Saturday, June 27, 2026
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Iran ले के आ गया एआई का बाप – ये है बीआई – जीवित कोशिकाओं से बना डाला जिन्दा दिमाग

Iran ने बना दिया है 'जिंदा दिमाग'! लगता है AI से आगे निकल आई है ये BI तकनीक -जानिए कितना सच, कितना खतरा और क्यों पूरी दुनिया की नजर इस पर

Iran का ‘जिंदा दिमाग’ क्या दुनिया के लिए नई चुनौती पेश करेगा? AI से आगे BI तकनीक पर छिड़ गई है बड़ी बहस – कितनी चिन्ता की बात है ये?

ईरान ने दावा किया है कि उसने इंसानी कोशिकाओं से विकसित ‘बायोलॉजिकल इंटेलिजेंस’ यानी BI तकनीक में बड़ी सफलता हासिल की है। जानिए क्या है ऑर्गेनॉइड इंटेलिजेंस, यह AI से कैसे अलग है, इसके संभावित फायदे, खतरे और दुनिया में क्यों मची हलचल।

ईरान का बड़ा दावा, विज्ञान की दुनिया में मची हलचल

ईरान ने ऐसी तकनीक पर काम करने का दावा किया है, जिसने वैज्ञानिक जगत में नई बहस छेड़ दी है। देश के शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने प्रयोगशाला में जीवित मानव कोशिकाओं की मदद से एक ऐसा जैविक नेटवर्क विकसित किया है, जिसे “बायोलॉजिकल इंटेलिजेंस” यानी BI या “ऑर्गेनॉइड इंटेलिजेंस” कहा जा रहा है।

इस दावे के सामने आने के बाद कई लोग इसे भविष्य की कंप्यूटिंग तकनीक बता रहे हैं, तो कुछ विशेषज्ञ इसे बेहद संवेदनशील और नैतिक चुनौतियों से जुड़ा क्षेत्र मान रहे हैं। हालांकि, यह साफ कर देना जरूरी है कि इस तकनीक को लेकर अभी तक दुनिया भर में स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि और व्यापक व्यावहारिक परीक्षण बाकी हैं।

आखिर क्या है BI?

आज पूरी दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की चर्चा कर रही है। ChatGPT से लेकर रोबोटिक्स तक, हर जगह AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन BI का विचार इससे बिल्कुल अलग है।

BI का मतलब है ऐसी कंप्यूटिंग प्रणाली, जिसमें जीवित न्यूरॉन्स या मस्तिष्क की कोशिकाओं का उपयोग किया जाए। यानी कंप्यूटर सिर्फ सिलिकॉन चिप्स पर निर्भर न रहे, बल्कि जीवित कोशिकाओं की सीखने और प्रतिक्रिया देने की क्षमता का भी इस्तेमाल किया जाए।

यही वजह है कि इसे भविष्य की संभावित तकनीकों में गिना जा रहा है।

ईरान के वैज्ञानिकों ने क्या दावा किया?

ईरानी वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने लैब में मानव तंत्रिका कोशिकाओं को जीवित रखते हुए उन्हें आपस में जोड़ने और एक नेटवर्क के रूप में विकसित करने की तकनीक पर काम किया है।

ब्रेन रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी टीम के प्रमुख अताउल्लाह पोर-अब्बासी के अनुसार, यह जैविक नेटवर्क लगातार अपने वातावरण के अनुसार प्रतिक्रिया दे सकता है और समय के साथ नई चीजें सीखने की क्षमता भी विकसित कर सकता है।

उन्होंने यह भी दावा किया कि इस क्षेत्र में काम करने के लिए आवश्यक तकनीकी जानकारी ईरान ने घरेलू स्तर पर विकसित कर ली है।

हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।

AI और BI में आखिर फर्क क्या है?

दोनों तकनीकों का उद्देश्य कंप्यूटिंग को अधिक सक्षम बनाना है, लेकिन उनका आधार पूरी तरह अलग है।

आज का AI कंप्यूटर चिप्स, विशाल डेटा, एल्गोरिद्म और प्रोग्रामिंग पर चलता है। किसी AI मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए अरबों डेटा पॉइंट्स और भारी कंप्यूटिंग संसाधनों की जरूरत पड़ती है।

दूसरी तरफ BI का विचार जीवित न्यूरॉन्स की प्राकृतिक सीखने की क्षमता पर आधारित है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह तकनीक सफल होती है, तो भविष्य में ऐसे जैविक प्रोसेसर विकसित किए जा सकते हैं जो कम ऊर्जा में जटिल समस्याओं को हल करने में सक्षम हों।

यानी AI कृत्रिम बुद्धिमत्ता है, जबकि BI जैविक बुद्धिमत्ता पर आधारित कंप्यूटिंग की अवधारणा है।

क्या सचमुच बिजली की खपत लाखों गुना कम होगी?

ईरानी वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि भविष्य में जैविक प्रोसेसर पारंपरिक सिलिकॉन चिप्स की तुलना में लगभग 10 लाख गुना कम ऊर्जा का उपयोग कर सकते हैं।

यह दावा काफी आकर्षक जरूर है, लेकिन वैज्ञानिक समुदाय का एक बड़ा वर्ग मानता है कि इस तरह के आंकड़ों को वास्तविक व्यावसायिक उपयोग और बड़े स्तर के परीक्षणों के बाद ही प्रमाणित माना जा सकता है।

फिलहाल यह तकनीक शुरुआती अनुसंधान के चरण में है।

सुपरकंप्यूटर से भी तेज?

कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि मानव मस्तिष्क की संरचना बेहद कुशल होती है। यही कारण है कि वैज्ञानिक लंबे समय से इसकी कार्यप्रणाली को समझने और उससे प्रेरित कंप्यूटिंग सिस्टम विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं।

ईरान की रिसर्च टीम का दावा है कि भविष्य में जैविक प्रोसेसर पारंपरिक सुपरकंप्यूटरों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं।

लेकिन यह कहना कि मौजूदा सुपरकंप्यूटर पूरी तरह पीछे छूट जाएंगे, अभी जल्दबाजी होगी। इसके लिए कई वर्षों तक अनुसंधान और परीक्षण जरूरी होंगे।

चिकित्सा से लेकर रक्षा तक, कई क्षेत्रों में हो सकता है इस्तेमाल

अगर ऑर्गेनॉइड इंटेलिजेंस तकनीक सफल होती है, तो इसका उपयोग सिर्फ कंप्यूटर तक सीमित नहीं रहेगा।

विशेषज्ञों के अनुसार, भविष्य में इसका इस्तेमाल इन क्षेत्रों में हो सकता है –

मस्तिष्क संबंधी बीमारियों के शोध में
नई दवाओं के परीक्षण में
न्यूरोलॉजिकल रिसर्च में
अत्याधुनिक रोबोटिक्स में
ऊर्जा बचाने वाली कंप्यूटिंग में
रक्षा और सुरक्षा तकनीकों में

यही वजह है कि दुनिया के कई विकसित देश इस क्षेत्र में लगातार निवेश कर रहे हैं।

क्या इससे सुरक्षा संबंधी खतरे भी पैदा हो सकते हैं?

नई तकनीक जितनी बड़ी संभावना लेकर आती है, उतने ही सवाल भी खड़े करती है।

अगर जीवित न्यूरॉन्स आधारित कंप्यूटिंग भविष्य में व्यवहारिक रूप लेती है, तो इसके नैतिक और कानूनी पहलुओं पर गंभीर चर्चा करनी होगी।

विशेषज्ञ पूछ रहे हैं कि ऐसी प्रणाली की सीमाएं क्या होंगी? क्या इसका सैन्य उपयोग होगा? क्या इससे साइबर सुरक्षा की नई चुनौतियां पैदा होंगी? क्या जैविक कंप्यूटिंग को नियंत्रित करने के लिए नए अंतरराष्ट्रीय नियम बनाने पड़ेंगे?

इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं।

क्या ईरान तकनीकी दौड़ में बड़ी छलांग लगा चुका है?

ईरानी वैज्ञानिकों का कहना है कि देश ने इस क्षेत्र में शुरुआती मॉडल विकसित कर लिया है और आगे इसे व्यावसायिक उपयोग तक ले जाने की तैयारी चल रही है।

हालांकि, अभी यह तकनीक व्यापक बाजार में उपलब्ध नहीं है। इसे आम कंप्यूटर, रक्षा प्रणाली या औद्योगिक उत्पादों में इस्तेमाल होने में समय लग सकता है।

दुनिया के कई वैज्ञानिक संस्थान भी ऑर्गेनॉइड इंटेलिजेंस पर काम कर रहे हैं। इसलिए यह कहना कि किसी एक देश ने पूरी दौड़ जीत ली है, फिलहाल उचित नहीं होगा।

ऑर्गेनॉइड इंटेलिजेंस क्या है?

ऑर्गेनॉइड इंटेलिजेंस एक उभरता हुआ वैज्ञानिक क्षेत्र है। इसमें लैब में विकसित छोटे जैविक न्यूरॉन नेटवर्क का उपयोग कंप्यूटिंग कार्यों के लिए करने की संभावना तलाश की जाती है।

मानव मस्तिष्क बेहद कम ऊर्जा में एक साथ कई जटिल कार्य कर सकता है। वैज्ञानिक इसी क्षमता को समझकर भविष्य की नई कंप्यूटिंग तकनीक विकसित करना चाहते हैं।

यदि यह शोध सफल होता है, तो आने वाले वर्षों में कंप्यूटर विज्ञान, चिकित्सा, रोबोटिक्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दुनिया में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

अभी उत्साह भी, सावधानी भी

ईरान के दावे ने निश्चित रूप से दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि BI तकनीक अभी शुरुआती शोध के दौर में है। इसके कई दावे अभी स्वतंत्र वैज्ञानिक समीक्षा और व्यावहारिक परीक्षणों की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि जैविक बुद्धिमत्ता यानी Biological Intelligence भविष्य की उन तकनीकों में शामिल है, जो आने वाले वर्षों में कंप्यूटिंग की दिशा बदल सकती हैं। यह बदलाव कितना बड़ा होगा और कितनी जल्दी आएगा, इसका जवाब विज्ञान और समय दोनों मिलकर देंगे।

(त्रिपाठी पारिजात)

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