Bonded Labor: मुज़फ़्फ़रनगर की वो ख़ौफ़नाक फ़ैक्ट्री: जहाँ इंसानों को ‘पिटबुल’ के पहरे में रखकर चोकर की रोटी और गर्म सरियों का दम दिया जाता था!
उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में एक बेहद डरावना मामला सामने आया है। मांडी गाँव में चल रही एक दोना फ़ैक्ट्री से 12 बंधुआ मज़दूरों को आज़ाद कराया गया है। भूखे पेट काम, लोहे की गर्म रॉड से पिटाई और बाहर पिटबुल का पहरा – हमसे जानिये इन बेबस मज़दूरों की रोंगटे खड़े कर देने वाली पूरी कहानी।
कुछ कहानियाँ इतनी डरावनी होती हैं कि उन पर यक़ीन करना मुश्किल हो जाता है। आज के इस दौर में भी, जहाँ हम आज़ादी और अधिकारों की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, वहाँ कुछ लोग नर्क जैसी ज़िंदगी जीने पर मजबूर थे। ये कोई काल्पनिक थ्रिलर फ़िल्म की कहानी नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के मांडी गाँव की कड़वी और खौफनाक हकीक़त है। यहाँ एक दोना बनाने वाली फ़ैक्ट्री के भीतर जो कुछ चल रहा था, उसे सुनकर किसी की भी रूह काँप जाए।
श्रम विभाग और पुलिस की एक साझा टीम ने जब यहाँ अचानक छापा मारा, तो वहाँ का नज़ारा देखकर ख़ुद अधिकारी भी सन्न रह गए। इस फ़ैक्ट्री की चारदीवारी के पीछे 12 इंसानों को बंधक बनाकर रखा गया था। उन्हें मज़दूर कहना शायद ग़लत होगा, क्योंकि उनके साथ जो सुलूक हो रहा था, वह किसी क़ैदी या गुलाम से भी बदतर था।
रेलवे स्टेशनों से बुना गया मौत और बेबसी का जाल
ये पूरा खेल बहुत ही शातिराना तरीक़े से खेला जा रहा था। इस काले धंधे के पीछे जो लोग थे, वे रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर ऐसे लोगों की तलाश करते थे जो सीधे-साधे हों, ग़रीब हों या काम की तलाश में भटक रहे हों। गिरफ़्तार किए गए आरोपी शिवा त्यागी और प्रदीप बालियान, अपने फ़रार साथी अंकित बालियान के साथ मिलकर शिकार ढूँढते थे।
इन बेबस लोगों को झांसा दिया जाता था – “हमारे साथ चलो, रहने-खाने की बढ़िया व्यवस्था मिलेगी और हर महीने 10 से 12 हज़ार रुपये सैलरी सीधे हाथ में आएगी।” ग़रीबी की मार झेल रहे ये लोग इस झांसे में आ जाते थे। उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, हरियाणा, राजस्थान और यहाँ तक कि पड़ोसी देश नेपाल के लोग भी इस जाल में फँस गए। लेकिन जैसे ही ये लोग मांडी गाँव की उस बड़ी सी फ़ैक्ट्री के मुख्य दरवाज़े के अंदर क़दम रखते, उनकी दुनिया हमेशा के लिए बदल जाती।
पहचान पत्र राख हुए और मोबाइल ज़ब्त
फ़ैक्ट्री में घुसते ही सबसे पहला काम उनका वजूद छीनने का होता था। इन मज़दूरों के मोबाइल फ़ोन तुरंत छीन लिए जाते ताकि वे दुनिया से पूरी तरह कट जाएँ। हद तो तब हो गई जब उनके आधार कार्ड और दूसरे पहचान पत्र ज़िंदा जला दिए गए। इसके पीछे साफ़ मक़सद था – न रहेगा कोई सुराग, न कोई अपनी पहचान साबित कर पाएगा।
बाहर निकलने के सारे रास्ते बंद थे। चौबीसों घंटे काम का दबाव रहता था। सोने के लिए वक़्त ही नहीं मिलता था। अगर कोई थकान से चूर होकर आँखें मूँदने की कोशिश भी करता, तो उस पर ज़ुल्मों का पहाड़ टूट पड़ता।
खाने में सिर्फ़ चोकर की रोटी और पहरे पर पिटबुल
इन मज़दूरों को ज़िंदा रखने के लिए जो खाना दिया जाता था, उसे सोचकर भी घिन आ जाए। उन्हें सिर्फ़ चोकर की सूखी रोटी मिलती थी, जिसे निगलने के लिए साथ में नमक और सूखी लाल मिर्च का पाउडर दे दिया जाता था। चाय तो नसीब होती थी, लेकिन उसमें चीनी का एक दाना तक नहीं होता था।
अगर कोई इस नर्क से भागने की कोशिश करने की सोचता भी, तो दरवाज़े पर मौत खड़ी मिलती। फ़ैक्ट्री के मालिक ने मुख्य गेट पर एक ख़ूँख़ार पिटबुल नस्ल का कुत्ता पाल रखा था। तितावी थाना प्रभारी प्रमोद कुमार ने साफ़ किया कि इस पिटबुल को वहाँ शौक़ के लिए नहीं, बल्कि इन मज़दूरों को डराने और उन पर पहरा देने के लिए रखा गया था ताकि कोई भागने की हिम्मत न कर सके।
गर्म सरियों का टॉर्चर और टूटी पसलियाँ
