दोस्तो ! कुछ महीनों पहले मैंने प्रेमानंद महाराज के नाम कुछ कविताएं लिखी थीं । वे कविताएं न होकर भावांजलि कही जा सकती हैं । प्रेमानंद जी का स्वास्थ्य गिरता जा रहा है। उन्होंने कहा है कि वे अब मौन में जा रहे हैं। एकांतिक भी बंद कर दिया गया है।
आइये, हम सब उनके पक्ष में अपने-अपने इष्ट से उनके लिए प्रार्थना करें।
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-पहली कविता-
आपको देखता हूं तो लगता है
चंदन की सिर्फ़ लकड़ी नहीं
चंदन के फूल भी होते हैं महाराज
अब मेरा आकाश भी पीला है
अब मेरी धरती भी पीली है
अब मेरी आँखें भी पीली हैं
अब मेरा हर दृश्य पीला है महाराज
व्यास पीठ पर बैठे
इन नए युवा कॉमेडियनों के बीच
आप जैसे किसी गंभीर संत का होना
सस्ते ठहाकों के बीच सच्चे आंसू का होना है
आप उसे भगा देते हैं जो कहता है :
हमें चमत्कार से ठीक कर दीजिए!
आप उसे गले से लगा लेते हैं जो कहता है :
मैं बीमार हूं तब भी यह प्रभु का आशीर्वाद है!
आप अपनी जटाओं में
हम श्रद्धालुओं के बुरे कर्म धारण करते हैं
आपकी निश्चल हंसी में
ईश्वर से हमारे मिलन की गारंटी छुपी हुई है
बरसों बाद
हमें कोई ऐसा मिला है महाराज
जो ईश्वर से डराता नहीं
बल्कि ईश्वर से हमारी बात करवाता है !
हे परमहंस !
हम कच्चे विवेकानंदों के छिलके उतार दीजिए
हमारी छाती पर रखिए अपना पांव
और हृदय में विराजित प्रभु से हमारा परिचय करवाइए !
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-दूसरी कविता-
मुझे जन्म देने वाले
मुझे जन्म नहीं देने वाले
मेरी मृत्यु का कारण बनने वाले
सब मुझसे दूर चले जाएं !
जिज्ञासा की उफनती हुई नदी पर
एक काग़ज़ की नाव में बैठकर
कलम को पतवार बनाते हुए
मैं जा रहा हूं अपने गुरु महाराज के पास !
सब कुछ नीच है मेरा –
मेरा जिया हुआ भी नीच
मेरा सीखा हुआ भी नीच
मेरा देखा हुआ भी नीच
मेरा लिखा हुआ भी नीच
मेरा भोगा हुआ भी नीच
मैं अपनी नीचता की रस्सियों से जकड़ा हुआ
मेरे ही द्वारा
मेरे गुरु महाराज के पास ले जाया जा रहा हूं
अब तो निर्णय हो कर रहेगा..
जीवन मुझे बार-बार नहीं छल सकता
मृत्यु मुझे बार-बार नहीं डस सकती
कर्म मुझे बार-बार नहीं बांध सकते
सृष्टि मुझे बार-बार एक ही खेल में निरत नहीं कर सकती
एक बड़े शून्य के पीछे
मेरा पागलपन अब व्यर्थ नहीं जाएगा
मैं एक बड़े अंक के पास
स्वयं को स्वयं से घटाने जा रहा हूं..
मैं मेरे गुरु महाराज के पास जा रहा हूं !
मत दो लालच चमड़ी का
मत दो लालच दमड़ी का
यह दोनों ही पुराने हुए
मैं इन खिलौनों से ऊब चुका हूं
शब्दों!
तुम भी परे हो जाओ
तुमने भी मेरा रस चूसा है
मौन!
तुम भी परे हो जाओ
तुमने मुझमें रस भरा है
लगभग निर्वस्त्र
पूरी तरह वेध्य
आद्योपांत निष्कवच
मैं अपने गुरु महाराज के पास जा रहा हूं..
इस बार नहीं जांच करूंगा
मेरे गुरु महाराज गुरु बनने लायक हैं या नहीं
इस बार तो उनके चरणों में लोट जाऊंगा
इस बार अपने संशय को अपने ऊपर सवार नहीं होने दूंगा
जो भी गुरु मिला
एक खोखला मटका मिला
पहली बार ऐसा लग रहा है
मटके में कुछ छलकने जैसा है..
सब कुछ परे हो जाए
सब कुछ दूर हो जाए
मुझे अकेला छोड़ दिया जाए
मैं मेरे गुरु महाराज के पास जा रहा हूं !
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-तीसरी कविता-
प्रेमानंद महाराज !
आप को एक श्रद्धालु ने फंसाने की कोशिश की
उसने आपसे कहा :
कुछ लोग राम और शिव का ग़लत नाम जप करते हैं महाराज !
