World in danger: ईरान पर मंडरा रहा है एक ऐसा खतरा, जिसकी दुनिया में लगभग कोई चर्चा नहीं – जैविक हथियारों का संकट कहीं पूरी मानवता पर न पड़ जाए भारी
ईरान में बढ़ते सैन्य संघर्ष के बीच दुनिया की नजर परमाणु हथियारों पर है, लेकिन सबसे बड़ा खतरा जैविक हथियारों से जुड़ा हो सकता है। जानिए क्यों विशेषज्ञ मान रहे हैं कि ईरान की बायोलॉजिकल लैब्स, रिसर्च सेंटर और जैविक हथियार कार्यक्रम पूरी दुनिया के लिए गंभीर चिंता का विषय बन सकते हैं।
दुनिया की निगाहें इस समय ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव पर टिकी हुई हैं। हर तरफ परमाणु हथियारों की चर्चा हो रही है। मिसाइलों की बात हो रही है। यह चिंता भी जताई जा रही है कि अगर युद्ध और फैल गया तो पूरे पश्चिम एशिया में मानवीय संकट गहरा सकता है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक ऐसा खतरा भी मौजूद है, जिस पर अपेक्षाकृत बहुत कम चर्चा हो रही है। कई सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि यही खतरा आने वाले समय में सबसे गंभीर साबित हो सकता है।
यह खतरा है – जैविक हथियारों का।
असल सवाल यह है कि अगर किसी ऐसे देश में युद्ध तेज हो जाए, जिस पर वर्षों से जैविक हथियार विकसित करने के आरोप लगते रहे हों, तो वहां मौजूद जैविक प्रयोगशालाओं, वैज्ञानिकों और खतरनाक रोगाणुओं का क्या होगा? अगर सरकारी व्यवस्था कमजोर पड़ जाए या नियंत्रण तंत्र टूटने लगे, तो इन संवेदनशील संसाधनों की सुरक्षा कौन करेगा? यही वह मुद्दा है, जिस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अभी से गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।
अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई के बाद दुनिया का बड़ा हिस्सा ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नजर रखे हुए है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि परमाणु हथियारों से जुड़ा कोई भी जोखिम पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकता है। मगर जैविक हथियारों का खतरा कई मायनों में और भी ज्यादा जटिल माना जाता है। इसकी वजह यह है कि ऐसे हथियारों का असर सीमाओं में बंधा नहीं रहता। एक बार कोई खतरनाक रोगाणु बाहर निकल जाए तो वह बहुत तेजी से कई देशों तक पहुंच सकता है।
पिछले कई दशकों से पश्चिमी देशों की विभिन्न खुफिया एजेंसियां यह आकलन करती रही हैं कि ईरान ने रक्षात्मक शोध से आगे बढ़कर जैविक हथियारों से जुड़ी क्षमताएं विकसित करने की कोशिश की है। हालांकि ईरान इन आरोपों को लगातार खारिज करता रहा है, लेकिन सार्वजनिक रूप से सामने आई कई खुफिया रिपोर्टों में समय-समय पर इस विषय का उल्लेख किया गया है।
दिलचस्प बात यह है कि ईरान उन शुरुआती देशों में शामिल था, जिन्होंने जैविक हथियारों पर प्रतिबंध लगाने वाली अंतर्राष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर किए थे। वर्ष 1979 की इस्लामी क्रांति से भी छह साल पहले उसने इस समझौते को मंजूरी दे दी थी। इसके बावजूद बाद के वर्षों में पश्चिमी एजेंसियों ने यह दावा किया कि ईरान ने धीरे-धीरे इस क्षेत्र में अपनी गतिविधियां बढ़ानी शुरू कर दीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह ईरान-इराक युद्ध रहा। उस युद्ध के दौरान ईरान को रासायनिक हथियारों के हमलों का सामना करना पड़ा था। इन हमलों में भारी जनहानि हुई और देश के सैन्य तथा राजनीतिक नेतृत्व पर गहरा असर पड़ा। माना जाता है कि उसी दौर के बाद ईरानी नेतृत्व इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि भविष्य में किसी भी असामान्य या गैर-पारंपरिक युद्ध क्षमता के मामले में वह अपने विरोधियों से पीछे नहीं रहना चाहता।
यही सोच आगे चलकर जैविक अनुसंधान से जुड़े कार्यक्रमों को तेज करने की वजह बनी। पश्चिमी खुफिया आकलनों के मुताबिक, इसके बाद कई ऐसे शोध कार्यक्रम शुरू किए गए जिन्हें आधिकारिक तौर पर नागरिक वैज्ञानिक अनुसंधान बताया गया, लेकिन उन पर लंबे समय तक संदेह बना रहा कि उनके भीतर सैन्य उपयोग की संभावनाएं भी छिपी हुई हैं।
नागरिक अनुसंधान संस्थानों की आड़ में बढ़ने का दावा
रिपोर्टों के अनुसार, 1990 के शुरुआती वर्षों तक ईरान ने अपने कथित जैविक हथियार कार्यक्रम को सीधे सैन्य ठिकानों से हटाकर नागरिक अनुसंधान संस्थानों के भीतर स्थानांतरित करना शुरू कर दिया। ऐसा माना जाता है कि इस रणनीति का उद्देश्य गतिविधियों को कम संदेहास्पद बनाना था।
