Saturday, February 28, 2026
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Life : हर यात्री एक कहानी है..

Life: आंखों को नम कर देने वाली एक भावनापूर्ण, हृदयस्पर्शी मार्मिक कहानी जो जीवन का वो सच सुनाती है जो हमारी आंखों के सामने होकर भी हमें नहीं दिखता..

Life: आंखों को नम कर देने वाली एक भावनापूर्ण, हृदयस्पर्शी मार्मिक कहानी जो जीवन का वो सच सुनाती है जो हमारी आंखों के सामने होकर भी हमें नहीं दिखता..

मैं ओला चलाता हूँ ।ज़्यादातर नाइट शिफ्ट करता हूँ।पिछले हफ्ते रात ग्यारह बजे एक बुज़ुर्ग सज्जन को उठाया । सफ़ेद पंजाबी, धोती, आँखों में थकान—लेकिन आवाज़ में अजीब-सी दृढ़ता ।

गाड़ी में बैठते ही बोले,
“आज रात मुझे पाँच जगहों पर ले चलना होगा । मैं तुम्हें 5000 रुपये दूँगा । नकद । लेकिन अंत तक कारण मत पूंछना ।”

यह कहकर एक कागज़ आगे बढ़ाया । उस पर पाँच पते लिखे थे ।

पहला पड़ाव-
दक्षिण कोलकाता का एक पुराना घर ।
मैंने गाड़ी रोकी । वे उतरे नहीं । सिर्फ़ खिड़की का शीशा नीचे करके देखते रहे । दस मिनट तक ।
आँखों से निरंतर आँसू बह रहे थे, लेकिन कोई आवाज़ नहीं ।
“चलो… अगला ।”

दूसरा पड़ाव-
एक प्राथमिक विद्यालय । गेट बंद । अंदर अँधेरा मैदान ।
वे उतरकर धीरे-धीरे झूले तक गए । एक झूले पर बैठकर हल्के-हल्के झूलने लगे ।
बीस मिनट बाद लौटे । बोले –
“यहीं पढ़ाता था । तैंतालीस साल । ज़िंदगी का सबसे अच्छा समय यही था ।”

तीसरा पड़ाव-
एक छोटा पुराना कॉफ़ी हाउस ।
अंदर जाकर एक कप चाय मँगाई । कोने की मेज़ पर अकेले बैठे रहे । चाय को छुआ तक नहीं । बस चारों ओर देखते रहे ।
पंद्रह मिनट बाद लौटकर हल्के से मुस्कुराए –
“यहीं, मेरी और मिताली (उनकी पत्नी) की पहली मुलाक़ात हुई थी । 1969 में ।”

चौथा पड़ाव-
निमतला श्मशान घाट ।
वे उतरे । चिताभस्म के पास एक फ़लक के सामने खड़े होकर धीमे-धीमे कुछ बोलते रहे । मैं सुन नहीं पाया ।
आधे घंटे बाद लौटे । आँखें लाल थीं ।
“आज तीन साल हो गए उसे गए ।”

पाँचवाँ पड़ाव-
एक बड़ा सरकारी अस्पताल ।
गाड़ी पार्क करने को कहा । फिर मेरी ओर देखा –
“अब कारण बताता हूँ । मुझे चौथे स्टेज का कैंसर है । डॉक्टर ने कहा है— कुछ हफ़्ते… शायद कुछ दिन । आज मैं अपनी पूरी ज़िंदगी आख़िरी बार देख लेना चाहता था ।”

मैं स्टीयरिंग पर सिर रखकर रोने लगा ।

उन्होंने कहा—
“वो घर—जहाँ बच्चों को बड़ा किया ।
वो स्कूल—जहाँ अपना उद्देश्य पाया ।
वो कॉफ़ी हाउस—जहाँ प्यार हुआ ।
वो श्मशान—जहाँ आख़िरी विदाई दी ।
और ये अस्पताल—जहाँ आज भर्ती होऊँगा । अब घर वापसी नहीं होगी ।”

