War & India:जयशंकर की संतुलित कूटनीति: अमेरिका, चीन, रूस, ईरान और इज़रायल के बीच भारत बना भरोसे का केंद्र
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और वैश्विक तनाव के बीच भारत ने अपनी कूटनीतिक सूझबूझ से एक ऐसा संतुलन कायम किया है, जिसकी सराहना अमेरिका, चीन, रूस, ईरान और इज़रायल जैसे परस्पर विरोधी देश भी कर रहे हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर की रणनीति ने भारत को इस संकट में एक स्थिर और विश्वसनीय शक्ति के रूप में स्थापित किया है।
जहां एक ओर दुनिया के कई हिस्सों में खून की नदियाँ बह रही हैं, तेल संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को हिला दिया है, वहीं भारत ने बिना किसी पक्ष में खड़े हुए, सभी प्रमुख शक्तियों से संवाद बनाए रखा है।
भारत की संतुलनकारी रणनीति
भारत ने इस पूरे संकट में किसी भी पक्ष का खुला समर्थन नहीं किया। इसके बजाय, जयशंकर की नेतृत्व में भारत ने सभी पक्षों से संवाद और सहयोग की नीति अपनाई, जिससे भारत की भूमिका एक मध्यस्थ और संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभरी।
टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक लेख में निवेश विशेषज्ञ सोमनाथ मुखर्जी ने भारत की इस रणनीति को “ग्रेट गेम” की संज्ञा दी है। उन्होंने लिखा कि जैसे द्वितीय विश्व युद्ध ने अमेरिका को महाशक्ति बनाया, वैसे ही यह संकट भारत को वैश्विक मंच पर एक निर्णायक भूमिका निभाने का अवसर दे रहा है।
अमेरिका के साथ ऊर्जा सहयोग
भारत ने अमेरिका के साथ ऊर्जा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण साझेदारी की है। रिलायंस इंडस्ट्रीज अमेरिका में एक नई रिफाइनरी स्थापित कर रही है — जो वहां 50 वर्षों में पहली बार हो रही है। यह रिफाइनरी भारी सॉर क्रूड प्रोसेस करने में सक्षम होगी, जो अमेरिका की पारंपरिक रिफाइनरियों से अलग है।
इस सहयोग से अमेरिका को खाड़ी क्षेत्र पर अपनी तेल निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी, और भारत को वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में एक अहम भूमिका मिलेगी।
चीन के साथ संबंधों में नरमी
2020 की गलवान घटना के बाद भारत-चीन संबंधों में तनाव चरम पर था। लेकिन 2024 में रूस के कज़ान में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद दोनों देशों के रिश्तों में सुधार आया।
भारत ने हाल ही में चीन सहित पड़ोसी देशों से आने वाले निवेश पर शर्तों में ढील दी है। इसके अलावा, मानसरोवर यात्रा और सीधी उड़ानों की शुरुआत ने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत किया है।
रूस से तेल आयात पर संतुलन
भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदा है, जिससे अमेरिका ने पहले नाराज़गी जताई थी। लेकिन अब जब तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ गई हैं, अमेरिका स्वयं भारत को रूस से तेल खरीदने की सलाह दे रहा है।
यह भारत की कूटनीतिक सफलता है कि उसने अपने हितों की रक्षा करते हुए दोनों देशों से संबंध बनाए रखे।
इज़रायल के साथ रक्षा सहयोग
भारत और इज़रायल के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग लगातार बढ़ रहा है। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने 25 फरवरी को इज़रायल का दौरा किया, जहां कई सैन्य समझौते हुए।
भारत इज़रायल से आधुनिक हथियार खरीद रहा है और दोनों देशों के बीच साझा रक्षा परियोजनाएं चल रही हैं। यह सहयोग भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत कर रहा है।
ईरान के साथ संवाद और सहयोग
भारत ने ईरान के साथ भी अपने संबंधों को बनाए रखा है। रायसीना डायलॉग में ईरान के उप विदेश मंत्री की भागीदारी, हिंद महासागर में फंसे ईरानी नौसैनिक जहाजों को भारत की सहायता, और जयशंकर की ईरानी विदेश मंत्री से बातचीत — ये सभी घटनाएं भारत की संतुलनकारी नीति को दर्शाती हैं।
इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजेशकियान की बातचीत ने दोनों देशों के बीच विश्वास को और गहरा किया। ईरान ने भारत की भूमिका को संतुलित और सकारात्मक बताया।
भारत की भूमिका पर वैश्विक प्रतिक्रिया
इन सभी घटनाओं से स्पष्ट है कि भारत ने एक बेहद संवेदनशील और संतुलित कूटनीति अपनाई है। जहां एक ओर अमेरिका, चीन, रूस, ईरान और इज़रायल एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं, वहीं भारत ने सभी से संवाद बनाए रखा है।
भारत की यह नीति न केवल उसे वैश्विक मंच पर एक विश्वसनीय शक्ति बनाती है, बल्कि उसे भविष्य की भू-राजनीतिक दिशा तय करने में भी सक्षम बनाती है।
आज जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध, तनाव और अस्थिरता है, भारत ने कूटनीति, संवाद और संतुलन के माध्यम से एक नई भूमिका निभाई है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर की रणनीति ने भारत को एक ऐसा देश बना दिया है, जिसे सभी शक्तिशाली राष्ट्र सम्मान की दृष्टि से देख रहे हैं।
यह “ग्रेट गेम” भारत के लिए एक अवसर है — और भारत इसे समझते हुए बड़ी चतुराई से खेल रहा है।
(त्रिपाठी पारिजात)



