Metro में 20 साल बाद मिला पहला प्यार – एक आवाज ने बदल दिया पूरा दिन – शशांक और नलिनी की दिल छू लेने वाली कहानी
कभी-कभी जिंदगी हमें ऐसे मोड़ पर ले आती है, जहां अतीत अचानक सामने आकर खड़ा हो जाता है। बीस साल पहले कॉलेज के गलियारों में साथ घूमने वाला कोई खास दोस्त अगर अचानक दिल्ली मेट्रो की भीड़ में दिखाई दे जाए, तो शायद कुछ सेकंड के लिए इंसान यह भूल ही जाए कि वह आज की जिंदगी में है या अपने पुराने दिनों में लौट गया है। शशांक के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब रोज की तरह ऑफिस जाने के लिए मेट्रो में बैठे इस शख्स की नजर अचानक एक महिला पर पड़ी और उसके मन ने कहा – कहीं यह नलिनी तो नहीं?
शशांक और नलिनी की कहानी कॉलेज के दिनों से शुरू हुई थी। वह दौर जब रिश्तों में आज जैसी सुविधा नहीं थी, मोबाइल फोन हर किसी की जेब में नहीं होता था और लंबी बातचीत के लिए न सोशल मीडिया था, न वीडियो कॉल। कॉलेज की दोस्ती धीरे-धीरे बेहद करीबी रिश्ते में बदल गई थी, लेकिन पढ़ाई पूरी होते ही दोनों की राहें अलग हो गईं। समय बीतता गया, जिंदगी आगे बढ़ती गई और देखते ही देखते दो दशक गुजर गए। दोनों ने शायद यह मान लिया था कि अब मुलाकात की कोई संभावना नहीं है, लेकिन किस्मत ने दिल्ली मेट्रो में एक सुबह दोनों को फिर आमने-सामने ला खड़ा किया।
सुबह की जल्दबाजी में शुरू हुआ एक असाधारण दिन
उस सुबह शशांक की नींद कुछ देर से खुली थी। अलार्म शायद समय पर बजा होगा, लेकिन उसकी नींद नहीं खुली और जब आंख खुली तो पूरा सुबह का कार्यक्रम गड़बड़ा चुका था। जल्दी-जल्दी तैयार होते हुए उसके सामने सबसे बड़ी चिंता नाश्ते की थी। घर पर खाना बनाने का समय नहीं था, इसलिए उसने सोचा कि रास्ते में चौक के पास मशहूर गणेश कचौड़ी वाले से दो कचौड़ी खा लेगा और फिर सीधे मेट्रो स्टेशन पहुंच जाएगा।
जल्दी में तैयार होकर उसने लैपटॉप बैग उठाया और कमरे से बाहर निकल गया, लेकिन दरवाजा बंद करते समय पता चला कि चाबी ही नहीं मिल रही है। दो-तीन मिनट तक कमरे में इधर-उधर तलाश करने के बाद आखिरकार चाबी मिली। बाहर निकलते हुए शशांक ने खुद से ही कहा, “जिस दिन जल्दी होती है, उसी दिन कोई न कोई अड़चन जरूर आ जाती है।”
चौक पर गरमागरम कचौड़ी सामने आई तो कुछ पल के लिए ऑफिस की चिंता पीछे छूट गई। एक तरफ मन कर रहा था कि आराम से बैठकर नाश्ता किया जाए, लेकिन दूसरी तरफ दिमाग लगातार याद दिला रहा था कि अगर ज्यादा देर हुई तो मेट्रो में भीड़ बढ़ जाएगी और फिर पूरे रास्ते खड़े होकर जाना पड़ सकता है। आखिरकार उसने जल्दी-जल्दी दो कचौड़ी खाईं और मेट्रो स्टेशन की ओर निकल पड़ा।
