Story: सोहम बाहर खड़ा मिल गया।..”मज़ा आया?”..”बहुत!”..”और विनीत कहाँ है?”..सोहम ने इधर-उधर देखा।..”अरे… वो तो मेरे साथ ही था।”..”अभी कहाँ है?”..”पता नहीं।” – पढ़िये इस कहानी में आगे..
शाम के करीब पाँच बजे थे। अगस्त की हल्की-हल्की बारिश अभी कुछ देर पहले ही रुकी थी। सड़कें चमक रही थीं और पेड़ों की पत्तियों पर पानी की बूंदें मोतियों की तरह टंगी थीं।
आठवीं कक्षा में पढ़ने वाला सोहम अपने कमरे में आईने के सामने खड़ा होकर बाल ठीक कर रहा था। आज उसके दोस्त अर्पित का जन्मदिन था और पार्टी शहर के पुराने और मशहूर इंडियन कॉफी हाउस में रखी गई थी।
“मम्मी, मैं कैसा लग रहा हूँ?” उसने पूछा।
“बहुत अच्छे लग रहे हो जनाब,” मम्मी मुस्कुराईं।
उसी समय बाहर से गाड़ी का हॉर्न सुनाई दिया।
“आ गया मेरा हीरो!” सोहम खुशी से चिल्लाया।
नील चाचू अपनी सफेद कार लेकर बाहर खड़े थे।
नील चाचू पेशे से पत्रकार थे। सोहम के पापा भी पत्रकार थे, लेकिन वे अक्सर रिपोर्टिंग और मीटिंग्स में इतने व्यस्त रहते कि घर पर कम ही समय दे पाते थे।
ऐसे में नील चाचू ही सोहम के सबसे अच्छे दोस्त, शिक्षक और मार्गदर्शक बन गए थे।
वे उसे किताबों से ज्यादा जिंदगी की बातें सिखाते थे।
“हर बात पर भरोसा मत करो।”
“आसपास क्या हो रहा है, हमेशा ध्यान रखो।”
“मुश्किल समय में घबराने की बजाय सोचना सीखो।”
ये बातें वे अक्सर कहा करते थे।
सोहम कार में बैठ गया।
तभी रास्ते में पास वाली सोसायटी के गेट पर विनीत खड़ा दिखाई दिया।
“अरे, ये तो विनीत है!” सोहम बोला।
कार रुक गई।
“कहाँ जा रहे हो भाई?” नील चाचू ने पूछा।
“अर्पित की बर्थडे पार्टी में। पापा की मीटिंग है इसलिए ड्राइवर लेट हो गया।”
“बैठ जाओ।”
विनीत भी कार में बैठ गया।
वह खुशमिजाज लड़का था। उसके पिता शहर के बड़े उद्योगपति थे और अक्सर अखबारों में उनका नाम छपता रहता था।
रास्ते भर दोनों दोस्त बातें करते रहे।
कुछ ही देर में इंडियन कॉफी हाउस आ गया।
नील चाचू ने दोनों को उतारा।
“सात बजे फोन कर देना। मैं लेने आ जाऊँगा।”
“ठीक है चाचू!”
दोनों अंदर चले गए।
उधर नील चाचू अपने दफ्तर चले गए।
रात के करीब साढ़े सात बजे सोहम का फोन आया।
“चाचू, पार्टी खत्म हो गई। आ जाइए।”
“बस दस मिनट।”
नील चाचू तुरंत कार लेकर निकल पड़े।
जब वे इंडियन कॉफी हाउस पहुँचे तो बाहर बच्चों और अभिभावकों की भीड़ कम हो चुकी थी।
सोहम बाहर खड़ा मिल गया।
“मज़ा आया?”
“बहुत!”
“और विनीत कहाँ है?”
सोहम ने इधर-उधर देखा।
“अरे… वो तो मेरे साथ ही था।”
“अभी कहाँ है?”
“पता नहीं।”
नील चाचू की भौंहें सिकुड़ गईं।
दोनों अंदर गए।
अर्पित से पूछा।
उसने कहा, “डांस के समय तो विनीत था। उसके बाद मैंने नहीं देखा।”
दूसरे बच्चों से पूछा।
सभी ने लगभग एक ही जवाब दिया।
“डांस के बाद नहीं देखा।”
अब मामला थोड़ा गंभीर लगने लगा था।
विनीत के पिता को फोन किया गया।
उन्होंने कहा, “वो अभी तक घर नहीं पहुँचा है।”
यह सुनते ही माहौल बदल गया।
कुछ ही मिनटों में चिंता घबराहट में बदल गई।
विनीत का फोन भी बंद था।
कॉफी हाउस के मैनेजर से सीसीटीवी फुटेज देखने की अनुमति ली गई।
नील चाचू पत्रकार थे। शहर में उन्हें लोग पहचानते थे।
फुटेज चलाया गया।
डांस के बाद विनीत मुख्य हॉल से बाहर निकलता दिखाई दिया।
फिर एक आदमी उसके पास आया।
दोनों कुछ बातें करते दिखे।
इसके बाद विनीत उसके साथ बाहर चला गया।
“रुको!” नील चाचू बोले।
वीडियो पीछे किया गया।
आदमी ने नीली कैप पहन रखी थी।
चेहरा आधा छिपा हुआ था।
विनीत आराम से उसके साथ जा रहा था।
जबरदस्ती जैसी कोई बात नहीं लग रही थी।
“इसका मतलब उसने उस आदमी को पहचाना था,” नील चाचू बोले।
तभी सोहम अचानक बोला,
“चाचू, मुझे कुछ याद आया।”
“क्या?”
“पार्टी में विनीत कह रहा था कि कोई अंकल उससे मिलने वाले हैं।”
“कौन अंकल?”
“उसने नहीं बताया।”
नील चाचू सोच में पड़ गए।
तभी उनके पत्रकार दिमाग ने काम करना शुरू किया।
उन्होंने अपने एक पुलिस मित्र को फोन लगाया।
फुटेज भेजी गई।
कुछ ही देर बाद जवाब आया।
“यह आदमी पहले भी संदिग्ध गतिविधियों में देखा गया है।”
अब मामला साफ होने लगा था।
रात के आठ बज चुके थे।
इसी बीच विनीत के पिता के फोन पर एक कॉल आई।
आवाज बदली हुई थी।
“पचास लाख रुपये तैयार रखो।”
फोन कट गया।
सभी के पैरों तले जमीन खिसक गई।
अपहरण हो चुका था।
पुलिस सक्रिय हो गई।
लेकिन नील चाचू को कुछ अजीब लग रहा था।
उन्होंने फिर फुटेज देखी।
विनीत जिस आदमी के साथ बाहर निकला था, वह सड़क के दूसरी ओर नहीं गया था।
बल्कि पार्किंग की तरफ मुड़ा था।
वहाँ एक पुरानी सिल्वर वैन खड़ी थी।
वैन का नंबर धुंधला था।
लेकिन नील चाचू की नजर एक खास चीज पर पड़ी।
पीछे शीशे पर एक लाल रंग का टूटा हुआ स्टिकर लगा था।
“ये वैन मैंने कहीं देखी है।”
वे बुदबुदाए।
अचानक उन्हें याद आया।
तीन दिन पहले वे शहर में अवैध गोदामों पर एक रिपोर्ट कर रहे थे।
तब यही वैन एक बंद फैक्ट्री के पास दिखाई दी थी।
उन्होंने तुरंत अपना पुराना वीडियो निकाला।
हाँ!
वही वैन थी।
“सोहम, सीट बेल्ट बाँध लो।”
“क्यों?”
“हम एक दोस्त को घर लाने जा रहे हैं।”
पुलिस को सूचना देकर नील चाचू अपनी कार लेकर निकल पड़े।
शहर से बाहर पुरानी औद्योगिक बस्ती की ओर।
रात गहरी हो चुकी थी।
सड़कें लगभग खाली थीं।
करीब बीस मिनट बाद उन्हें दूर एक सिल्वर वैन दिखाई दी।
वह तेजी से आगे बढ़ रही थी।
“मिल गए!”
नील चाचू ने धीरे से कहा।
उन्होंने सुरक्षित दूरी बनाकर पीछा शुरू किया।
सोहम का दिल तेजी से धड़क रहा था।
लेकिन उसे चाचू की सिखाई बातें याद थीं।
घबराओ मत।
सोचो।
ध्यान से देखो।
वैन आखिर एक बंद गोदाम में घुस गई।
गेट खुला और फिर बंद हो गया।
नील चाचू ने कार थोड़ी दूर रोक दी।
पुलिस अभी पहुँचने में समय लेती।
लेकिन अपहरणकर्ता शायद जगह बदल सकते थे।
नील चाचू ने गोदाम का निरीक्षण किया।
पीछे की तरफ एक टूटी दीवार थी।
वहीं से अंदर झाँकने पर उन्हें एक कमरा दिखाई दिया।
विनीत कुर्सी पर बैठा था।
उसके हाथ बंधे नहीं थे, लेकिन वह डरा हुआ था।
तीन आदमी वहाँ मौजूद थे।
“अब क्या करेंगे?” सोहम ने फुसफुसाकर पूछा।
नील चाचू मुस्कुराए।
“पत्रकार सिर्फ खबर नहीं ढूँढते, दिमाग भी लगाते हैं।”
उन्होंने कार तक जाकर डिक्की खोली।
उसमें कैमरा, ट्राइपॉड, टॉर्च और एक बड़ा लाउडस्पीकर रखा था।
पत्रकारों के काम की चीजें।
फिर उन्होंने पुलिस मित्र को लाइव लोकेशन भेजी।
योजना तैयार हो गई।
नील चाचू गोदाम के पीछे पहुँचे।
लाउडस्पीकर को दीवार के पास रख दिया।
अचानक तेज आवाज गूंजी—
“सावधान! पुलिस ने गोदाम को चारों ओर से घेर लिया है। कोई भागने की कोशिश न करे।”
आवाज पूरे परिसर में गूंज उठी।
अंदर अफरा-तफरी मच गई।
“पुलिस!”
