Startup: कोशिश ईमानदारी से करो और लग कर करो, ऊपरवाला कामयाबी का तोहफा देता जरूर है..
मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के अडगांव गांव से निकलकर संघर्ष और आत्मनिर्भरता की एक ऐसी प्रेरक कहानी सामने आई है, जो बताती है कि सीमित संसाधनों और कठिन हालात के बावजूद मेहनत और धैर्य से सफलता हासिल की जा सकती है।
इस कहानी के केंद्र में हैं मनोज गावंदे और उनके भाई विनोद, जिन्होंने पिता के निधन के बाद हार मानने के बजाय खुद की राह बनाई और आज एक स्थिर व्यवसाय खड़ा कर लिया है।
पिता के निधन ने बदली जिंदगी की दिशा
मनोज गावंदे बताते हैं कि वर्ष 2006 में उनके पिता का अचानक देहांत हो गया। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और आर्थिक स्थिति पूरी तरह डगमगा गई। उस समय परिवार को संभालने वाला कोई नहीं था और जिम्मेदारियां सीधे दोनों भाइयों के कंधों पर आ गईं। हालात ऐसे थे कि नियमित रोजगार तक मिलना मुश्किल हो गया था।
मां के सहारे और मेहनत से शुरू हुआ सफर
इन कठिन परिस्थितियों में उनकी मां ने हौसला दिया और दोनों भाइयों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। मनोज और विनोद ने दूसरों के यहां छोटी-मोटी नौकरियां कीं और धीरे-धीरे ₹10,000 की पूंजी इकट्ठा की। इसी छोटी सी रकम से उन्होंने हाट बाजार में कपड़ों का छोटा सा व्यवसाय शुरू करने का फैसला किया।
शुरुआती सालों में संघर्ष ही संघर्ष
व्यवसाय के शुरुआती दौर में चुनौतियां कम नहीं थीं। कई बार ऐसा हुआ कि दिनभर मेहनत करने के बाद भी खर्च निकालना मुश्किल हो जाता था। कई वर्षों तक आमदनी बेहद सीमित रही, लेकिन दोनों भाइयों ने हार मानने के बजाय लगातार काम करना जारी रखा। उनका मानना था कि अगर मेहनत ईमानदारी से की जाए, तो परिणाम जरूर मिलते हैं।
आज बन चुके हैं आत्मनिर्भर उद्यमी
लगभग 15 से 20 वर्षों की निरंतर मेहनत के बाद आज दोनों भाई कपड़ों के व्यवसाय से हर साल लाखों रुपये की आय कर रहे हैं। मनोज के अनुसार, वर्तमान में वे रोजाना करीब ₹2,000 से ₹3,000 तक की कमाई कर लेते हैं। यह सफलता उनके लिए सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की भी जीत है।
मौसम के अनुसार बदलते हैं व्यापार की रणनीति
मनोज और विनोद अपने व्यवसाय को मौसम के हिसाब से संचालित करते हैं। गर्मियों में वे हल्के और सादे कपड़ों की बिक्री करते हैं, जबकि सर्दियों में ऊनी और गर्म कपड़ों पर ध्यान देते हैं। इसके अलावा, वे समय-समय पर खेल-खिलौनों की दुकान भी लगाते हैं, जिससे अतिरिक्त आय हो जाती है। दोनों भाई बुरहानपुर जिले के विभिन्न गांवों में लगने वाले हाट बाजारों में अपनी दुकानें लगाते हैं।
परिवार की भागीदारी बनी ताकत
इस पूरे सफर में उनकी मां और भाई दोनों का सहयोग लगातार बना रहा। परिवार की एकजुटता ने इस छोटे से व्यवसाय को मजबूत आधार दिया और आज यह उनके जीवनयापन का मुख्य साधन बन चुका है।
युवाओं के लिए संदेश
मनोज गावंदे का कहना है कि अगर कोई युवा बेरोजगारी से परेशान है, तो उसे छोटे स्तर से ही सही, लेकिन खुद का काम शुरू करने से नहीं डरना चाहिए। संघर्ष जरूर करना पड़ेगा, लेकिन धैर्य और मेहनत के साथ सफलता अवश्य मिलती है।
(न्यूज़ हिन्दू ग्लोबल ब्यूरो)



