Poetry by Manmeet Soni: एक संवेदनशील हृदय हेतु पत्नी और माँ के बीच चयन नहीं होता – दोनो ही होते हैं उसके लिये उसके अपने -परंतु माँ तो माँ होती है !
कुछ बातें सिर्फ़ मेरी माँ जानती हैं –
मेरी पत्नी को जानने में जिन्हें वक़्त लगा या लगेगा!
—
जैसे यह बात
कि भूख लगती है आधी रात को मुझे
मेरे लिए छोड़नी पड़ती है
एक रोटी
थोड़ी सी सब्जी
सब्जी भी
बैंगन या करेले या लौकी की नहीं
आलू या परवल या पनीर या भिंडी की!
—
जैसे यह बात
कि दूध अच्छा नहीं लगता मुझे
हाँ!
छाछ कितनी भी पी सकता हूँ
छाछ में भी
मुझे चाहिए पोदीना,
काला नमक और थोड़ी सी बर्फ़
—
जैसे यह बात
कि टाइट टी-शर्ट पसंद नहीं मुझे
फिटिंग की जीन्स अच्छी नहीं लगती मुझे
मुझे चाहिये ढीली ढाली जींस
शर्ट मुझे कोटन के पसंद हैं
वे भी आधी बांहों के
मुझे नहीं पसंद
शर्ट को पेंट में दबाना
बेल्ट नहीं पसंद मुझे
चाहे पेंट निकल निकल कर गिरती ही रहे
—
जैसे यह बात
मिठाई में मुझे बूँदी के लड्डू पसंद हैं
चॉकलेट नहीं अच्छी लगती मुझे
ठंडे दही में
जलेबी के टुकड़े करके
चम्मच से घोल कर पी जाता हूँ
काजू कतली के पीछे
इतना दीवाना हूँ
कि कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता
कि वे ताज़ा हैं या हफ़्ते भर पुरानी
—
जैसे यह बात
कि सुबह जल्दी नहीं उठ सकता मैं
आधी रात को जागती है
कविता मुझमें
मुझे चाहिए होती है एक लोटा चाय
साथ में पारले जी बिस्कुट
छत पर जाकर
सिगरेट भी पी लेता हूँ कभी कभी
खैनी चाहिए ही चाहिए मुझे
मम्मी को पता है मेरी बुरी आदतें
लेकिन वो मुझे कभी बुरा लड़का नहीं समझती
—
जैसे यह बात
कि मुझे नींद नहीं आती
तो मैं परेशान होकर पूरे घर को सर पर उठा लेता हूँ
चीखता हूँ :
कविता ले लो भगवान लेकिन नींद देदो!
कभी होमियोपैथि की एकोनाइट लेता हूँ
तो कभी आर्सनिक अल्बम
उस वक़्त मुझे मम्मी चाहिए होती है
चाहिए होती है मम्मी की छुअन
थोड़ी सी देर की तेल मालिश
या गीता का कोई श्लोक या मानस की चौपाई
—
जैसे यह बात
कि मैं दोस्त नहीं बनाता
बचपन से ही
मेरा कोई ख़ास दोस्त नहीं है
शादी ब्याह में भी नहीं जाता मैं
मुझे सिर्फ़ किताबों से मतलब है
किताबों का नाम रखता हूँ मैं :
जैसे गीता मौसी!
जैसे मानस चाची!
जैसे रामायण बुआ
जैसे मीन कांफ़ चाचा!
—
कुछ बातें सिर्फ़ मेरी माँ जानती है
और इस बात से
कभी कभी कोफ़्त भी होती है मेरी पत्नी को
उसे चाहिए
कि मैं आधी रात को खाना न खाऊं
कि मैं सोते वक़्त दूध पियूँ
कि मैं फिटिंग के पेंट शर्ट पहनूं
कि शुगर है इसलिए जलेबी, बूँदी के लड्डू और कतली नहीं खाऊं
कि सुबह जल्दी उठकर घूमने जाऊं
कि वक़्त पर बिस्तर पर आ जाऊं और किताब न पढूं
कि लिखने पढ़ने के अलावा मेरा कोई दोस्त भी हो
लेकिन मैं माफ़ी चाहता हूँ मेरी पत्नी
इस जन्म में तो यह मुमकिन नहीं!
—
प्यारी माँ!
ऐसा कैसे हो सकता है
कि तीस बरस की आदतें
तीस हफ्तों में छूट जाएं…?
मेरी प्यारी पत्नी!
मुझे बर्दाश्त करना सीखो
क्योंकि मैं बदल गया
तो तुम्हारे काम का भी नहीं रह जाऊँगा!
—
मेरी पत्नी!
क्या तुम मेरी आधी पत्नी और आधी माँ बनोगी?
मुझमें एक बच्चा है
और वासना से भरा हुआ एक पुरुष भी
मुझे दो तरह की छूट चाहिए!
—
मैं जानता हूँ
मैं ज़्यादा ही उम्मीद लगा रहा हूँ तुमसे
लेकिन मैं भी
तुम्हारा पिता और पति बनने की कोशिश करूंगा
मैं जानता हूँ :
तुम्हें टी शर्ट और प्लाजो पसंद है
सलवार सूट नहीं..
तुम्हें घर के खाने से ज़्यादा
गोलगप्पे और मोमोज़ पसंद हैं..
तुम्हें राजस्थानी पुरुषों से अधिक
लुभाते हैं पंजाबी मुंडे
—
ऐ मेरी गोरीधण
ऐ मेरी मरवण
ऐ मेरी गजबण
ऐ मेरी काळजे की कोर
ऐ मेरी मिजाजण
मैं तुम्हारा आधा पिता बन जाऊं..
तुम मेरी आधी माँ बन जाओ…
और हम भरत व्यास का यह गीत गुनगुनाएं :
“आधा है चन्द्रमा रात आधी
रह न जाए तेरी मेरी बात आधी
मुलाक़ात आधी..
पिया आधी है प्यार की भाषा
आधी रहने दो मन की अभिलाषा
आधी पलकों में भी है बरसात आधी..!”
—
आओ मेरी पत्नी!
हम
उस आधे को स्वीकार करें
जो आधा होकर भी
हम में पूरा है
और
जिसे एक दूजे के प्यार की ज़रूरत है!
(मनमीत सोनी)