Sunday, March 1, 2026
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Khamenei: एक मौलवी से ईरान के सुप्रीम लीडर कैसे बने अली खामेनेई? – कौन हैं उनके वारिस मोजतबा खामेनेई?

Khamenei: ईरान में खामेनी के खात्मे के साथ अंत हुआ एक कट्टरपंथी युग का - जानिये कैसे ईरान के भाग्यविधाता बने खामेनी - कौन है उनका वारिस जो ईरान का अगला सुप्रीमो है..?

Khamenei: ईरान में खामेनी के खात्मे के साथ अंत हुआ एक कट्टरपंथी युग का – जानिये कैसे ईरान के भाग्यविधाता बने खामेनी – कौन है उनका वारिस जो ईरान का अगला सुप्रीमो है..?

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की खबर ने पूरी दुनिया में हड़कंप मचा दिया है। अमेरिका और इजरायल के हवाई हमलों में खामेनेई की जान चली गई। जिस समय हमला हुआ, वो अपने दफ्तर में मौजूद थे। इस हमले में उनके परिवार के कई सदस्य—बेटी, पोती, बहू और दामाद—भी मारे गए।

इस घटना के बाद ईरान में एक हफ्ते का सार्वजनिक अवकाश और 40 दिनों के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की गई है। 86 साल की उम्र में उनकी मौत के साथ ही मिडिल ईस्ट की राजनीति और शिया वर्ल्ड के सबसे बड़े लीडर का एक बड़ा और प्रभावशाली अध्याय खत्म हो गया है।

कौन थे अयातुल्लाह अली खामेनेई?

अयातुल्लाह अली खामेनेई पिछले 37 सालों से ईरान के सबसे ताकतवर नेता थे। वे सिर्फ देश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री जैसे नेता नहीं थे, बल्कि “सुप्रीम लीडर” थे। ईरान में सुप्रीम लीडर का पद सबसे ऊंचा होता है। सेना, न्यायपालिका, मीडिया और कई अहम संस्थाएं सीधे उन्हीं के नियंत्रण में होती हैं।

उनका जन्म 19 अप्रैल 1939 को ईरान के मशहद शहर में हुआ था। वे एक साधारण धार्मिक परिवार से थे। उनके पिता एक मौलवी थे। बचपन से ही उन्होंने धार्मिक शिक्षा लेना शुरू कर दिया था। आगे की पढ़ाई के लिए वे कुम शहर गए, जो ईरान में धार्मिक शिक्षा का बड़ा केंद्र माना जाता है।

अयातुल्लाह खुमैनी से मुलाकात और जीवन में बदलाव

कुम में उनकी मुलाकात ईरान की इस्लामी क्रांति के नेता अयातुल्लाह रुहुल्लाह खुमैनी से हुई। खुमैनी के विचारों ने खामेनेई को गहराई से प्रभावित किया। वे धीरे-धीरे उनके करीबी शिष्यों में शामिल हो गए।

1960 और 1970 के दशक में ईरान में शाह के खिलाफ आंदोलन चल रहे थे। उस समय ईरान पर शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन था, जिन्हें अमेरिका का समर्थन था। खामेनेई ने शाह के खिलाफ प्रदर्शनों में हिस्सा लिया और कई बार जेल भी गए। शाह की पुलिस ने उन्हें छह बार गिरफ्तार किया।

1979 की इस्लामी क्रांति और राजनीतिक उभार

1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई। खुमैनी के नेतृत्व में शाह की सत्ता को हटा दिया गया और ईरान इस्लामी गणराज्य बन गया। इस क्रांति के बाद खामेनेई तेजी से सत्ता के केंद्र में आ गए। वे नई सरकार के मजबूत स्तंभ बने।

1981 में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन पर बम से हमला हुआ। वे बच गए, लेकिन उनका दाहिना हाथ हमेशा के लिए कमजोर हो गया।

राष्ट्रपति पद और ईरान-इराक युद्ध

1981 में उन्हें ईरान का राष्ट्रपति बनाया गया। वे 1989 तक इस पद पर रहे। उनके कार्यकाल के दौरान इराक के शासक सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला कर दिया। इसके बाद दोनों देशों के बीच आठ साल तक युद्ध चला। इस युद्ध ने ईरान को आर्थिक और सामाजिक रूप से काफी नुकसान पहुंचाया।

सुप्रीम लीडर बनने तक का सफर

1989 में अयातुल्लाह खुमैनी का निधन हो गया। उनके बाद अली खामेनेई को ईरान का नया सुप्रीम लीडर चुना गया। इसके बाद से वे देश के सबसे ताकतवर व्यक्ति बन गए।

