India Israel: दुनिया को एक इम्प्रेशन है कि बंदूकें इजरायल की है मगर गोलियां मेड इन इंडिया है, पश्चिमी वामपंथी इजरायल के संदर्भ मे भारत को दूसरा अमेरिका तक बोल रहे है।..
इजरायल को लेकर जो बहस छिड़ गयी है वो जायज है, सोनिया गाँधी के लेख की क़ीमत उतनी है जितनी आज सलमान शाहरुख़ की फ़िल्म की, लेकिन मुद्दा सोनिया गाँधी के परे है।
पिछले 12 वर्षो मे यदि आपसे कहा जाए कि भारत के संबंध मे सबसे चर्चित देश का नाम बताओ तो सकारात्मक हो या नकारात्मक आप इजरायल ही कहेंगे। 2014 से पहले शायद मुसलमानो के अतिरिक्त भारत मे कोई इस देश को ठीक से जानता भी नहीं होगा।
ज़ब मोदी सरकार चुनकर आयी थी तो इंडिया टूडे ने कहा भी था कि सबसे बड़ा परिवर्तन इजरायल को लेकर होगा। हिंदुत्व और जियोवाद बहुत हद तक एक समान है, हिन्दू और यहूदी दोनों सभ्यताओं मे आपस मे कभी कोई युद्ध नहीं हुआ। यहूदी भारत मे बसें या हिन्दू व्यापार के लिए इजरायल गए, हर सूरत मे हिंसा नहीं हुई।
लेकिन ज़ब भारत आजाद हुआ तो सरकार को मुस्लिम तुष्टिकरण तो करना था ही साथ मे मुस्लिम देशो की दोस्ती चाहिए थी। इसलिए भारत ने हमेशा इजरायल का विरोध किया, 2014 के बाद स्थिति बदलनी थी सो बदल गयी लेकिन इतनी बदलेगी यह किसी हिंदूवादी ने भी नहीं सोचा था।
अब एक अलग ही भारत सब के सामने है, आज इजरायल से पूरी दुनिया दूरी बना रही है यहाँ तक कि अमेरिका भी परेशान है। इजरायल को नए शक्तिशाली मित्र चाहिए, दूसरी ओर भारत है जिसे तुर्की से निपटने के लिए इजरायल चाहिए। दुनिया भर की बैंक्स यहूदियों के हाथ मे है, एक फ्रेमवर्क चाहिए कि दुनिया का धन भारत आये वो भी बिना किसी गुलामी की शर्त के।
सबसे जरूरी, आतंकवाद को लेकर इजरायल का रवैया वही है जो भारत का है, इजरायल के साथ हमें समझौता नहीं करना पड़ता। यही कारण है कि इस सूखे मे भी इजरायल पर भारत की वर्षा हो रही है, ज़ब बाकि वैश्विक नेता इजरायल से कन्नी काट रहे थे तो मोदीजी इजरायल गए। नेतन्याहू ने पूरे इजरायल मे पोस्टर लगाकर अपनी विदेश नीति का दम दिखाया।
लेकिन यही इजरायल अब जो कर रहा है वो मानवीय मूल्यों पर संकट खडे कर रहा है, इजरायल के सैनिक गाजा के बच्चो को भूखा मार रहे है। उनके सिर पर गोली मारने की प्रैक्टिस हो रही है, गाजा मे महिलाओ के साथ दुष्कर्म की भी बाते संयुक्त राष्ट्र बोल रहा है, कुछ तो नवजात शिशु भी मारे गए है।
फिर ये ही इजरायली सैनिक छुट्टी मनाने भारत आ रहे है और अपने नरसंहार के किस्से खुशी खुशी साझा कर रहे है। ज्यादातर इजरायली हिमाचल प्रदेश मे आते है, गाजा के बच्चो को मारकर यहाँ भारत के बच्चो के साथ गली क्रिकेट खेल रहे है। एक तो संयुक्त राष्ट्र द्वारा ब्लैकलिस्टेड भी था, सरकार को सूचना भी मिली मगर कोई एक्शन नहीं हुआ।
इन्ही मुद्दों पर सोनिया गाँधी ने घेरा है क्योंकि भारत इजरायल के साथ अब भी व्यापार बनाये हुए है। दुनिया को एक इम्प्रेशन है कि बंदूकें इजरायल की है मगर गोलियां मेड इन इंडिया है, पश्चिमी वामपंथी इजरायल के संदर्भ मे भारत को दूसरा अमेरिका तक बोल रहे है।
इजरायल की आदत है, अपने दोस्त बदलते रहता है। किसी जमाने मे इसके परम मित्र ब्रिटेन और फ़्रांस थे, फिर अमेरिका बना और अब भारत। दूसरी ओर भारत है जहाँ सरकार को पता है कि अभी लम्बी पारी खेलनी है, सवाल पूछने के लिए विपक्ष वैसा ही है जैसे अमेरिका के सामने सोमालिया।
लेकिन हर राष्ट्र के कुछ मूल्य होते है, जो हमेशा राष्ट्र के हित से टकराते ही है। यही चुनौती भारत सरकार के सामने है, फ़िल्म पदमावत का डायलग है इतिहास सिर्फ कागज़ पर नहीं लिखा जाता। नरेंद्र मोदी अब इतने बड़े हो गए है कि सिर्फ भारत के इतिहास मे नहीं लिखे जाएंगे, आपके हर कदम को वैश्विक इतिहास मे लिखा जाएगा।
भविष्य यदि यहूदियों ने लिखा तो इस नरसंहार को समय की मांग या जायज कहेगा लेकिन यदि ये इतिहास फिर वामपंथियो के हाथ लग गया तो गाजा के खून की बूंदे दिल्ली के ताज़ पर भी गिरेगी। भारत से भी प्रश्न पूछे जाएंगे कि तथाकथित मानवता जो आतंकवादियों से शर्मसार नहीं होती वो ज़ब इजरायल के आतंक विरोध से शर्मसार हो रही थी तब भारत क्या कर रहा था।
दुनिया को समझाना बड़ा मुश्किल होगा कि इजरायल से भारत के संबंध दो राष्ट्र से ज्यादा दो सभ्यताओं के है और वो भी प्राचीन सभ्यता। ये 500 साल पुराने लोकतंत्र हिन्दुओ और यहूदियों पर प्रश्न नहीं लगा सकते। इजरायल भी जो कर रहा है वो समझ से बाहर हो रहा है।
कदाचित भारत को संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट को स्वीकार कर लेना चाहिए मगर यदि वोटिंग हो तो बाहर हो जाना चाहिए। अच्छा यही होगा कि विदेश मंत्रालय के किसी विभाग का सचिव बयान दे और जयशंकर साहब कुछ ना कहे। बाकि होइही वही जो राम रचिराखा।
(परख सक्सेना)