आप भड़क गए
आपने उसे फटकारते हुए कहा
अगर तुम व्याकरण जानते हो तो सही नाम जप करो
जो ग़लत नाम जप कर रहा है
उसका न्याय प्रभु पर छोड़ दो !
प्रेमानंद महाराज !
हमें आज तक जो भी गुरु मिले
वे व्याकरण की तलवार से हमारी जीभ काट देने वाले मिले
लेकिन आपने हमारे निर्मल मन की लाज रख ली..
आपने हममें साहस भर दिया
कि हम प्रभु को पुकारें
तो वे खंभे से भी प्रकट हो सकते हैं
वह भी इस कलजुग में..
हम तो डर ही गए थे महाराज
कि ईश्वर अब नहीं रहा
मेरे समकालीन हिंदी कवि तो
ईश्वर को कोसे बिना
एक नई पंक्ति भी नहीं लिख सकते
प्रेमानंद महाराज !
आपने इस मनमीत नाम के व्यक्ति पर
यह कैसा हाथ रख दिया है
कि मेरे पहले शब्द से लेकर अंतिम शब्द तक
हरि के नाम का रस टपकता रहता है
मुझे आश्चर्य से देखते हैं मेरे कवि मित्र
मुझे पागल समझते हैं
मुझ पर ताने कसते हैं
लेकिन भीतर ही भीतर सब जानते हैं
यह उस रास्ते पर चल पड़ा है
जिस पर कोई दीवाना
सदियों में एक बार ही चलता है..
कि जो घर फूंके आपना / चले हमारे साथ !
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-चौथी कविता-
प्रेमानंद महाराज !
बचपन में माता-पिता मुझे डराते थे :
“बदमाशी करेगा तो साधु महाराज उठाकर ले जाएंगे”
थोड़ा बड़ा हुआ
तो साधुओं को दोगला पाया :
दिन में स्त्रियों को कोसते रहना
रात होते ही स्त्रियों में धंस जाना
किसी को तिहाड़ में बंद पाया
किसी को जोधपुर में
तो किसी को हरियाणा में
मैं तो अपना विश्वास खो चुका था प्रेमानंद महाराज
तभी मैंने आपको देखा
जो स्त्रियों को कोसता नहीं
बल्कि यह कहता है
यह सारी सृष्टि राधा स्वरूप है
किसी ने आपसे पूछा :
मैं गृहस्थ हूं / क्या मुझे ईश्वर नहीं मिलेंगे?
आपने उत्तर दिया :
अपनी स्त्री के अलावा किसी से संपर्क नहीं रखना / उसमें राधा को देखना / ईश्वर मिल जाएंगे !
मेरे लिए तो यह चमत्कार था महाराज
मैं अपनी मंगेतर के प्यार में गिरफ्तार
रात को अपनी मंगेतर से अब घंटों बात कर सकता था
और दिन भर ईश्वर का स्मरण कर सकता था
स्त्रियों को नरक का द्वार बताने वाले साधुओं के बीच
कोई साधु बड़ी ठसक से यह कह रहा था
स्त्रियां नरक का नहीं बल्कि स्वर्ग का द्वार होती हैं
जब मैंने आपको अपनी मां को याद करके
आंसू बहाते हुए देखा महाराज
तो मेरा यकीन पुख़्ता हो गया
कि आप दूर से भी साधु हैं और पास से भी
ऐ हज़ारों कोयलों के बीच
सोने के रंग वाले वस्त्रों में लिपटे हुए महाराज !
मैं आऊंगा किसी दिन
अपनी पत्नी के साथ आपके दरवाज़े पर
उसे वह लाल चुनरी पहनाऊंगा जो आप उसे देंगे
मैं वचन देता हूं कि उसके सिवा किसी को नहीं देखूंगा
मैं गृहस्थ में रहकर महान ब्रह्मचर्य का पालन करूंगा
मैं
किसी राम
किसी कृष्ण
किसी गणेश
किसी हनुमान को अवश्य पाऊंगा..
जो
यूं ही नहीं अस्तित्व में आ गए
बल्कि किसी स्त्री का दूध पी कर बड़े हुए हैं !
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–पांचवीं कविता-
अध्ययन नहीं
आचरण बड़ा होता है दोस्तो !
बड़े बड़े संत देखे हैं
जो ग्रन्थ के बिस्तर पर ग्रन्थ का तकिया लगाकर ग्रन्थ जीमते रहते हैं
ऐसे संतों से भरी पड़ी है भारत भूमि
जो कुल्ला भी संस्कृत में करते हैं
क्या करें ऐसे संतों का
जो श्रद्धालुओं को कुत्तों की तरह पीछे दौड़ाते हैं
और जिनके बाउंसर्स
हाथ में रायफल लिए उनकी सुरक्षा करते हैं
हमें तो कोई ऐसा चाहिए
जो वही भोजन कर ले
जो हमारी मां परोसे
प्रेमानंद महाराज !