एक आदमी चिल्लाया।
दूसरा बाहर की ओर भागा।
तीसरा खिड़की से झाँकने लगा।
उसी समय नील चाचू दूसरी ओर से अंदर घुस गए।
उन्होंने तेजी से विनीत तक पहुँचकर उसका हाथ पकड़ा।
“चलो बेटा!”
“चाचू!”
विनीत की आँखें चमक उठीं।
तीनों भागते हुए पीछे वाले रास्ते की ओर बढ़े।
लेकिन अपहरणकर्ताओं ने उन्हें देख लिया।
“रुको!”
एक आदमी उनके पीछे दौड़ा।
अब असली पीछा शुरू हुआ।
गोदाम से बाहर निकलते ही नील चाचू ने विनीत और सोहम को कार में बैठाया।
इंजन पहले से चालू था।
कार बिजली की तरह सड़क पर दौड़ पड़ी।
पीछे से वैन भी निकल आई।
कुछ मिनटों तक दोनों गाड़ियाँ सुनसान सड़क पर दौड़ती रहीं।
सोहम ने पहली बार फिल्मों जैसा दृश्य अपनी आँखों से देखा था।
वैन लगातार नजदीक आने की कोशिश कर रही थी।
लेकिन नील चाचू अनुभवी ड्राइवर थे।
उन्होंने अचानक एक पुरानी सर्विस रोड पर कार मोड़ दी।
वैन पीछे आई।
उसी समय दूर से पुलिस की सायरन सुनाई देने लगी।
अपहरणकर्ताओं को समझ आ गया कि खेल खत्म हो चुका है।
उन्होंने भागने की कोशिश की।
लेकिन सामने से पुलिस की गाड़ियाँ आ चुकी थीं।
वैन रुक गई।
तीनों अपराधी गिरफ्तार कर लिए गए।
रात करीब ग्यारह बजे सभी वापस शहर पहुँचे।
विनीत के माता-पिता की आँखों में खुशी के आँसू थे।
उन्होंने बेटे को गले से लगा लिया।
“तुम ठीक हो ना?”
विनीत बस सिर हिलाकर रह गया।
घर लौटते समय सोहम कार की खिड़की से बाहर देख रहा था।
शहर की रोशनी चमक रही थी।
“चाचू?”
“हाँ?”
“आज अगर आप नहीं होते तो?”
नील चाचू मुस्कुराए।
“आज सिर्फ मैं नहीं था।”
“मतलब?”
“तुम भी थे।”
“मैं?”
“अगर तुम्हें पार्टी वाली बात याद नहीं आती, अगर तुम घबराकर रोने लगते, अगर तुम ध्यान से बातें नहीं सुनते… तो शायद हम विनीत तक इतनी जल्दी नहीं पहुँच पाते।”
सोहम चुप हो गया।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि दुनियादारी की जो बातें चाचू उसे सिखाते थे, वे सिर्फ बातें नहीं थीं।
वे मुश्किल समय में काम आने वाली ताकत थीं।
नील चाचू ने कार आगे बढ़ा दी।
“याद रखो सोहम,” उन्होंने कहा, “हीरो वही नहीं होता जो लड़ाई करे। असली हीरो वह होता है जो सही समय पर सही बात नोटिस करे।”
सोहम मुस्कुराया।
आज उसने सिर्फ दोस्त को नहीं बचाया था।
आज उसने जिंदगी का एक बड़ा सबक भी सीख लिया था।
और उस रात, सफेद कार की खिड़की से आती ठंडी हवा के बीच, उसे लगा कि उसके नील चाचू सिर्फ पत्रकार नहीं थे…
वे उसके सबसे बड़े शिक्षक थे।
(मंकी सिंह)



