War with AI: आ रही है एल्गोरिद्म किलिंग: जंग में अब AI तय करेगा कौन जिएगा और कौन मरेगा..
मिडिल ईस्ट की मौजूदा जंग में एक नया और बेहद खतरनाक मोड़ सामने आया है — एल्गोरिद्म वॉरफेयर। यहां अब डेटा और मशीनें यह तय कर रही हैं कि किसे निशाना बनाया जाए और किसे छोड़ दिया जाए। इससे पहले किसी भी युद्ध में इतनी बड़ी मात्रा में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल नहीं हुआ था।
हॉलीवुड की कल्पना से हकीकत तक
हॉलीवुड की टर्मिनेटर फिल्मों में मशीनों को इंसानों की जान लेते हुए देखकर हम सिहर उठते थे। लेकिन मार्च 2026 में यह साइंस फिक्शन अब एक कड़वी और खौफनाक सच्चाई बन चुका है।
AI अब केवल ईमेल ड्राफ्ट करने, तस्वीरें बनाने या बच्चों का होमवर्क कराने वाला मासूम टूल नहीं रहा। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध में आसमान से बरसने वाली मिसाइलों का रास्ता अब इंसान नहीं, बल्कि एल्गोरिद्म तय कर रहे हैं।
जंग बदल रही है: हथियार वही, दिमाग मशीन का
मिलिट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि आने वाले वर्षों में युद्ध केवल सैनिकों और हथियारों से नहीं लड़ा जाएगा, बल्कि डेटा, एल्गोरिद्म और मशीनों की मदद से लड़ा जाएगा। अब यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या भविष्य में युद्ध का सबसे बड़ा फैसला — यानी किसे मारना है और किसे छोड़ना है — किसी इंसान की जगह एक AI सिस्टम करेगा।
ड्रोन, सैटेलाइट और डेटा का सैलाब
पहले किसी ऑपरेशन से पहले घंटों या दिनों तक इंटेलिजेंस इकट्ठा की जाती थी। ड्रोन फुटेज, सैटेलाइट इमेज और मीटिंग्स के बाद तय होता था कि हमला करना है या नहीं। आज डेटा इतना विशाल हो चुका है कि इंसानों के भरोसे उसे समझना लगभग असंभव है। एक ड्रोन मिशन ही हजारों तस्वीरें और घंटों वीडियो रिकॉर्ड करता है।
मोबाइल लोकेशन, कम्युनिकेशन डेटा, सर्विलांस कैमरे और इंटरनेट एक्टिविटी भी इंटेलिजेंस का बड़ा आधार बन चुके हैं। यही वह जगह है जहां से युद्ध में AI की एंट्री हुई।
Project Maven: अमेरिका का पहला प्रयोग
2017 में अमेरिकी डिफेंस डिपार्टमेंट ने Project Maven शुरू किया। इसका मकसद था ड्रोन और सर्विलांस कैमरों से आने वाले वीडियो को AI की मदद से समझना।
AI को इस तरह ट्रेन किया गया कि वह वीडियो में गाड़ियों, हथियारों या संदिग्ध गतिविधियों को पहचान सके। इससे अमेरिकी सेना को यह समझ में आ गया कि भविष्य के युद्ध में डेटा को समझने के लिए मशीनों की मदद जरूरी होगी।
गाज़ा वॉर और AI टारगेट सिस्टम
इज़रायल ने गाज़ा वॉर में Lavender और Gospel जैसे AI सिस्टम का इस्तेमाल किया।
Lavender: फोन रिकॉर्ड, सोशल नेटवर्क, लोकेशन डेटा और सर्विलांस जानकारी को मिलाकर लोगों की पहचान करता था जिन्हें उग्रवादी संगठनों से जुड़ा माना जाता था।
Gospel: इमारतों और ठिकानों का एनालिसिस करके बताता था कि कौन सी जगह मिलिट्री के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। इससे टारगेट पहचानने की प्रक्रिया बेहद तेज हो गई।
मिडिल ईस्ट टेंशन और AI का बढ़ता रोल
अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव में रिपोर्ट्स बताती हैं कि अमेरिकी मिलिट्री ऑपरेशन में AI बेस्ड डेटा एनालिसिस सिस्टम का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।
AI की वजह से निर्णय लेने की प्रक्रिया बेहद तेज हो गई है। पहले जिन फैसलों में कई घंटे या दिन लगते थे, अब वे कुछ मिनटों में लिए जा सकते हैं।
यूक्रेन वॉर और AI ड्रोन
यूक्रेन वॉर ने दिखा दिया कि AI ड्रोन का भविष्य कितना बड़ा है। अगर रेडियो सिग्नल जाम हो जाए और ड्रोन का संपर्क टूट जाए तो AI कैमरे से मिलने वाली तस्वीरों का एनालिसिस करके टारगेट पहचान सकता है।
सबसे बड़ी चिंता: अगर AI गलती कर दे तो?
AI हमेशा भरोसेमंद नहीं होता। अगर डेटा अधूरा या गलत हो तो AI भी गलत निष्कर्ष निकाल सकता है। युद्ध के संदर्भ में ऐसी गलती बेहद गंभीर हो सकती है क्योंकि इसका सीधा असर लोगों की जान पर पड़ता है।
इसी वजह से वैज्ञानिक और ह्यूमन राइट्स संगठन मांग कर रहे हैं कि AI को पूरी तरह ऑटोनॉमस हथियार सिस्टम में बदलने से पहले अंतरराष्ट्रीय नियम बनाए जाएं।
AI Arms Race: दुनिया में शुरू हो चुकी है नई दौड़
अमेरिका, चीन, रूस, इज़रायल और कई अन्य देश मिलिट्री AI टेक्नोलॉजी पर तेजी से निवेश कर रहे हैं। इस कारण अब ड्रोन स्वार्म, ऑटोनॉमस टैंक, AI संचालित सर्विलांस सिस्टम आदि नये फॉर्मेट देखने को मिल रहे हैं।
मशीन बेस्ड वॉर स्ट्रैटेजी
ये सभी क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहे हैं और आने वाले वर्षों में युद्ध का चेहरा पूरी तरह बदल सकते हैं।
क्या भविष्य में मशीनें तय करेंगी मौत का फैसला?
इतिहास में बारूद, परमाणु हथियार और ड्रोन ने युद्ध का स्वरूप बदला। लेकिन AI शायद पहली ऐसी टेक्नोलॉजी है जो युद्ध के निर्णय लेने की प्रक्रिया को ही बदल सकती है। अगर मशीनें डेटा के आधार पर टारगेट सुझाने लगें और इंसान केवल अंतिम मंजूरी देने तक सीमित रह जाएं तो युद्ध में इंसानी भूमिका धीरे-धीरे कम हो सकती है।
और यही सबसे बड़ा सवाल है
कि क्या इंसान अपनी सबसे खतरनाक ताकत — यानी युद्ध के फैसले — मशीनों के भरोसे छोड़ने के लिए तैयार है? ..क्योंकि अगर ऐसा हुआ, तो इतिहास में पहली बार यह संभव होगा कि किसी सैनिक या जनरल ने नहीं, बल्कि एक एल्गोरिद्म ने तय किया हो कि कौन जिएगा और कौन मरेगा।
(त्रिपाठी पारिजात)



