखने वाले अंग्रेज शासकों के लिए यह बात किसी सदमे से कम नहीं थी।
सलाम है ऐसी सादगी को।
(राजेश शुक्ला)



