Poetry by Manmeet Soni:जिन्दगी की खुशबू है मनमीत की कविता में सोंधी सोंधी जो लूट ले जाती है दिल हर बार..
सुनने में आया है
कि गैस की कीमतें बढ़ जाएंगी अब
कि गैस सिलेंडर महंगे हो जाएंगे –
सच पूछिए तो
मुझे यह कल्पना कर के अच्छा लग रहा है
कि कुछ दिन
चूल्हों पर सिकेंगी रोटियां
दाल पकेगी
मद्धम आंच पर हल्के हल्के
सब जने परिवार के साथ बैठेंगे
मिलकर खाएंगे दाल रोटी!
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आप यह मत सोचिये
कि मैं नरेन्द्र मोदी को वोट देता हूँ
इसलिए आपदा में अवसर जैसी
कोई फ़ालतू बात कर रहा हूँ
मैं तो
दिन दहाड़े खुली आँखों से
एक पुराना सपना देख रहा हूँ
और मुझे याद आ रही है
निदा फ़ाज़ली की नज़्म :
“बेसन की सौंधी रोटी पर / खट्टी चटनी जैसी माँ”
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कितने बरस हुए
कितने दशक हुए
ताज़ा सिकी हुई रोटी पर से
राख़ नहीं झाड़ी हमने
जीभ पर नहीं आया
मिट्टी की करकरास का स्वाद
नहीं सुनी
चूल्हे पर रखी हुई
हांडी की खदबद
नहीं देखा
हांडी पर रखी हुई
प्लेट का
भाप के दबाव से हिलना और नाचना
अहा!
वे दिन धुआँ हो गए
हमारे देखते देखते!
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डाइनिंग टेबल पर बैठ कर
ऊब नहीं गए क्या आप लोग?
कितने दिन हुए
आँगन में
रसोई के पास
एक फटी हुई दरी बिछाकर
नहीं बैठे हम लोग
माँ ने
केसरोल में परोसी हमें गर्म रोटियां
चिमटे से पकड़कर
नहीं रखी थाली में
दाल से भरी हांडी में
बड़ा चम्मच डुबोकर
नहीं डाली किसी ने कटोरी में ख़ूब सारी दाल
मुट्ठी से
प्याज़ नहीं फोड़ा हमने
कितने बरसों से
छाछ नहीं पीयी डोली भर-भरकर
घी नहीं लगाया
गर्म सिंकी हुई थोड़ी-सी जली हुई रोटियों पर
एक जुग बीत गया जैसे
आग
धुएं
मिट्टी
रोटी
सब्ज़ी
और
घी से सम्पर्क कटे हुए
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इस समय
जब धू धू कर जल रहा है संसार
ईरान
इराक
सीरिया
लेबनान
उक्रेन सब के सब जल रहे हैं
लालच की भट्टी में
केवल भारत है
जहाँ की रसोइयों से
उठ सकता है
चूल्हों का धुआँ
केवल भारत है
जहाँ महक सकता है
घी का बघार
केवल भारत है
जहाँ सुख से रह सकते हैं
परिवार के परिवार
मुहल्ले के मुहल्ले
—-
आओ दोस्तो!
गाय के गोबर और काली मिट्टी से
एक चूल्हा बनाएं
एक फूँकणी बनाएं लोहे की
उससे बांसुरी बजाएं फूंक मारकर
—-
अपनी माँओं बहनों पत्नियों को
फूलों के रास्ते
चूल्हों तक लाएं
और उनसे निवेदन करें :
कुछ दिन चूल्हों पर बनाइये खाना
कि हमें भूख लग रही है जोरों से
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महंगी होती है
तो होने दो गैस को
दाम बढ़ता है
पेट्रोल डीज़ल का
तो बढ़ने दीजिये
डरिये मत
घबराइए मत
स्त्रियों के हवाले कर दीजिये
बढ़ती हुई महंगाई को
स्त्रियां
भूखा नहीं मरने देंगी हमे
आग
धुएं
मिट्टी
रोटी
सब्ज़ी
और
घी
इन छह महाभूतों से
बनी है यह सृष्टि
मेरा
यानी मनमीत सोनी का दावा है
इस सृष्टि का कुछ नहीं बिगड़ेगा
भारत के रहते – होते!
(मनमीत सोनी)