उन्होंने मेरे हाथ में 5000/- रुपये रख दिए ।
“धन्यवाद । तुमने मुझे मेरी ज़िंदगी एक बार फिर घुमा दी । मेरे आख़िरी अजनबी इंसान…जिसने मेरे साथ कोमल व्यवहार किया ।”

मैंने कहा—
“नहीं दादू, ये मैं नहीं ले सकता ।”

वे बोले—
“लो । देने के लिए मेरा कोई नहीं । बच्चों ने इतनी दूरी बना ली है कि अब वो बात नहीं करते । यार-दोस्त कोई बचा नहीं, एक-एक करके सब विदा हो गये । तुमने तीन घंटे दिए—तीन घंटे की इंसानियत । उसकी कीमत पैसे से ज़्यादा है ।”

छोटा सूटकेस लेकर वे अंदर चले गए ।

अगले दिन मैं अस्पताल गया । पूछा—“श्री अनिरुद्ध मुखर्जी । केबिन 412” ।

फूल लेकर अंदर गया । मुझे देखकर मुस्कुराए —
“तुम आए?”

“आपको ऐसे छोड़ नहीं पाया।”

दो घंटे बातें हुईं—मिताली देवी की, उनके छात्रों की, उनके रूठे हुए बच्चों की ।

मैं रोज़ जाने लगा । चाय ले जाता । अख़बार पढ़कर सुनाता । कभी चुपचाप बैठा रहता ।

एक दिन बोले—
“सोचता था अकेला मरूँगा । लेकिन तुम हो । आख़री वक़्त में एक अजनबी, परिवार बन गया । तुम्हें मेरा बहुत-बहुत आशीर्वाद ।”

मैंने उनका हांथ पकड़ा—
“आप अकेले नहीं हैं ।”

मंगलवार भोर 3 बजकर 17 मिनट पर वे स्वर्ग चले गए ।
मैं उनका हांथ पकड़े बैठा था ।

आख़िरी शब्द थे—
“सबसे कहना… अजनबियों की ओर देखना । सचमुच देखना । हम सब कहीं जा रहे हैं—कोई तेज़, कोई धीरे । जाते हुए राह में दया करना । तुमने की । तुमने मेरे आख़िरी दिनों को जीने लायक बना दिया ।”

मॉनिटर की आवाज़ सीधी रेखा बन गई ।

श्मशान में उनके दाह-संस्कार के समय थे—कुल छः लोग –
मैं,
तीन नर्स,
एक वकील,
और एक पूर्व छात्र ।

तैंतालीस साल की शिक्षकी ।
बावन साल का दांपत्य ।
इक्यासी साल की ज़िंदगी ।
छह लोग ।

मैंने कहा—
“अनिरुद्ध बाबू ने मुझे सिखाया-

हर अजनबी किसी का पूरा संसार होता है ।
हर यात्री एक कहानी है ।
हर इंसान जी रहा है, मर रहा है, इंतज़ार कर रहा है—कोई उसे देखे ।

उन्होंने मुझे 5000/- रुपये दिए थे जीवन की सड़क पर गाड़ी चलाने के लिए ।
लेकिन जो शिक्षा दी—उसकी कीमत पैसे से कहीं ज़्यादा है ।

“मानवता कोई अतिरिक्त चीज़ नहीं । यही सब कुछ है ।”

आज भी वो 5000/- रुपये मेरे ग्लव बॉक्स में रखे हैं । खर्च नहीं किए ।

क्योंकि हर यात्री शायद अपनी आख़िरी यात्रा पर हो । हर अजनबी शायद आख़िरी विदाई दे रहा हो ।

इसलिए अब मैं अलग तरह से गाड़ी चलाता हूँ ।
पूंछता हूँ । सुनता हूँ । लोगों को देखता हूँ ।

क्योंकि एक बुज़ुर्ग शिक्षक ने एक कोमल रात माँगी थी-और एक अजनबी रुक गया था ।

आप भी वो इंसान बनो ।
आज रात कोई शायद अपनी आख़िरी यात्रा पर निकला हो—उसे कोमल बना देना ।

निशब्द क्षण, अनकहा सत्य ।

जय जय सियाराम

(प्रस्तुति – राजीव त्रिपाठी)

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