America Iran War: ईरान ने बदले आधुनिक युद्ध का तरीका – F-35, राफेल और पैट्रियट हुए बेअसर, भारत के लिए क्या है यहाँ सबक?
पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध ने दुनिया भर के सैन्य विश्लेषकों को चौंका दिया है। ईरान और उसके सहयोगियों ने जिस तरह सस्ते ड्रोन, हाइपरसोनिक मिसाइलों और नई रणनीतियों का इस्तेमाल कर महंगे अमेरिकी और इजरायली हथियारों को चुनौती दी है, उसने आधुनिक युद्ध की परिभाषा ही बदल दी है। अब तक अजेय माने जाने वाले F-35 और F-22 स्टेल्थ जेट्स, थाड और पैट्रियट मिसाइल शील्ड्स इस संघर्ष में अप्रभावी साबित हो रहे हैं। यह स्थिति भारत के लिए भी कई अहम सबक छोड़ती है।
स्टेल्थ जेट्स की सीमाएं
पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ विमान जैसे F-35 लाइटनिंग II और F-22 रैप्टर को अब तक सबसे सुरक्षित और घातक माना जाता था। लेकिन युद्ध ने दिखाया कि स्टेल्थ तकनीक हर बार काम नहीं करती। सेंसर नेटवर्क और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर से इनकी पहचान हो सकती है। भारत के पास फिलहाल राफेल जैसे चौथी पीढ़ी प्लस के विमान हैं, जो बेहद सक्षम हैं लेकिन स्टेल्थ नहीं हैं। भविष्य में AMCA कार्यक्रम से भारत को पांचवीं पीढ़ी का स्वदेशी फाइटर मिलेगा, लेकिन तब तक हमें यह समझना होगा कि केवल स्टेल्थ पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है। असली ताकत सेंसर फ्यूजन, इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेजर्स और संख्या में बढ़त से आती है।
ड्रोन स्वार्म्स: सस्ते लेकिन घातक
ईरान के शाहेद-136 जैसे कम लागत वाले ड्रोन ने दिखाया कि सैकड़ों की संख्या में हमला करने से सबसे उन्नत एयर डिफेंस भी थक सकता है। महंगे ड्रोन जैसे MQ-9 रीपर प्रभावी हैं, लेकिन संख्या में कम हैं। भारत ने MQ-9B का ऑर्डर दिया है, लेकिन इस युद्ध का सबक यह है कि हमें बड़ी संख्या में स्वदेशी ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन चाहिए। ड्रोन स्वार्म्स से दुश्मन की रक्षा प्रणाली को पहले ही थका देना नई रणनीति बन चुकी है। भारत को अपने ड्रोन उत्पादन को तेज करना होगा ताकि लागत और संख्या दोनों में संतुलन बने।
मिसाइल शील्ड्स की महंगी हकीकत
थाड, पैट्रियट, आयरन डोम और डेविड्स स्लिंग जैसे इंटरसेप्टर सिस्टम बेहद महंगे हैं। एक मिसाइल रोकने में लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, जबकि हमलावर सस्ते ड्रोन या मिसाइल का इस्तेमाल कर सकता है। ईरान ने दिखाया कि लगातार हमलों से ये सिस्टम बेकार हो सकते हैं। भारत के पास S-400, आकाश-एनजी, प्रिथ्वी एयर डिफेंस और ABD जैसे लेयर्ड सिस्टम हैं, जो मजबूत हैं। लेकिन सबक यह है कि हमें लेजर-आधारित डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। इजरायल का आयरन बीम और भारत का DRDO सूर्या कार्यक्रम इसी दिशा में हैं। भविष्य में महंगे इंटरसेप्टर की जगह सस्ते और हाई-वॉल्यूम डिफेंस सॉल्यूशन जरूरी होंगे।
नौसेना और पनडुब्बियों की कमी
अमेरिका के पास वर्जीनिया-क्लास न्यूक्लियर सबमरीन हैं जो छिपकर ऑपरेशन कर सकती हैं। भारत के पास फिलहाल स्वदेशी SSN (न्यूक्लियर अटैक सबमरीन) नहीं है। लीज पर ली गई पनडुब्बियां ट्रेनिंग के लिए हैं, लेकिन असली युद्ध में यह कमी खतरनाक साबित हो सकती है। भारत के विक्रमादित्य और विक्रांत एयरक्राफ्ट कैरियर्स स्की-जंप तकनीक पर आधारित हैं, जिनकी क्षमता सीमित है। इस क्षेत्र में भारत को तेजी से निवेश करना होगा।
सबसे बड़ा सबक: एकीकरण और रणनीति
ईरान ने साबित किया कि महंगे हथियार तभी कारगर होते हैं जब उन्हें सही रणनीति और एकीकरण के साथ इस्तेमाल किया जाए। आधुनिक युद्ध में व्यक्तिगत प्लेटफॉर्म से ज्यादा महत्वपूर्ण है उनका नेटवर्किंग और इंटीग्रेशन। सेंसर, कमांड सिस्टम, ड्रोन, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर का एक साथ काम करना अब निर्णायक बन गया है। भारत के पास ब्रह्मोस, रुद्रम और अग्नि सीरीज जैसी मिसाइलें हैं, लेकिन ड्रोन बेड़ा, SSN, AEW&C और स्टेल्थ तकनीक में अभी भी गैप है।
भारत के लिए सीख
स्टेल्थ पर अंधा भरोसा न करें — इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और सेंसर नेटवर्क से स्टेल्थ तकनीक को मात दी जा सकती है।
ड्रोन उत्पादन बढ़ाएं — सस्ते और बड़ी संख्या में उपलब्ध ड्रोन ही भविष्य के युद्ध का असली हथियार होंगे।
लेजर और डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स पर ध्यान दें — महंगे इंटरसेप्टर की जगह सस्ते और टिकाऊ समाधान जरूरी हैं।
नौसेना और पनडुब्बियों में निवेश करें — SSN और कैरियर क्षमता बढ़ाना भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए।
एकीकरण पर फोकस करें — सेंसर, मिसाइल, ड्रोन और कमांड सिस्टम का तालमेल ही आधुनिक युद्ध जीतने की कुंजी है।
पश्चिम एशिया का युद्ध केवल स्थानीय संघर्ष नहीं है, बल्कि यह आधुनिक युद्ध की किताब में नया अध्याय लिख रहा है। ईरान ने दिखाया कि महंगे हथियार भी बेकार साबित हो सकते हैं अगर उनके सामने सस्ते, बड़ी संख्या वाले और स्मार्ट तरीके से इस्तेमाल किए गए सिस्टम हों। भारत के लिए यह युद्ध एक आईना है। अगर हमने समय रहते सबक नहीं सीखे, तो हमारे महंगे हथियार भी ‘कबाड़’ साबित हो सकते हैं।
(त्रिपाठी पारिजात)