मेट्रो में एक चेहरा देखकर ठहर गई नजर
शशांक को रोज ऑफिस जाने के लिए करीब 15 स्टेशनों का सफर करना पड़ता था। उसकी कोशिश रहती थी कि किसी तरह सीट मिल जाए, ताकि यात्रा थोड़ी आरामदायक रहे। इसी वजह से वह अक्सर आखिरी कोच में चढ़ता था, क्योंकि उसे उम्मीद रहती थी कि वहां सीट मिलने की संभावना थोड़ी बेहतर होगी।
उस दिन भी किस्मत ने उसका साथ दिया और उसे बैठने के लिए सीट मिल गई। वह अभी ठीक से बैठकर आराम भी नहीं कर पाया था कि उसकी नजर सामने गेट के पास वाली सीट पर बैठी एक महिला पर पड़ी। चेहरा देखते ही उसके दिमाग में अचानक एक नाम कौंधा – निशा।
शशांक कुछ सेकंड तक उस महिला को देखता रहा। चेहरे की बनावट और कुछ अंदाज पुराने दिनों की याद दिला रहे थे, लेकिन फिर उसने खुद को समझाया कि शायद वह भ्रम में है। उसने सोचा कि नलिनी तो कॉलेज के दिनों में काफी दुबली-पतली थी, जबकि सामने बैठी महिला का व्यक्तित्व बिल्कुल अलग लग रहा था। बाल भी अलग थे और पूरा लुक बदल चुका था।
फिर भी दिल बार-बार यही कह रहा था कि शायद वह नलिनी ही है।
नजरें मिलीं, लेकिन पहचान नहीं हुई
शशांक ने तय किया कि वह कुछ देर तक उस महिला को देखता रहेगा। अगर वह सचमुच नलिनी हुई तो शायद उसकी नजर भी उस पर पड़ेगी और पहचान होने के बाद कोई प्रतिक्रिया जरूर आएगी। कुछ देर बाद दोनों की नजरें सच में मिलीं।
शशांक के चेहरे पर तुरंत मुस्कान आ गई। उसे लगा कि अब तो पहचान पक्की हो जाएगी, लेकिन सामने वाली महिला के चेहरे पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं आई। वह सामान्य तरीके से दूसरी तरफ देखने लगी। शशांक की मुस्कान कुछ ही पल में मायूसी में बदल गई।
उसने खुद को समझाया कि शायद उसकी आंखें धोखा खा रही हैं। आखिर 20 साल बहुत लंबा वक्त होता है। इतने वर्षों में इंसान का चेहरा, पहनावा, हेयरस्टाइल और व्यक्तित्व सब कुछ बदल सकता है।
लेकिन मन मानने को तैयार नहीं था।
एक बच्चे ने बढ़ा दिया शक
शशांक ने महिला के साथ मौजूद लोगों पर गौर किया। उसके साथ एक पुरुष था और करीब तीन-चार साल का बच्चा भी। पास में एक बड़ा ट्रॉली बैग और हैंडबैग रखा था। महिला के हाथ में कपड़े का एक थैला था, जिसे देखकर लग रहा था कि उसमें शायद यात्रा के दौरान खाने-पीने का सामान रखा हुआ है।