विश्लेषकों के मुताबिक, इस दौरान देश के कुछ प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों का नाम बार-बार सामने आया। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा रज़ी इंस्टीट्यूट और पाश्चर इंस्टीट्यूट की होती रही। दोनों संस्थान आधिकारिक तौर पर स्वास्थ्य, वैक्सीन और वैज्ञानिक अनुसंधान से जुड़े रहे हैं। हालांकि पश्चिमी रिपोर्टों में समय-समय पर आरोप लगाए गए कि इन्हीं जैसे संस्थानों की आड़ में कुछ संवेदनशील शोध भी किए गए। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
इसी अवधि में यह भी कहा गया कि पूर्व सोवियत संघ के जैविक हथियार कार्यक्रम से जुड़े कुछ वैज्ञानिकों को ईरान में काम करने के लिए आमंत्रित किया गया। विशेष रूप से सोवियत संघ के चर्चित बायोप्रेपराट कार्यक्रम का उल्लेख कई रिपोर्टों में मिलता है। माना जाता है कि इन विशेषज्ञों की मदद से ईरान ने अपनी वैज्ञानिक क्षमता और तकनीकी जानकारी को मजबूत करने की कोशिश की।
समय बीतने के साथ अमेरिकी खुफिया आकलनों में यह भी कहा गया कि जैविक एजेंटों के अलावा कुछ फार्मास्यूटिकल आधारित रासायनिक पदार्थों पर भी शोध बढ़ाया गया। इनमें फेंटेनिल से जुड़े कुछ डेरिवेटिव्स का भी जिक्र किया गया, जिन्हें कथित तौर पर सीमित लक्ष्य वाले अभियानों या भीड़ नियंत्रण जैसे उद्देश्यों के लिए उपयोगी माना जाता था। इन दावों की भी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है, लेकिन वे वर्षों से विभिन्न सार्वजनिक रिपोर्टों का हिस्सा रहे हैं।
मार्च 2025 में अमेरिका के ऑफिस ऑफ द डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस की वार्षिक रिपोर्ट ने इस विषय को लेकर अपेक्षाकृत अधिक सख्त भाषा का इस्तेमाल किया। रिपोर्ट में कहा गया कि ईरान के पास रासायनिक और जैविक एजेंटों से जुड़े आक्रामक अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की “बहुत अधिक संभावना” मौजूद है। इस आकलन ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी।
इसके कुछ ही महीनों बाद जून 2025 में अमेरिका ने ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमले किए। इसके बाद कई विश्लेषकों ने आशंका जताई कि अगर संघर्ष और बढ़ा, तो ईरान अपने उपलब्ध असामान्य सैन्य विकल्पों पर भी विचार कर सकता है। हालांकि ऐसा होने की कोई प्रत्यक्ष पुष्टि सामने नहीं आई, लेकिन सुरक्षा हलकों में इस संभावना पर चर्चा तेज हो गई।
इसी क्रम में दिसंबर 2025 में कुछ रिपोर्टों में यह दावा भी किया गया कि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी कथित रूप से लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ जैविक और रासायनिक पेलोड को जोड़ने की संभावनाओं पर काम कर रहा था। इन रिपोर्टों के मुताबिक इसका उद्देश्य पारंपरिक मिसाइल क्षमता के साथ एक अतिरिक्त प्रतिरोधक शक्ति तैयार करना था। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से नहीं हुई है।
क्या ईरान वास्तव में जैविक हथियारों का इस्तेमाल करेगा?
यही वह सवाल है, जिस पर दुनिया भर के सुरक्षा विशेषज्ञों की राय सबसे ज्यादा बंटी हुई है।
ज्यादातर विशेषज्ञ अब भी मानते हैं कि ईरान द्वारा जानबूझकर जैविक हथियारों का इस्तेमाल किए जाने की संभावना बहुत अधिक नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अगर किसी दूसरे देश पर जैविक हथियार से हमला हुआ और उसका स्रोत ईरान साबित हो गया, तो उसके जवाब में बेहद कठोर और व्यापक सैन्य कार्रवाई हो सकती है।
इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान जिस सहानुभूति और राजनीतिक समर्थन की उम्मीद करता है, वह भी ऐसे किसी कदम के बाद लगभग समाप्त हो सकता है। इसलिए रणनीतिक नजरिए से यह विकल्प बेहद जोखिम भरा माना जाता है।
हालांकि कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि जब कोई सरकार खुद को अस्तित्व के संकट में घिरा हुआ महसूस करने लगती है, तब फैसले हमेशा पारंपरिक रणनीतिक सोच के आधार पर नहीं लिए जाते। ऐसे हालात में आंतरिक विरोध को दबाने, अफरा-तफरी फैलाने या किसी झूठे हमले का आरोप दूसरे पक्ष पर डालने जैसी आशंकाओं को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
लेकिन कई विशेषज्ञों के अनुसार सबसे बड़ा खतरा किसी योजनाबद्ध हमले से नहीं, बल्कि दुर्घटनावश होने वाली किसी बड़ी चूक से पैदा हो सकता है। (क्रमशः)
(त्रिपाठी पारिजात)



