Wednesday, February 4, 2026
Google search engine
Homeसाहित्यPoetry by Manmeet Soni: एक वामपंथी कवि और क्या तुमने मेरे जितना...

Poetry by Manmeet Soni: एक वामपंथी कवि और क्या तुमने मेरे जितना पढ़ा है? साले अनपढ़ !

Poetry by Manmeet Soni: मुझे तो कई बार डर लगने लगता है कि वामपंथी कवि कहीं यह घोषणा न कर दे : “तुम्हारी पत्नी भी तुम्हारी बहिन है”!..

Poetry by Manmeet Soni: मुझे तो कई बार डर लगने लगता है कि वामपंथी कवि कहीं यह घोषणा न कर दे : “तुम्हारी पत्नी भी तुम्हारी बहिन है”!..

वामपंथी कवि होना
एक अनर्थ है
जिसे वह स्वयं नहीं देख सकता
जिसे कोई अगर उसे दिखाना चाहे तो वह भड़क जाता है
और चीख़ कर कहता है :
“क्या तुमने मेरे जितना पढ़ा है? साले अनपढ़!”
चलिए मकर संक्रांति से शुरू करते हैं
इस त्योहार पर
वामपंथी कवि
वह बच्चा नहीं बनता
जिसकी पतंग आकाश छू रही होती है
बल्कि वह कबूतर, तोता, मैना और मोर बन जाता है
वह बुरी तरह कसमसाने लगता है
वह छत पर खड़े हर पतंगबाज़ को
छत से नीचे उतार देना चाहता है और उससे कहना चाहता है :
“क्या तुमने मेरे जितना पढ़ा है? साले अनपढ़!”
हालांकि वह
तिल के लड्डुओं को भकोसते हुए
प्रोफ़ाइल फ़ोटो ज़रूर बदलता है
मगर यह भी कहना नहीं भूलता
“काहे का उत्तरायण दक्षिणायण?
यह सब ब्राह्मणों की साज़िश है, लोगों!”
होली पर वामपंथी कवि
ख़ूब शराब पीता है
भांग छानता है
अफीम चाटता है
लेकिन यह कहना नहीं भूलता :
“मुसलमानों को होली खेलने के लिए बाध्य न करें!”
हालांकि वामपंथी कवि की सारी उम्र
यही साबित करने में चली जाती है
मुसलमान यहीं के मूल निवासी हैं
वे कहीं बाहर से नहीं आए –
आर्यों के बारे में पूछने पर
भड़क जाता है वामपंथी कवि
और फिर से वही बात कहता है :
“क्या तुमने मेरे जितना पढ़ा है? साले अनपढ़!”
रक्षाबंधन पर
वामपंथी कवि के भीतर की स्त्री
अचानक जाग जाती है
मुझे तो कई बार डर लगने लगता है
कि वामपंथी कवि कहीं यह घोषणा न कर दे :
“तुम्हारी पत्नी भी तुम्हारी बहिन है”!
ख़ैर,
वह हर लड़की से कहता है
तुम्हें क्या ज़रूरत है भाई की
तुम्हारे भाई में अगर एक बलात्कारी नहीं छुपा होता
तो हर साल इतने बलात्कार कैसे हो सकते थे?
वामपंथी कवि
सीधी सरल गंगा जैसी लड़कियों में
घोल देना चाहता है तेज़ाब
और इसे जागरूकता कहता है
मुझे मालूम है यह पंक्तियाँ पढ़कर
हर वामपंथी यही कहेगा :
“यह तो हमारा साधारणीकरण हो गया!”
और फिर वही बात दोहराएगा :
“क्या तुमने मेरे जितना पढ़ा है? साले अनपढ़!”
दीपावली पर
दुनिया जहान का सारा धुआँ
अकेले वामपंथी कवि की छाती में गुड़गुड़ाने लगता है
उसे खांसी नहीं आती
तब भी वह कविता में ज़रूर खाँसता है
उसका बस चले
तो वह श्वास-नली में दो फुट का सरिया डाल कर
उसमें ज़ख़्म कर ले
और टिकड़ी छोड़ते हुए बच्चे पर टूट पड़े :
चीख़ कर कहे :
क्या सीता को छोड़ देने वाले उस राम के समय पटाखे थे?”
