AC बिना बिजली के ? नमक, पानी और धूप से होगी ठंडक – सऊदी वैज्ञानिकों की यह खोज बदल देगी दुनिया !..
सऊदी अरब के वैज्ञानिकों ने नेस्कोड (NESCOD) तकनीक बनाई है जो बिना बिजली के, सिर्फ अमोनियम नाइट्रेट नमक, पानी और सूरज की रोशनी से कमरे को ठंडा कर सकती है। जानिए कैसे काम करती है यह क्रांतिकारी कूलिंग टेक्नोलॉजी और क्या यह भारत जैसे देशों के लिए गेमचेंजर साबित होगी।
बिना बिजली के AC? यह सुनकर पागल मत समझना – यह सच में हो चुका है!
गर्मी इस साल कुछ ज़्यादा ही कहर बरपा रही है। दिल्ली हो, लखनऊ हो, या नागपुर – पारा 45 के पार जा रहा है। और ऐसे में सबसे पहला ख़याल आता है – काश AC होता। लेकिन AC का बिजली बिल? वो तो और भी बड़ा दर्द है।
अब सोचिए – क्या हो अगर AC चले, पर बिजली का बिल ज़ीरो हो? बिल्कुल ज़ीरो। एक रुपया नहीं।
यह कोई व्हाट्सैप से फ़ॉरवर्ड नहीं है। यह सच में हो चुका है। सऊदी अरब के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक बना दी है जो बिना किसी बिजली के – सिर्फ नमक, पानी और सूरज की रोशनी से – कमरे को AC जैसा ठंडा कर देती है। इसका नाम रखा है नेस्कोड (NESCOD) – यानी नो इलेक्ट्रीसिटी एन्ड सस्टेनेबल कूलिंग ऑन डिमान्ड -मतलब बिना बिजली की ठंडक, जब चाहो तब।
पहले समझो — दुनिया को इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी?
बात सिर्फ गर्मी की नहीं है। असली मुद्दा यह है कि दुनिया में बिजली की माँग हर साल आसमान छू रही है। एक तरफ AI के डेटा सेंटर हैं जो अकेले पूरे-पूरे शहरों जितनी बिजली खा जाते हैं। दूसरी तरफ गर्मी बढ़ रही है तो AC की ज़रूरत भी बढ़ रही है। और AC तो वैसे ही बिजली का सबसे बड़ा खिलाड़ी है घर में।
तो एक तरफ से बिजली बनाने की कोशिशें हो रही हैं – सोलर, न्यूक्लियर, पवन ऊर्जा। पर दूसरी तरफ अगर AC जैसी चीज़ों को ही बिजली की ज़रूरत न रहे, तो कितना बड़ा फ़र्क पड़ेगा? यही सोचकर सऊदी अरब की किंग अब्दुल्लाह यूनिवर्सिटी ऑफ साइन्स एन्ड टेक्नॉलजी के प्रोफेसर पेंग वांग और उनकी टीम ने काम शुरू किया।
स्कूल की केमिस्ट्री याद है? वही है इसका जादू
बात थोड़ी केमिस्ट्री वाली है, पर घबराना मत – बहुत आसान है।
कुछ केमिकल ऐसे होते हैं जो किसी दूसरी चीज़ में मिलाने पर आसपास की गर्मी सोख लेते हैं। इसे एन्डोथर्मिक रिएक्शन कहते हैं। और एक ऐसा ही केमिकल है – अमोनियम नाइट्रेट। यही वो “नमक” है जिसकी यहाँ बात हो रही है।
खेतों में खाद के रूप में यह काफी इस्तेमाल होता है। पर जब इसे पानी में मिलाओ – कुछ होता है ना साधारण। यह आसपास की हवा से गर्मी खींचना शुरू कर देता है। और खींचता भी इतनी तेज़ी से है कि आप हैरान रह जाएंगे।
लैब में टेस्ट हुआ। कमरे का तापमान था 25 डिग्री सेल्सियस। बस अमोनियम नाइट्रेट को पानी में मिलाया। और 20 मिनट के अंदर – बस 20 मिनट में – तापमान गिरकर 3.5 डिग्री पर पहुँच गया।
3.5 डिग्री! पहाड़ों की ठंडी रात जैसा। वो भी किसी कंप्रेसर, मोटर, रेफ्रिजरेंट या बिजली के बिना।
ठीक है, एक बार ठंडा हुआ – फिर?