आप के आस-पास अब बहुत भीड़ हो गई है
आप भी ऑडी में बैठकर सफ़र करते हैं
बड़े से बड़ा आदमी भी आता है तो आपसे नीचे बैठता है
प्रेमानंद महाराज !
कभी अपनी ही याद आए
तो चले आना मेरे घर होकर निसंकोच
मेरे दरवाज़े के आगे भिक्षा मांगना
मेरी मां दौड़ी चली आएगी
मैं आपके चरण पखारूंगा
आपके लिए बोरिया बिछाऊंगा
आपके लिए रोटी सब्जी परोसूंगा
और आपके कमंडल को
मेरी मां मीठी खीर से लबालब भर देगी
सच सच बताना प्रेमानंद महाराज !
क्या आप को कभी अपनी ही याद नहीं आती
कि जिस बदन पर अब
एक रेशमी पीला वस्त्र रहता है
कभी उस बदन पर चिथड़े तक नहीं थे
चाहे ग्रीष्म हो चाहे बरखा चाहे शीत
आप सो जाते थे कभी नीम कभी अश्वत्थ के नीचे
मैं आपके भले के लिए कह रहा हूं प्रेमानंद महाराज !
मौक़ा देखकर
अब भी कभी- कभी
निकल जाया कीजिए भिक्षा मांगने..
संत यदि भिक्षा मांगना भूल जाता है
तो उस पर ऐश्वर्य की धूल चढ़ जाती है
और वह अपने ही भगवान की नज़र से गिर जाता है !
अपने भगवान की नज़र में गिरने से
बचना प्रेमानंद महाराज !
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-छठवीं कविता-
हज़ारों-लाखों का जीवन बदलने के बाद
आप हमें बीच में छोड़कर नहीं जा सकते महाराज !
हम समय के अश्व को रोक लेंगे
बिछ जाएंगे उसके खुरों के नीचे
लेकिन हम उसे आपको अपनी सवारी नहीं बनाने देंगे !
हमने न गांधी देखे न विनोबा न विवेकानंद
हमने तो आपको देखा है महाराज
आप को किसी से मोह हो या नहीं हो
हमको तो आपसे अथाह मोह है
ऐसा नहीं कि हमने मृत्यु नहीं देखी
हमने देखी हैं जलती हुई चिताएं
हमने स्वयं अग्नि दी है अपने परिजन को
लेकिन हम आप जैसे जल के धारे को अग्नि कैसे देंगे महाराज ?
सीधे सरल शब्दों की यह महान परंपरा
जब आपके साथ लुप्त हो जाएगी
नए बच्चे किसकी रील देखेंगे आधी रात को
बुजुर्गों को कौन समझाएगा कि मृत्यु से मत डरो
स्त्रियों से कौन कहेगा कि चरित्रवान रहो
आप कहते हैं : नाम जप करो
आपने ही बताया हमें
कि सौ अपराधों के बाद भी
हम एक सौ एक वाँ काम करते हुए पुण्य कर सकते हैं
और उन सौ अपराधों के लिए रोने की कोई ज़रूरत नहीं है
ईश्वर के सिंहासन के बराबर हमें बिठाकर
आप हमें आम-आदमी की तरह छोड़कर नहीं जा सकते
हमने अभी घुटनों के बल चलना शुरू ही किया है
अभी हम आपकी “अल्ले ले ले उठ जा बालक !” सुनना चाहते हैं
हम आपकी दाढ़ी से खेलना चाहते हैं महाराज
हम नापना चाहते हैं कि आपके बाल कितने लंबे हो गए
हम देखना चाहते हैं आधी रात को आपका नंगे पांव राधा रानी से मिलने जाना
हम अभी इतने सक्षम नहीं है
कि आपके हरि-भक्ति में रंगे पीले वस्त्रों को काल के किसी काले पर्दे से बदल देवें !
मृत्यु यदि अटल है
तो हमारा मोह भी अटल है महाराज !
आप यदि एक इशारा कर देवें
हम हमारी किडनियों की नाव बनाकर
आपको भव सागर पार करवा देवें !
लेकिन आप तो आप हैं महाराज
हम श्रद्धालु आपकी माया क्या जानें ?
आप जब इस नश्वर संसार से
एक महान सम्राट की तरह श्मशान की ओर जाएंगे
और आपकी खुली मुट्ठी में संसार का वैभव विश्राम करेगा..
तब हम यह नहीं कहेंगे राम नाम सत्य है :
हम तो यही कहेंगे : राधा नाम सत्य है !