और जब बच्चा सहम जाए
तो सीना फुलाकर कहे :
“क्या तुमने मेरे जितना पढ़ा है? साले अनपढ़!”
आपको लग रहा होगा
अब मैं ईद और मुहर्रम और बारावफ़ात और क्रिसमस की बात करूँगा
और यह साबित कर दूंगा
कि इन त्योहारों पर वामपंथी कितना ख़ुश होता है :
जैसे आज ही उसका जन्म हुआ हो!
आप ठीक सोच रहे हैं
लेकिन मैं
वामपंथी कवि के रंग में भंग नहीं डालूंगा
वैसे भी मैंने यह जो कुछ लिखा है
उसे गुदगुदी करने के लिए ही लिखा है –
क्योंकि वह मुझे भी यही कहेगा :
“क्या तुमने मेरे जितना पढ़ा है? साले अनपढ़!”
कभी कभी मैं सोचता हूँ
(हाँ, भाई! दक्षिणपंथी भी सोचते हैं)
वामपंथी कवि
आख़िर क्या, क्यों, कैसे और कितना पढ़ता है
कि वह पढ़ नहीं पाता
एक सीधा सरल सहज जीवन!
वामपंथी कवि से
उसका पूरा नाम पूछ लो
तो वह भड़क जाता है :
“साले! तुझ पर SC ST एक्ट लगा दूंगा”!
वामपंथी कवि से
कोई चाय पानी पूछ ले
तो भी वह भड़क जाता है :
“साले! तू मुझे मेरी जाति याद दिला रहा है ना?”
वामपंथी कवि की
कविता की कोई तारीफ़ कर दे
तो वह बहुत ख़ुश होता है
फिर अचानक उसे कुछ याद आता है
और वह चिल्ला कर कहता है :
“साले! मेरी आलोचना भी कर! वरना मैं आलोचकों को क्या मुँह दिखाऊंगा?”
वामपंथी कवि से
कोई यह पूछ ले
और घर परिवार में सब कैसे हैं
तो वह जान लेने पर उतारू हो जाता है
और कॉलर पकड़ लेता है :
“यह सारा विश्व मेरा परिवार है! तुम मुझे सिर्फ़ चार लोगों से कैसे बाँध सकते हो?”
वामपंथी कवि होना
दोधारी तलवार की धार पर चलना है दोस्तो
और फिर जलेस-प्रलेस जैसे संगठनों की
कितनी ज़िम्मेदारी है उस पर
वह जोकराना जीवन नहीं जिए
तो कितनी भद्द पिटे उसकी
उसके समानधर्मा जोकरों के बीच!
पैसे और पूँजी का नाम सुनते ही
जो एक किलोमीटर दूर जा कर गिरता है
वही वामपंथी कवि
उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार से
पर्स्नल गाड़ी करके
पहुँचता है दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले, प्रगति मैदान में :
एक विमोचन और हज़ार सेल्फियों के लिए!
लाल कुरता
लाल गमछा
लाल पायजामा
अहा!
ख़ुद लाल रंग भी
बेचारा शर्म से गड़ जाता है
कि साला मैं भी इतना लाल नहीं हूँ!
इससे ज़्यादा क्या कहूं दोस्तों,
हालाँकि ऐसी कितनी ही बातें हैं
जो मैं लिख सकता हूँ
लेकिन मैं क्या जवाब दूंगा वामपंथी कवि को
जब वह मुझसे पूछेगा :
“क्या तुमने मेरे जितना पढ़ा है? साले अनपढ़!”
हे विद्वान शिरोमणि वामपंथी कवि
हे दीन हीन दुनिया के दीन दयाल
हे पूँजी के नष्टकर्ता अधैर्यशाली दैव
हे अपनी ही जैसी स्त्रियों के मन में बसने वाले लालवस्त्रधारी
क्षमा! क्षमा करें! मुझे मेरे नाथ :
इससे पहले कि आप मुझसे पूछें :
“क्या तुमने मेरे जितना पढ़ा है? साले अनपढ़ मनमीत!”
मैं बस यह कहना चाहता हूँ :
“पुस्तकें पढ़ी हों न पढ़ी हों
आदमी बहुत पढ़े हैं मैंने साहब!”
(मनमीत सोनी)
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments