Poetry by Manmeet Soni: कविता भावनाओं को कितना उद्वेलित कर सकती है अनुभव कीजिये मनमीत जी की कुशल लेखनी के माध्यम से: “सुहाग-रात और इसके आस-पास की कविता” नामक उनके कविता संग्रह से..
फेरे सुबह चार बजे समाप्त हुए
आँखों में आँसू और नींद लिए
दुल्हन एक-एक के गले लगती है
दूल्हा उसे गाड़ी में बिठाता है
वह खिड़की से देखती है सबको
और अपने हाथ हिलाती है
—
खिड़की के बंद होते ही
दूल्हा थाम लेता है उसका हाथ
दुल्हन की गर्दन को झुका लेता है अपने कंधे पर
चूम लेना चाहता है उसका माथा
लेकिन इतना छोटा भी नहीं है विनायक
कि यह नहीं समझे
दूल्हा और दुल्हन आख़िर क्या कर रहे हैं
—
मेन गेट पर
हाथ में आरती लिए खड़ी हैं मम्मी जी
बुआ जी ताई जी आदि को नहीं पहचानती दुल्हन
दीये की रौशनी पर नहीं टिकती आँखें
भर आते हैं आँखों में आँसू
दूल्हा
अब उस तरह हाथ नहीं थाम सकता
जिस तरह गाड़ी में थामा था उसने दुल्हन का हाथ
—
सात थालियों को सरकाने के बाद
पितर जी के आले की पूजा से निवृत्त होकर
कहा जाता है दुल्हन से :
“यह जोड़ा उतार के कुछ और पहन लो बेटी”
लेकिन दुल्हन से
उतारा नहीं जाता इतना भारी लहंगा
कसा हुआ वह ब्लाउज
जो पहनाया था सहेलियों ने
अकेली ही उतारती है दुल्हन
और मन ही मन सोचती जाती है
अब सब कुछ साजन के हवाले
—
एक घंटे की झपकी के बाद
उठती है दुल्हन
कोई लाता है चाय कलेवा
कोई रात के मोठ भुजिया पापड़ वगैरह
उठाता है कोई दूल्हे को
कि चलना है माताजी के मंदिर
देनी है धोक जोड़े से
लेना है आशीष
—
रात भर की
जागी हुई दुल्हन की आँखों में
पिघलता है काजल
रात भर के
जागे हुए दूल्हे को
फिर से छेड़ते हैं
कभी भाभी
कभी दोस्त
कभी “उस” मामले के सीनियर
कि अचानक आता है फूल वाला
जो सजाता है
सबसे आख़िर के कोने के कमरे को
एक लोहे के स्टैंड पर
मोगरे चमेली और गुलाब के फूल बंधते हैं
बिस्तर पर बिछती है नई चद्दर
उस पर बिखेरी जाती हैं
गुलाब के फूलों की पंखुड़ियाँ
सजावट करने वालों में से कोई कुंवारा
उस बिस्तर पर लेट कर देखता है
करता है फैन्टेसी :
“साले हम भी सोयेंगे अपनी दुल्हनिया के साथ”
—
ढलती है शाम
धड़कन बढ़ने लगती है दुल्हन की
बेचैन होने लगता है दूल्हा
कोई लहसुन अदरक शहद का नुस्खा बताता है
कोई नीली गोली का जादू
कोई पांच सौ रुपये का करामाती पान
कोई अश्वगंधा शिलाजीत सफ़ेद मूसली का कॉम्बिनेशन
लेकिन हालत ख़राब ही रहती है दूल्हे की
और दुल्हन के कान में
दूल्हे की चाची फूंक जाती है यह मंत्र
“ज़्यादा शोर मत करना / वो जो करे उसे करने देना”
—
और फिर
कुछ देर बाद पर्दा गिर जाता है
बीच में जो कुछ भी होता है
उसके बारे में
एक भी शब्द नहीं लिखूंगा मैं
