China Vs Japan: क्या जापान बनता जा रहा है चीन का सबसे बड़ा दुश्मन? जानिए आखिर क्यों बदला बीजिंग का रुख..
क्या चीन अब अमेरिका से ज्यादा जापान को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानने लगा है? जानिए सनाई तकाइची, ताइवान, सैन्य ताकत, शी जिनपिंग और चीन की नई रणनीति से जुड़े हर पहलू को
क्या अब चीन की नजर में जापान सबसे बड़ा विरोधी बन गया है?
पिछले कुछ महीनों में चीन की सरकारी मीडिया और वहां की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी की भाषा में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पहले जहां चीन लगभग हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर अमेरिका को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी बताता था, वहीं अब जापान को लेकर उसकी बयानबाजी कहीं ज्यादा आक्रामक होती जा रही है। यही वजह है कि दुनिया भर के रणनीतिक विशेषज्ञ यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या चीन अब जापान को अपना सबसे बड़ा क्षेत्रीय दुश्मन मानने लगा है।
इस बदलाव के संकेत चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के आधिकारिक अखबार पीपुल्स डेली में भी साफ दिखाई देते हैं। यह अखबार केवल खबरें नहीं छापता, बल्कि चीन की सरकार और कम्युनिस्ट पार्टी की सोच, नीतियों और रणनीतियों को भी सामने रखता है। इसमें प्रकाशित होने वाला अंतरराष्ट्रीय मामलों का कॉलम “जोंग शंग” लंबे समय तक अमेरिका की आलोचना करता रहा। लेकिन साल 2025 के आखिर से इसकी प्राथमिकता अचानक बदल गई और इसके निशाने पर जापान आ गया।
आखिर चीन ने जापान पर इतना ज्यादा ध्यान क्यों देना शुरू किया?
इस बदलाव के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। सबसे बड़ा कारण जापान की नई प्रधानमंत्री सनाई तकाइची हैं। अक्टूबर 2025 में उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद जापान ने राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य तैयारियों को लेकर पहले से कहीं अधिक आक्रामक रुख अपनाना शुरू किया।
तकाइची लंबे समय से मजबूत रक्षा नीति की समर्थक मानी जाती रही हैं। उनके सत्ता संभालते ही चीन में यह धारणा मजबूत होने लगी कि जापान अब केवल आत्मरक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि भविष्य में जरूरत पड़ने पर सैन्य भूमिका भी निभा सकता है।
चीन के लिए यह बदलाव बेहद संवेदनशील है। दोनों देशों के बीच द्वितीय विश्व युद्ध का इतिहास आज भी रिश्तों पर गहरा असर डालता है। चीन का मानना है कि जापान ने युद्ध के दौरान किए गए अत्याचारों को लेकर कभी पूरी तरह आत्ममंथन नहीं किया। यही कारण है कि जापान से जुड़ी कोई भी सैन्य गतिविधि चीन में तुरंत चिंता का विषय बन जाती है।
घरेलू राजनीति का भी है बड़ा संबंध
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के भीतर आर्थिक चुनौतियां और सामाजिक असंतोष भी इस बदलाव की एक वजह हो सकते हैं। ऐसे समय में सरकार अक्सर जनता का ध्यान किसी बाहरी मुद्दे की ओर मोड़ने की कोशिश करती है।
जापान ऐसा देश है जिसके खिलाफ पहले से ही ऐतिहासिक नाराजगी मौजूद है। इसलिए चीन के सरकारी मीडिया के लिए उसे आलोचना का केंद्र बनाना अपेक्षाकृत आसान माना जाता है।
पीपुल्स डेली के जोंग शंग कॉलम का उद्देश्य केवल अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का विश्लेषण करना नहीं होता, बल्कि चीन के नागरिकों के बीच सरकारी सोच को मजबूत करना भी होता है। यही वजह है कि जापान को लेकर प्रकाशित लेखों की संख्या अचानक बढ़ गई।
अमेरिका पर हमले कम क्यों हुए?
इस दौरान एक और दिलचस्प बदलाव देखने को मिला। जहां जापान की आलोचना लगातार तेज होती गई, वहीं अमेरिका के खिलाफ प्रकाशित तीखे लेखों की संख्या घटने लगी।
इसके पीछे भी एक व्यावहारिक कारण माना जा रहा है। वर्ष 2025 में अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ विवाद काफी बढ़ गया था। दोनों देशों ने एक-दूसरे पर भारी शुल्क लगाए थे, जिससे वैश्विक व्यापार प्रभावित हुआ। हालांकि बाद में दोनों देशों ने बातचीत के जरिए संबंधों में सुधार लाने की कोशिश शुरू की।
ऐसे माहौल में चीन के लिए अमेरिका पर लगातार तीखे हमले करना उसकी कूटनीतिक रणनीति के अनुकूल नहीं था। इसलिए सरकारी मीडिया ने अपना फोकस धीरे-धीरे जापान की ओर स्थानांतरित कर दिया।
जापान पर लगातार बढ़ती आलोचना
सनाई तकाइची के प्रधानमंत्री बनने के बाद चीन की सरकारी मीडिया में जापान के खिलाफ लगातार लेख प्रकाशित होने लगे। इन लेखों में जापान की रक्षा नीति, सैन्य खर्च, संविधान में बदलाव की योजना और ताइवान को लेकर उसकी नीति पर तीखी टिप्पणियां की गईं।
एक लेख में तकाइची को यह तक चेतावनी दी गई कि वे “आग से न खेलें।” इसकी वजह उनका वह बयान था जिसमें उन्होंने संकेत दिया था कि यदि भविष्य में ताइवान को लेकर कोई बड़ा संकट पैदा होता है तो जापान सैन्य हस्तक्षेप पर विचार कर सकता है।
चीन ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है। इसलिए इस मुद्दे पर किसी भी विदेशी देश की सक्रिय भूमिका उसे सीधे चुनौती के रूप में दिखाई देती है।
इसके बाद चीन की मीडिया ने जापान की कई नीतियों को “नए सैन्यवाद” की वापसी बताना शुरू कर दिया। आरोप लगाए गए कि जापान अपने शांतिवादी संविधान में बदलाव कर रहा है, सैन्य ताकत बढ़ा रहा है और पश्चिमी देशों का समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है।
साथ ही जापान पर दूसरे विश्व युद्ध के इतिहास को अपने पक्ष में पेश करने, हथियार निर्यात के नियम आसान बनाने और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था में ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाने जैसे आरोप भी लगाए गए।
(त्रिपाठी पारिजात)