शशांक ने अंदाजा लगाया कि परिवार शायद किसी ट्रेन से दिल्ली आया है। उसे याद आया कि आनंद विहार टर्मिनल पर बिहार और पूर्वी भारत की ओर जाने वाली कई ट्रेनों का आवागमन होता है। उसने तुरंत अपने फोन पर ट्रेन की जानकारी देखी और विक्रमशिला एक्सप्रेस के समय से मिलान किया। टाइमिंग देखकर उसका शक और गहरा गया।
अब मामला केवल चेहरे की समानता तक सीमित नहीं था। उसे लगने लगा था कि शायद वह सच में अपनी पुरानी दोस्त नलिनी के सामने बैठा है।
कॉलेज की छोटी-छोटी आदतें याद आने लगीं
शशांक ने मन ही मन कॉलेज के दिनों की नलिनी को याद करना शुरू कर दिया। वह सोचने लगा कि नलिनी किस तरह सलीके से बैठती थी, बात करते समय उसके चेहरे पर अचानक मुस्कान कैसे आ जाती थी और वह बार-बार कान के पास आए बालों को कैसे ठीक करती थी।
कैंटीन में बैठने पर उसका बायां पैर हल्का-हल्का हिलता रहता था। कॉलेज के गलियारों से लेकर भागलपुर की गलियों तक दोनों ने न जाने कितने घंटे साथ बिताए थे। रेलवे स्टेशन की तरफ जाना हो या सुजागंज बाजार की गलियों में घूमना, शशांक को नलिनी के साथ बिताया लगभग हर पल याद आने लगा।
लेकिन सामने बैठी महिला में उसकी यादों वाली नलिनी की बहुत कम चीजें मिल रही थीं। शशांक फिर उलझ गया। शायद वह गलत था।
तभी बच्चा अचानक मेट्रो के दरवाजे की ओर चला गया। महिला ने उसे इशारे से वापस बुलाया, लेकिन जब वह नहीं आया तो वह अपनी सीट से उठकर उसे लेने के लिए दो कदम आगे बढ़ी।
शशांक की नजर उसके चलने के अंदाज पर टिक गई। और उसी क्षण उसका दिल जैसे कह उठा – यही नलिनी है।
अब सबसे बड़ी मुश्किल थी उससे बात करना
शशांक के सामने अब असली समस्या थी। वह जाकर सीधे पूछ भी नहीं सकता था कि “क्या तुम नलिनी हो?” क्योंकि महिला के साथ उसका पति और बच्चा मौजूद थे। अगर वह गलत निकला तो स्थिति अजीब हो सकती थी।
वह खुद को समझा रहा था कि किसी अनजान महिला को इस तरह रोकना ठीक नहीं होगा। लेकिन दूसरी तरफ 20 साल बाद मिले अपने पहले प्यार को यूं ही जाने देना भी उसे मुश्किल लग रहा था।
तभी मेट्रो में कीर्ति नगर स्टेशन आने की घोषणा हुई। महिला और उसके पति ने अपना सामान संभालना शुरू कर दिया। शशांक समझ गया कि वे उतरने वाले हैं।
उसने आखिर फैसला कर लिया।
अगर वह आज चुप रहा तो शायद जिंदगी दोबारा ऐसा मौका कभी न दे।
“निशा!”
मेट्रो से उतरने के बाद शशांक ने हिम्मत जुटाई और पीछे से आवाज लगाई, “निशा!”
महिला और उसके पति दोनों अचानक रुक गए। दोनों ने पीछे मुड़कर देखा। सामने शशांक खड़ा था, चेहरे पर झिझक और आंखों में वर्षों पुरानी पहचान की चमक थी।
अगले ही पल महिला के मुंह से निकला, “अरे सौरव, तुम यहां?”