यह दो देहों का यज्ञ है :
जिसमें प्यार ही हवन कुंड है
जिसमें प्यार ही समिधा है
जिसमें प्यार ही धुआं है
जिसमें प्यार ही देवता है
जिसमें प्यार ही कामना है
जिसमें प्यार ही वरदान है
जिसमें प्यार ही सब कुछ है
इसी मोड़ पर समझ में आता है
वह अद्वैत
जिसे कोई पंडित नहीं सिखा सकता
जिसके बारे में
ग्रंथ और टीकाएँ चुप हैं
लेकिन अनुभव है
सौ प्रतिशत ज्ञान की गारंटी
—
सुबह
जब खुलता है
नई दुल्हन के कमरे का गेट
तो एक मुस्कान चिपकी रहती है सबके होंठों पर
सब गौर से देखते हैं दुल्हन को
और जाँचते परखते हैं
कि रात की शुभ थकान
दुल्हन की आँखों में है या नहीं
कि चाल में
एक भारीपन है या नहीं
कि साड़ी में
कुछ सिलवटें हैं या नहीं
और दूल्हे के चेहरे पर
है या नहीं
वह अनकहा दर्प
जो फूल का रस पीकर
भंवरे के पंखों की आवृत्ति में दिखाई पड़ता है
—
पता नहीं :
मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ
लेकिन उन लोगों पर दया आती है
जो इस रात के आने से पहले ही
किसी होटल या जुगाड़ के कमरे में
अच्छी तरह परख लेते हैं :
“हम दोनों से “वह सब” होता है या नहीं”
—
आह!
इन दिनों
खोता हुआ
दुल्हन के भीतर का रहस्य
इन दिनों
लुप्त होता हुआ
दूल्हे के भीतर का बेचैन इंतज़ार
आह!
यह नए दोस्त
यह विशाल बाज़ार
यह उपलब्ध स्पेस
यह धाकड़ तेज़ी जीवन की
आह!
पुकारता हूँ मैं
जीवन की पुरानी सभ्यता को
सभ्यता में निहित संस्कृति को
संस्कृति में निहित धीरज को
धीरज में निहित सौंदर्य को
सौंदर्य में निहित अज्ञेय को
अज्ञेय में निहित उस शाश्वत को –
जो सत्य था, जो शिव था, जो सुंदर था!
—
आज
इस शादी में
कितने अजीब लग रहे हैं
यह दूल्हा और दुल्हन
जो हँस हँस कर बातें कर रहे हैं
और
माथे और गाल पर
चूम रहे हैं एक दूसरे को..
कितने सतही हैं
यह सब दोस्त रिश्तेदार माँ बाप वगैरह
जो कहते हैं :
“यह नया समय है / इसमें सब कुछ चलता है”
शायद
यह दूल्हा और दुल्हन
अच्छी तरह परिचित हैं
एक-दूसरे के शरीरों की सुरंगों से..
इन्होंने खो दिया है
उस महान क्षण में
आश्चर्यचकित होने का वह उद्दाम आवेग
जब घूंघट के उठते ही
दूल्हे के सीने में
बिजलियाँ कड़कने लगती..
और दूल्हा
जब दुल्हन की ओर पीठ करके
अपने कपड़े उतारता
तो दुल्हन की आँखें
कभी इस ओर देखती
कभी उस ओर देखती
तो कभी दूल्हे की ओर देखती
और
लाज की एक गर्म रेखा
सर के बालों से लेकर
पाँव की एड़ी तक चमक उठती..!
—
खाना खा लिया है मैंने
पांच सौ रुपयों की प्लेट का पूरा मज़ा लिया है
भाड़ में जाए यह समाज
कूड़े में जाए वनीला आइसक्रीम की प्लेट
—
उदास मन
भारी पैरों से
लौटता हूँ घर की ओर..
मनमीत!
चल खुसरो घर आपणे
रेन भई चहुँ देस!!!
(मनमीत सोनी)



