Thank You, Kismat: भटका हुआ आखिर घर लौट आया – 14 साल का बिहार का बच्चा 4 महीने तक बंधुआ मज़दूरी में फंसा – 200 किमी की तलाश के बाद यातनाकार गिरफ्तार
बिहार के किशनगंज जिले के 15 वर्षीय संतोष के परिवार के लिए बीते चार महीने किसी बुरे सपने से कम नहीं थे। हर गुजरता दिन इसी डर में बीतता रहा कि उनका बेटा ज़िंदा है भी या नहीं।
यह भयावह कहानी उस दिन शुरू हुई, जब संतोष अपने पिता के साथ फरक्का एक्सप्रेस से सफर कर रहा था। हरियाणा के बहादुरगढ़ स्टेशन पर वह खाने का सामान लेने के लिए ट्रेन से उतरा, लेकिन ट्रेन बिना रुके आगे बढ़ गई और वह वहीं अकेला छूट गया।
यही एक पल उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी की शुरुआत बन गया।
चार महीने तक बंधुआ मज़दूरी और शारीरिक यातनाएं
भटके हुए इस नाबालिग को एक व्यक्ति ने बहला-फुसलाकर अपने साथ रख लिया और उसे जबरन डेयरी में बंधुआ मज़दूर बना दिया गया। काम के दौरान एक हादसे में संतोष का हाथ कट गया, लेकिन इसके बावजूद उसे अस्पताल ले जाने के बजाय छोड़ दिया गया।
उसके बड़े भाई जितेंद्र कहते हैं –
“मेरी मां डेढ़ महीने तक कुछ खाती ही नहीं थीं। हमें बस यही जानना था कि हमारा भाई ज़िंदा है या नहीं। अपराधी से ज़्यादा ज़रूरी था उसे ढूंढ पाना।”
200 किलोमीटर की जांच के बाद मिली बड़ी सफलता
30 दिसंबर को बहादुरगढ़ जीआरपी ने 200 किलोमीटर के दायरे में फैली लंबी और जटिल जांच के बाद आरोपी अनिल कुमार को गिरफ्तार कर लिया।
इस जांच में हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कई जिलों में सैकड़ों सुरागों की पड़ताल की गई।
ऑपरेशन का नेतृत्व कर रहे इंस्पेक्टर सत्य प्रकाश के अनुसार,
“यह केस लगातार और बेहद सूक्ष्म जांच की मांग करता था। लड़के की याददाश्त से मिले हर छोटे संकेत ने हमें आरोपी तक पहुंचाया।”
यमुना किनारे मिली पहचान
जांच के दौरान संतोष को याद आए -डेयरी का लेआउट, नीला ट्रैक्टर, चारा काटने की मशीन, और यमुना नदी का किनारा। इन्हीं सुरागों से आरोपी की पहचान ग्रेटर नोएडा के मोतीपुर गांव में हुई।
अनिल कुमार ने पुलिस के सामने स्वीकार किया कि उसने संतोष से जबरन मजदूरी करवाई और हादसे के बाद डर के कारण उसे अस्पताल ले जाने की बजाय छोड़ दिया।
अस्पताल से भागा, फिर दो शिक्षकों ने बचाया
27 जुलाई को स्थानीय लोगों ने घायल संतोष को हरियाणा के पलवल अस्पताल पहुंचाया, जहां उसके कटे हाथ का इलाज हुआ। इसके बाद उसे नूंह मेडिकल कॉलेज भेजा गया, लेकिन वह सदमे की हालत में अस्पताल से भाग गया। अगले दिन दो शिक्षकों ने उसे ढूंढकर सुरक्षित बचाया।
अब घर लौट आया है संतोष
आज संतोष किशनगंज अपने घर लौट चुका है, तीन ऑपरेशनों के बाद उसका हाथ ठीक हो चुका है और वह धीरे-धीरे पढ़ाई में लौट रहा है। परिवार अब उसके मानसिक और भावनात्मक इलाज पर ध्यान दे रहा है।
उसके भाई जितेंद्र कहते हैं – “अब हमें लगता है कि आखिरकार इंसाफ मिला है।”
(प्रस्तुति -त्रिपाठी अर्चना)



