Saturday, February 28, 2026
Google search engine
Homeसाहित्यPoetry by Manmeet Soni: "मम्मी की महक"

Poetry by Manmeet Soni: “मम्मी की महक”

Poetry by Manmeet Soni: दुनिया के सबसे प्यारे इन्सान पर लिखना आसान नहीं होता - लेकिन मनमीत लिखते हैं तो बस अवाक हो जाता है पढ़ने वाला - बस खामोश बोलती हैं भीगी हुई आँखें..

Poetry by Manmeet Soni:दुनिया के सबसे प्यारे इन्सान पर लिखना आसान नहीं होता – लेकिन मनमीत लिखते हैं तो बस अवाक हो जाता है पढ़ने वाला – बस खामोश बोलती हैं भीगी हुई आँखें..

मम्मी की महक
किसी फूल की महक नहीं होती
बल्कि “महक का फूल” होती है –

इसे नाक नहीं
हमारा दिल सूंघता है
और बदबूदार से बदबूदार जगह पर भी
कम नहीं होती :

इस “महक के फूल” की महक!

मम्मी
रोटी की तरह महकती है
अभी-अभी पीसे हुए आटे-सी गर्म कोमल महक..

मम्मी
सब्ज़ी की तरह महकती है
भिन्डी टमाटर ककड़ी प्याज़ लौकी कद्दू कटहल की महक..

मम्मी
स्याही की महक है
कुछ लिखने का मन होता है
लेकिन वह काग़ज़ ही नहीं मिलता :

जिस पर मम्मी को लिखा जा सके!

मम्मी
विम बार
निरमा
सर्फ़ की तरह महकती है..

मम्मी
अभी अभी धुले कपड़े की तरह महकती है
फिर कपड़े को झटकने के बाद
जो छीटे उड़ते हैं
उन छीटों जैसी महकती है मम्मी..

मम्मी
बारिश से धुले हुए आँगन
और गर्मी में
पाइप से पानी के छिड़काव के बाद
मिट्टी से उठती भाप की तरह महकती है..

मम्मी
डियो की तरह नहीं
इत्र की तरह नहीं
लक्मे के ब्रांड्स की तरह नहीं

बल्कि ओसवाल सोप की तरह महकती है…

मम्मी के बाल
बालों की तरह महकते हैं
हालांकि वह इन्हें हफ़्ते में एक बार धोती है..

मम्मी
सबसे ख़ुशबूदार मेहनती पसीना है

तीखा
पैना
कसैला नहीं
काली मिट्टी की गंध जैसी महक वाला पसीना..

मम्मी
ऊपर से नीचे तक
नीचे से ऊपर तक
एक पृथ्वी है
गोल-मटोल पृथ्वी

जब कहीं कोई महक नहीं थी
तब जो सूरज की महक थी
आकाशगंगाओं की महक थी

मम्मी
आज भी
युगों सहस्त्राब्दों से
सूरज और आकाशगंगाओं जैसी ही महक रही है

मम्मी!

नदी
ज्वालामुखी
रेगिस्तान
पहाड़
हरियाली
और
चीड़ के घने वनों-सी महकती है

मनमीत!

अब उपमाएं नहीं बची हैं
जैसे तुम ईश्वर के बारे में कितना भी जान जाओ
कुछ भी नहीं जान सकते

वैसे ही तुम मम्मी की महक के बारे में
कुछ नहीं जानते
चाहे महक स्वयं अवतरित हो जाए

महक भी
यही कहेगी
मैं तुम्हारी मम्मी जैसी महकती हूँ!

मम्मी!

तुम जिस दिन आग की तरह महकोगी
तुम जिस दिन धुएं की तरह महकोगी
भाप या धुआं या राख भी हो जाओ तब भी
इसी तरह महकोगी :

जैसे ऊर्जा नहीं मरती
रूप बदल लेती है
माँ की महक भी नहीं मरती
वह बेटे-बेटी-बहु-पोतों-दोहितों में आ जाती है

मम्मी की महक से
अटाटूट भरा है यह संसार

बीमार होकर भी
बदबू नहीं आती मम्मी से

मम्मी का शव
कभी नहीं सड़ सकता

मम्मी
सड़न-बदबू-गंध-दुर्गंध जैसे विकारों से मुक्त है

साकार है मम्मी
निराकार है मम्मी
सगुण है मम्मी
निर्गुण है मम्मी

इस कविता से
आपको
अगर अपनी मम्मी की महक आ रही है
तो मानूंगा
कि मैं लिख सका मम्मी की महक

सार्थक हुआ कवि होना

महक मिल गई
चाय की थड़ी पर बैठकर
सिगरेट के धुएं में बदल रही ज़िंदगी को

जैसे मोक्ष ही मिल गया :

जीते जी!

(मनमीत सोनी)

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments