Malls of India: कभी शहर की शान थे, अब पसरा है सन्नाटा: क्यों फेल हो रहे हैं भारत के 70% मॉल..
भारत में मॉल कल्चर का आगाज़ एक सुनहरे सपने की तरह हुआ था। साल 1999 में जब दिल्ली का अंसल प्लाज़ा और चेन्नई का स्पेंसर प्लाज़ा खुला, तो भारतीयों के लिए शॉपिंग की परिभाषा हमेशा के लिए बदल गई। धूल और शोर से भरे पारंपरिक बाजारों से निकलकर लोग कांच की ऊँची इमारतों, एयर-कंडीशनिंग और एक ही छत के नीचे दुनिया भर के ब्रांड्स देखकर हैरान रह गए।
2000 के दशक की शुरुआत में यह जुनून इतना बढ़ा कि गुरुग्राम से लेकर टियर-2 शहरों तक मॉल्स की बाढ़ आ गई। उस दौर में मॉल जाना केवल खरीदारी नहीं, बल्कि एक स्टेटस सिंबल और परिवार के साथ छुट्टी मनाने का नया ठिकाना बन गया। डेवलपर्स को लगा कि कंक्रीट का यह ढांचा सफलता की गारंटी है, लेकिन वे इस चमक के पीछे छिपी कड़वी हकीकत को समझने में नाकाम रहे।
क्यों गायब हुई मॉल की रौनक?
जिस तेजी से मॉल खड़े हुए थे, उतनी ही तेजी से उनकी चमक फीकी पड़ने लगी।
खराब आर्किटेक्चरल प्लानिंग, ई-कॉमर्स की डिजिटल सुनामी और बदलती लाइफस्टाइल ने इन शॉपिंग डेस्टिनेशंस को “रिटेल कब्रिस्तान” बना दिया। नाइट फ्रैंक इंडिया की रिपोर्ट और एक्सपर्ट्स की राय बताती है कि देश के करीब 70% मॉल आज फेल श्रेणी में हैं, जिनमें से कई अब “घोस्ट मॉल” बन चुके हैं।
इन वीरान ढाँचों में दुकानों के शटर पर अब ब्रांड्स के नाम नहीं, बल्कि धूल और सन्नाटा पसरा है।
रियल एस्टेट एक्सपर्ट मनुज गाखर के अनुसार, मॉल्स के फेल होने की सबसे बड़ी वजह है डेवलपर्स की खराब प्लानिंग और फुटफॉल की भारी कमी। कई मॉल्स को Completion Certificate (OC) तो मिल गया, लेकिन सही लीजिंग रणनीति और ग्राहकों को खींचने वाले ब्रांड मिक्स के अभाव में वे वीरान पड़े हैं।
ई-कॉमर्स और लोकेशन की मार
ऑनलाइन शॉपिंग और ई-कॉमर्स ने ग्राहकों को घर बैठे भारी डिस्काउंट और सुविधा दी। कई मॉल्स की लोकेशन और डिजाइन दोषपूर्ण रहे — न पर्याप्त पार्किंग, न ही आकर्षक ब्रांड्स।
मिडिल क्लास के लिए ये मॉल शॉपिंग के बजाय केवल विंडो शॉपिंग और एयर-कंडीशनिंग में टहलने का जरिया बन गए। दुकानों की सेल नहीं बढ़ी, किराया चुकाना मुश्किल हुआ और जब बड़े एंकर स्टोर्स ने हाथ खींच लिया, तो फुटफॉल पूरी तरह गिर गया।
रिपोर्ट्स और आंकड़े
नाइट फ्रैंक इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, 365 में से 74 मॉल्स ऐसे हैं जो 40% से ज्यादा खाली होने के कारण “घोस्ट मॉल” बन गए हैं। इन डेड-इनवेस्टमेंट्स को सही प्लानिंग और री-मॉडलिंग से फिर से जीवित किया जा सकता है।
देश के “घोस्ट मॉल्स” में छिपे ₹357 करोड़ के अवसर का 77% हिस्सा पश्चिमी और दक्षिणी भारत में है। मुंबई, हैदराबाद और अहमदाबाद जैसे आठ प्रमुख शहर इस संभावित राजस्व का 66% हिस्सा रखते हैं।
अंसल प्लाज़ा: एक सुनहरे दौर का अवसान
1999 में दक्षिण दिल्ली के खेल गांव मार्ग पर खुला अंसल प्लाज़ा केवल दिल्ली का पहला मॉल नहीं था, बल्कि आधुनिक भारत की बदलती जीवनशैली का प्रतीक था। इसके एम्फीथिएटर में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम और विदेशी ब्रांड्स की मौजूदगी इसे राजधानी की सबसे पॉश डेस्टिनेशन बनाती थी। लेकिन वक्त के साथ नए और विशाल मॉल्स की होड़ और मैनेजमेंट की अनदेखी ने इसकी पहचान धुंधला कर दी।
GIP मॉल: चमक से सन्नाटे तक
2007 में नोएडा के सेक्टर-38A में शुरू हुआ द ग्रेट इंडिया प्लेस (GIP) दिल्ली-NCR का सबसे बड़ा शॉपिंग हब बना। गाड़ियों की लंबी कतारें और वर्ल्ड-क्लास ब्रांड्स की मौजूदगी ने इसे उत्तर भारत का रिटेल सेंटर बना दिया। लेकिन कोविड-19 महामारी, बदलती आर्थिक परिस्थितियाँ और सामने खुले DLF मॉल ऑफ इंडिया की प्रतिस्पर्धा ने इसकी कमर तोड़ दी। आज यह विशाल मॉल अपनी पुरानी गरिमा खोकर एक “घोस्ट मॉल” बनने की कगार पर है।
भारत में मॉल कल्चर का सपना अब सन्नाटे और धूल से भरे घोस्ट मॉल्स में बदल रहा है। खराब प्लानिंग, ई-कॉमर्स की क्रांति और बदलती उपभोक्ता आदतों ने इन कंक्रीट के महलों को रिटेल कब्रिस्तान बना दिया है। हालांकि, सही रणनीति और री-मॉडलिंग से इन्हें फिर से जीवित कर भारत के रिटेल सेक्टर को नई दिशा दी जा सकती है।
(त्रिपाठी पारिजात)