मज़दूरों ने रोते हुए मीडिया को अपनी पीठ और कूल्हों पर पड़े वो गहरे ज़ख़्म दिखाए, जो उन्हें रोज़ाना दिए जाते थे। मुज़फ़्फ़रनगर के एसएसपी संजय वर्मा ने इस बर्बरता की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि मज़दूरों को लोहे की गर्म रॉड, बेल्ट और डंडों से जानवरों की तरह पीटा जाता था। टॉर्चर इस हद तक बढ़ चुका था कि कुछ मज़दूरों की पसलियाँ तक टूट चुकी थीं। किसी के कान फूट चुके थे तो किसी की कमर पर गहरे नीले निशान थे।
इससे भी ज़्यादा चौंकाने वाली और डरावनी बात जो सामने आई है, वो ये कि इस फ़ैक्ट्री के भीतर अमानवीय अत्याचारों की वजह से कुछ लोगों की मौत होने के भी आरोप हैं। पुलिस अब इस इनपुट पर बहुत गहराई से तफ़्तीश कर रही है। एक मृतक की शिनाख्त की कोशिशें भी तेज़ हो चुकी हैं।
बेबसी की अलग-अलग कहानियाँ
इस नर्क से छूटे 20 साल के रामू की दास्तान बेहद भावुक करने वाली है। उत्तराखंड के नैनीताल के रहने वाले रामू के माता-पिता इस दुनिया में नहीं हैं। तीन भाई-बहनों की ज़िम्मेदारी के चक्कर में वो ढाई महीने पहले अंबाला रोडवेज स्टेशन पर काम ढूँढ रहे थे, जहाँ से अंकित बालियान उन्हें उठा लाया। रामू कहते हैं, “हमें तो क़ैदियों की तरह रखा गया। पुलिस न आती, तो हम वहीं मर जाते। उन्होंने हमें नया जीवन दिया है।”
वहीं औरैया के रहने वाले 26 साल के शिवम कुमार पिछले छह महीने से यहाँ घुट-घुट कर जी रहे थे। घर पर उनकी पत्नी और एक छोटी सी बेटी है, जो महीनों से उनके लौटने की राह देख रही थी। सीतापुर के 50 साल के जगदीश तो अपनी आपबीती सुनाते हुए बच्चों की तरह बिलख पड़े। उन्होंने कहा, “जब भी हम कहते थे कि घर की याद आ रही है, हमारा मन नहीं लग रहा, तो ये लोग हमें बेदम होने तक पीटते थे।”
नेपाल के पाल्पा ज़िले से आए दानबहादुर थापा की कहानी भी कम दर्दनाक नहीं है। वे पिछले दो साल से यहाँ बंधक थे। इन दो सालों में उन्होंने अपने परिवार की आवाज़ तक नहीं सुनी थी। उनके लिए तो जैसे वक़्त वहीं ठहर गया था। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के रहने वाले नाराय, जिन्हें पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से बहला-फुसलाकर लाया गया था, चार महीने बाद आज़ाद होकर सिर्फ़ पुलिस के पैर छू रहे थे।
गाँव की ख़ामोशी और कई बीघे में फैला साम्राज्य
ये दोना फ़ैक्ट्री मांडी गाँव के बाहरी छोर पर स्थित है और कई बीघे ज़मीन पर फैली हुई है। इतनी बड़ी जगह पर इतना सब कुछ हो रहा था, लेकिन किसी को भनक तक नहीं लगी? जब मीडिया ने गाँव के लोगों से बात करने की कोशिश की, तो एक अजीब सा सन्नाटा देखने को मिला। ज़्यादातर ग्रामीण इस मामले पर कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं।
गाँव के पूर्व प्रधान बिजेंद्र ने कहा, “हमें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि अंदर इस तरह का कोई धंधा चल रहा है। हम तो बस इतना जानते थे कि वहाँ कोई कारख़ाना है।” वहीं एक दूसरे ग्रामीण ने नाम न छापने के भरोसे पर दबी आवाज़ में कुबूल किया कि कुछ गड़बड़ होने का शक तो था, पर ज़ुल्म की दास्तान इतनी लंबी होगी, यह किसी ने नहीं सोचा था।
क़ानून का शिकंजा
पुलिस ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। गिरफ़्तार किए गए आरोपी शिवा त्यागी और प्रदीप बालियान को जेल भेज दिया गया है, जबकि मुख्य आरोपी अंकित बालियान की तलाश में पुलिस जगह-जगह दबिश दे रही है। उसका मोबाइल फ़िलहाल स्विच्ड ऑफ़ है।
आरोपियों के ख़िलाफ़ बाल श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम 1986, किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2015 की धारा 75 और 79, और बंधुआ मज़दूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम 1976 की धारा 16, 17 और 18 के तहत मुक़दमा दर्ज किया गया है।
तितावी पुलिस अब उन थानों से भी संपर्क साध रही है जहाँ मुमकिन है कि इन मज़दूरों के घरवालों ने उनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई हो। जिन मज़दूरों के परिवार वाले मुज़फ़्फ़रनगर पहुँच रहे हैं, उन्हें सौंपा जा रहा है, लेकिन कई मज़दूर अब भी ऐसे हैं जिनके अपनों का मिलना अभी बाक़ी है। यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे आस-पास की दुनिया में कितनी अंधेरी गलियाँ आज भी मौजूद हैं।
(मंजू सिंह)




