Sinking Cities: डूबते महानगर: वैज्ञानिकों की चेतावनी—शंघाई, ढाका, कराची जैसे 40 शहर समुद्र और ज़मीन के दोहरे खतरे में..
दुनिया के लगभग 40 बड़े और चमकते शहर आज एक ऐसे खतरे के मुहाने पर खड़े हैं, जिसे समझना ही डर पैदा कर देता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह कोई कल्पना या फिल्मी कहानी नहीं है, बल्कि आने वाले समय की सच्चाई है। एक तरफ समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है और दूसरी तरफ जमीन धीरे-धीरे धंसती जा रही है। इन दोनों प्रक्रियाओं ने मिलकर एक ऐसा संकट खड़ा कर दिया है, जिससे बच पाना बेहद मुश्किल हो सकता है।
शंघाई, कराची, ढाका और न्यू ऑरलियन्स जैसे शहर अब सीधे प्रकृति की मार के दायरे में आ चुके हैं। दुनिया फिलहाल राजनीति, युद्ध और ताकत की होड़ में उलझी हुई है, लेकिन प्रकृति बिना शोर किए अपना संतुलन बदल रही है—और इसका असर इन महानगरों पर साफ दिखने लगा है।
यह चेतावनी प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका वन अर्थ (One Earth) में प्रकाशित एक रिपोर्ट में सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार समुद्र किनारे बसे 40 डेल्टा शहर अब पहले की तरह सुरक्षित नहीं रहे। करीब 30 करोड़ लोग ऐसे इलाकों में रह रहे हैं, जहां बाढ़ का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खतरा किसी बड़े विस्फोट से कम नहीं है, फर्क सिर्फ इतना है कि प्रकृति तबाही की कोई पहले से सूचना नहीं देती—वह चुपचाप हालात बदल देती है।
सबसे अधिक जोखिम में चीन के शंघाई, निंगबो और ग्वांगझू जैसे विशाल शहर हैं। इसके अलावा म्यांमार का यांगून, बांग्लादेश की राजधानी ढाका, पाकिस्तान का कराची और अमेरिका का न्यू ऑरलियन्स भी गंभीर खतरे की सूची में हैं। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि अगर इन शहरों ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था और शहरी योजना में समय रहते बदलाव नहीं किए, तो उन्हें वैसी ही तबाही झेलनी पड़ सकती है जैसी 2005 में हरिकेन कैटरीना के दौरान न्यू ऑरलियन्स में हुई थी।
कई शहर समुद्र से बचाव के लिए ऊंची दीवारों और मजबूत बांधों पर भरोसा कर रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समाधान स्थायी नहीं है। अगला बड़ा समुद्री तूफान इन दीवारों को कमजोर कर सकता है और अगर वे टूट गईं, तो नुकसान कई गुना ज़्यादा होगा।
इस पूरे संकट में सबसे डरावनी स्थिति को पोल्डर फ्लड कहा जाता है। यह आम बाढ़ से बिल्कुल अलग होती है। जब समुद्री दीवारें टूट जाती हैं, तो पानी शहर में भर जाता है और फिर बाहर नहीं निकल पाता। वजह यह है कि कई शहर समुद्र के स्तर से नीचे धंसते जा रहे हैं। ऐसे में वे एक कटोरे जैसे बन जाते हैं, जिसमें पानी तो आता है लेकिन बाहर जाने का रास्ता नहीं मिलता। जब तक दीवारें फिर से नहीं बनतीं और मशीनों से पानी निकाला नहीं जाता, तब तक शहर डूबे रहते हैं।
वैज्ञानिकों ने इस खतरे को समझने के लिए शंघाई का एक डिजिटल मॉडल तैयार किया। इसमें पिछले 50 वर्षों के 10 सबसे खतरनाक तूफानों का डेटा और अगले 75 सालों के जलवायु अनुमान शामिल किए गए। नतीजे बेहद चौंकाने वाले रहे। अनुमान है कि साल 2100 तक शंघाई में तूफानों से डूबने वाला इलाका करीब 80 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।
दूसरे शब्दों में कहेंतो लगभग पूरा शहर पानी के जोखिम में आ जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ दीवारों को ऊंचा करना समाधान नहीं है, क्योंकि जितनी ऊंची दीवार होगी, उसके टूटने पर तबाही उतनी ही ज़्यादा होगी।
तो सवाल उठता है—क्या इससे बचा जा सकता है? वैज्ञानिक मानते हैं कि अब सिर्फ कंक्रीट और सीमेंट पर भरोसा करने का समय खत्म हो चुका है। शहरों को कई स्तरों वाली सुरक्षा व्यवस्था अपनानी होगी। कुदरत के साथ मिलकर योजना बनानी होगी। ऐसे शहर तैयार करने होंगे जो स्पंज की तरह पानी को सोख सकें। पानी को रोकने की जगह उसके बहाव के लिए रास्ते देने होंगे। कई हालात में पीछे हटना ही सबसे समझदारी भरा फैसला हो सकता है।
अगर मानव समाज ने अब भी चेतावनी को नजरअंदाज किया, तो आने वाले दशकों में शंघाई, कराची और ढाका जैसे शहर सिर्फ इतिहास की किताबों में दर्ज नाम बनकर रह जाएंगे। प्रकृति अपने नियमों से चलती है, और जब वह बदलाव का फैसला करती है—तो न शहर टिक पाते हैं, न दीवारें और न ही आधुनिक तकनीक।
(प्रस्तुति -अर्चना शैरी)