सुप्रीम लीडर के तौर पर उन्होंने सेना और सुरक्षा तंत्र को मजबूत किया। खासकर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC को उन्होंने बड़ी ताकत दी।

IRGC की भूमिका और ताकत

IRGC ईरान की सबसे शक्तिशाली सैन्य संस्था है। यह चुनी हुई सरकार के बजाय सीधे सुप्रीम लीडर को जवाब देती है। इसका असर सिर्फ सेना तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीति और अर्थव्यवस्था में भी इसकी बड़ी भूमिका है।

खामेनेई ने अपने शासन में IRGC को मजबूत किया और उसे क्षेत्रीय रणनीति का मुख्य हिस्सा बनाया।

मिडिल ईस्ट में ‘प्रॉक्सी नेटवर्क’

खामेनेई ने सीधे युद्ध लड़ने की बजाय “प्रॉक्सी रणनीति” अपनाई। यानी उन्होंने क्षेत्र के अलग-अलग समूहों को समर्थन देकर अपना प्रभाव बढ़ाया। गाजा में हमास, लेबनान में हिजबुल्लाह और यमन में हूती समूहों को ईरान से समर्थन मिलता रहा। इससे ईरान का प्रभाव बढ़ा, लेकिन अमेरिका और इजरायल के साथ तनाव भी बढ़ा।

अमेरिका और इजरायल से दुश्मनी

अली खामेनेई की राजनीति की पहचान अमेरिका और इजरायल के विरोध से जुड़ी रही। उन्होंने अमेरिका को “ग्रेट शैतान” कहा। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर पश्चिमी देशों के साथ उनके रिश्ते खराब हो गए। ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए, जिससे देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई।

2020 में अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरान के प्रमुख जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद दोनों देशों के बीच दुश्मनी और बढ़ गई।

देश के अंदर सख्त रवैया

खामेनेई की छवि एक सख्त और कट्टर नेता की रही। जब भी देश में आर्थिक हालात या नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन हुए, तो उन्हें सख्ती से दबाया गया। वे किसी भी तरह की चुनौती को बर्दाश्त नहीं करते थे।

मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल: अगला सुप्रीम लीडर कौन?

खामेनेई की मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल था कि —अब ईरान का नया सुप्रीम लीडर कौन होगा?
ईरान में सुप्रीम लीडर का चुनाव “विशेषज्ञों की परिषद” करती है। इसमें 88 बड़े धार्मिक विद्वान शामिल होते हैं। वही आधिकारिक तौर पर नए सुप्रीम लीडर का चयन करते हैं। लेकिन हवाई हमले में अली खामेनेई की मौत के बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को ईरान का नया सर्वोच्च नेता चुना गया है।

मोजतबा खामेनेई का जन्म 1969 में मशहद शहर में हुआ था. उन्होंने धार्मिक माहौल में शिक्षा पाई. ईरान और इराक के युद्ध के आखिरी दौर में उन्होंने रिवोल्यूशनरी गार्ड में भी काम किया था. वो अपने पिता के बेहद करीबी थे और पर्दे के पीछे रहकर कई बड़े फैसलों में भूमिका निभाते थे.

अब सुप्रीम लीडर बनने के बाद मोजतबा खामेनेई के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी अमेरिका और इजरायल के हमलों का जवाब देना. ईरान में मचे कोहराम के बीच देश और सत्ता संभालना. साथ ही IRGC और बड़े धार्मिक संस्थानों पर नियंत्रण बनाए रखना।

मिडिल ईस्ट और दुनिया पर असर

खामेनेई की मौत सिर्फ एक देश की घटना नहीं है। इसका असर पूरे मिडिल ईस्ट और वैश्विक राजनीति पर पड़ सकता है। अगर सत्ता परिवर्तन के दौरान अस्थिरता बढ़ती है, तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है।

दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी थी कि खामेनेई के बाद नया नेतृत्व किसके हाथ में जाएगा.
अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत ईरान की राजनीति में एक बड़े युग का अंत है। वे 37 साल तक देश के सबसे शक्तिशाली नेता रहे। उन्होंने ईरान की विदेश नीति, सेना और क्षेत्रीय रणनीति को गहराई से प्रभावित किया।

अब ईरान एक नए मोड़ पर खड़ा है। नया सुप्रीम लीडर कौन होगा, उसकी सोच क्या होगी और वह देश को किस दिशा में ले जाएगा—यह आने वाले समय में साफ होगा।

फिलहाल इतना तय है कि खामेनेई की मौत ने मिडिल ईस्ट की राजनीति को हिला दिया है और पूरी दुनिया की नजर ईरान पर टिकी हुई है।

(न्यूज़ हिन्दू ग्लोबल)

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