बस, इतना सुनना था कि शशांक की सारी शंकाएं खत्म हो गईं। वह सचमुच नलिनी थी।
कुछ पल के लिए जैसे दोनों 20 साल पीछे चले गए। नलिनी ने गर्मजोशी से शशांक से मुलाकात की और हंसते हुए शिकायत की कि वह इतने वर्षों से कहां गायब था। उसे उसकी कोई खबर नहीं थी और कॉलेज के पुराने दोस्तों में भी किसी को नहीं पता था कि शशांक अब कहां रहता है और क्या कर रहा है।
फिर नलिनी ने अपने पति अमित से शशांक का परिचय कराया। उसने बताया कि दोनों ने भागलपुर कॉलेज में करीब तीन साल साथ पढ़ाई की थी और दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे।
20 साल की दूरी की वजह
शशांक ने बताया कि ग्रेजुएशन के बाद वह आगे की पढ़ाई और कुछ कोर्स के लिए दिल्ली चला आया था। उस समय मोबाइल फोन और इंटरनेट आज की तरह आम नहीं थे, इसलिए लगातार संपर्क बनाए रखना आसान नहीं था।
उधर नलिनी के पिता का भी पटना ट्रांसफर हो गया था। धीरे-धीरे संपर्क टूट गया और दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गए।
नलिनी ने जब शशांक से उसकी शादी के बारे में पूछा तो उसने मुस्कुराकर कहा कि अभी शादी नहीं हुई है। शशांक ने बताया कि शुरुआती वर्षों में उसने सरकारी नौकरी की तैयारी में काफी समय लगाया। कुछ परीक्षाओं के परिणाम भी आए, लेकिन मनचाहा अवसर नहीं मिला। बाद में उसने एमबीए किया और फिर निजी क्षेत्र में नौकरी शुरू की।
जिंदगी में कुछ पारिवारिक परेशानियां भी आईं, जिनके कारण शादी का मामला लगातार टलता रहा। हालांकि अब घर में रिश्ते की बात चल रही है और उसे उम्मीद है कि साल के अंत तक शादी हो जाएगी।
नलिनी ने भी अपनी जिंदगी के बारे में बताया। उसके पति अमित जनकपुरी स्थित पंजाब नेशनल बैंक में मैनेजर हैं। दोनों की शादी 2020 में कोरोना महामारी के दौरान हुई थी। शादी के बाद नलिनी कुछ वर्षों तक भागलपुर में अपने सास-ससुर के साथ रही, लेकिन करीब ढाई साल से वह दिल्ली में पति के साथ रह रही है।
मुलाकात छोटी थी, लेकिन याद बहुत लंबी
बातचीत के दौरान शशांक को अचानक याद आया कि ऑफिस पहुंचने में काफी देर हो चुकी है। उसने अपनी नौकरी का हवाला देते हुए बातचीत रोकने का फैसला किया। जाने से पहले दोनों ने एक-दूसरे के फोन नंबर लिए और भविष्य में संपर्क बनाए रखने का वादा किया।
अमित ने भी शशांक को सहजता से अपने घर लंच के लिए आने का निमंत्रण दिया। यह पूरा दृश्य शायद शशांक के लिए किसी फिल्म के आखिरी दृश्य जैसा था – 20 साल पुराना रिश्ता, अचानक हुई मुलाकात और फिर एक नई शुरुआत की संभावना, लेकिन इस बार दोस्ती के रूप में।
शशांक ने कीर्ति नगर से रमेश नगर स्थित अपने ऑफिस के लिए ऑटो बुक किया। रास्ते भर उसके चेहरे पर मुस्कान बनी रही। सुबह जो दिन देर से उठने, चाबी खोजने और ऑफिस की चिंता से शुरू हुआ था, वही दिन अचानक उसकी जिंदगी की सबसे पुरानी यादों को वापस लेकर आ गया था।
नलिनी अब किसी और की जिंदगी का हिस्सा थी और उसकी अपनी दुनिया भी आगे बढ़ चुकी थी। शशांक यह बात अच्छी तरह समझता था। फिर भी कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनकी खूबसूरती उनके अधूरे रह जाने में ही होती है। वे जिंदगी का हिस्सा भले न बनें, लेकिन यादों में हमेशा जिंदा रहते हैं।
उस दिन ऑफिस पहुंचते-पहुंचते शशांक ने अपने भीतर उठी पुरानी भावनाओं को शांत कर लिया। उसने लैपटॉप खोला, काम शुरू किया और खुद को रोजमर्रा की जिंदगी में वापस ले आया। मगर शायद उस दिन के बाद जब भी वह मेट्रो में बैठेगा, कीर्ति नगर स्टेशन का नाम सुनते ही उसे एक चेहरा जरूर याद आएगा – नलिनी का, जिससे वह 20 साल बाद मिला था और जिसे जिंदगी ने अचानक उसी शहर में, उसी सफर के बीच फिर उसके सामने ला खड़ा किया था।
(मंजू सिंह)