यही सवाल उठता है ना? नमक घोला, ठंडा हो गया। पर जब गर्मी फिर आएगी? क्या बार-बार नमक घोलते रहेंगे? कमरा तो नमक-पानी से भर जाएगा!
यही असली चुनौती थी। और यही वैज्ञानिकों ने सुलझाई – वो भी बड़ी चालाकी से।
जो घोल बन गया – अमोनियम नाइट्रेट और पानी का – उसे धूप में रख दो। तेज़ सूरज की रोशनी उस घोल को गर्म करती है। पानी भाप बनकर उड़ जाता है। और पीछे बचता है – फिर से वही नमक, वही अमोनियम नाइट्रेट।
यानी एक पूरा चक्र बन गया:
नमक + पानी → ठंडक → घोल → धूप → फिर नमक → फिर ठंडक…
बस यही घूमता रहता है। बिना रुके। बिना बिजली के।
पूरी बिल्डिंग कैसे ठंडी होगी?
वैज्ञानिकों ने इसे सिर्फ बीकर में नहीं किया। उन्होंने एक पूरा सिस्टम बनाया।
छत पर लगाया सोलर रिजेनेरेटर – यह वो जगह है जहाँ धूप से घोल दोबारा नमक बन जाता है।
अंदर कमरों में रखी कूलिंग यूनिट – यहाँ नमक को पानी में मिलाया जाता है और ठंडक पैदा होती है।
दोनों को पाइप से जोड़ा। ठंडे घोल के ऊपर से हवा गुज़ारी गई – बिल्कुल कूलर की तरह। पर इस घोल का पानी तो बर्फ जितना ठंडा था। तो हवा भी बहुत ज़्यादा ठंडी हो गई। और कमरे में फैल गई।
दिन में चक्र चलता रहा। रात में? नमक पहले से स्टोर कर लिया। धूप नहीं थी तो घोल से नमक नहीं बन सकता था रात को। लेकिन स्टोर किए नमक से ठंडक मिलती रही पूरी रात। और अगले दिन सुबह धूप आई तो घोल से फिर नमक तैयार।
खर्चा? बिजली का बिल? रेफ्रिजरेन्ट?
सब ज़ीरो।
अमोनियम नाइट्रेट सस्ता है, आसानी से मिलता है। कोई रेफ्रिजरेंट गैस नहीं जो भरवानी पड़े हर साल। कोई कंप्रेसर नहीं जो जलने पर हज़ारों का खर्च आए। बिजली का खर्चा? कुछ नहीं।
और सबसे बड़ी बात – यह उन जगहों पर भी काम करेगा जहाँ बिजली पहुँची ही नहीं है। गाँव, जंगल, पहाड़ी इलाक़े – जहाँ अभी तक ठंडक का कोई रास्ता नहीं था।
सिर्फ AC नहीं – और भी बहुत कुछ
यह तकनीक सिर्फ कमरा ठंडा करने तक नहीं रुकती।
किसान के खेत के पास कोल्ड स्टोरेज? हो सकता है।
फल-सब्ज़ी ताज़ी रखना? हो सकता है।
ठंडा पीने का पानी? हो सकता है।
फ़्रिज का काम? हो सकता है।
भारत जैसे देशों के लिए तो यह सोने की खान जैसी बात है। गर्मी भी है, धूप भी है – दोनों इस तकनीक के लिए ज़रूरी हैं। और दोनों यहाँ कभी कम नहीं होतीं।
यह रिसर्च कहाँ छपी?
यह कोई अखबारी बात नहीं है जो हवा में उड़ रही हो। यह रिसर्च 2022 में एनर्जी एन्ड एनवायरनमेन्टल साइन्सेस नाम के बेहद प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुई थी। वैज्ञानिक दुनिया में इस जर्नल की बड़ी साख है। मतलब यह तकनीक जाँची-परखी है।
तो फिर बाज़ार में कब आएगी?
लैब से ज़मीन तक का सफर – यही सबसे कठिन रास्ता होता है। तकनीक काम करती है, यह साबित हो गया। अब बड़े पैमाने पर इसे बनाना, सस्ता करना, और आम लोगों तक पहुँचाना – यही अगला कदम है।
वैज्ञानिक इस पर तेज़ी से काम कर रहे हैं। और जिस तरह से AI की वजह से बिजली की माँग बढ़ रही है, दुनिया को इस तकनीक की ज़रूरत भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ती जा रही है।
अगर यह मार्केट में आ गई – तो सच में दुनिया बदल जाएगी।
(अर्चना शैरी)



