QUAD यदि राष्ट्र के हितों के अनुकूल प्रतीत न हो रहा हो तो उससे जुड़ा रहना समय, प्रयास और अर्थ की हानि से अधिक कुछ नहीं..
दिल्ली में हुई क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद भारत की बदली रणनीति चर्चा में है। चीन, अमेरिका, ब्रिक्स और इंडो-पैसिफिक की राजनीति के बीच भारत अब ‘राष्ट्र प्रथम’ नीति पर चलते हुए पश्चिमी देशों के हितों से दूरी बनाता दिख रहा है।
दिल्ली में 26 मई 2026 को क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक समाप्त हुई। आधिकारिक तौर पर बैठक सफल बताई गई और कई अहम मुद्दों पर सहमति बनने की बात सामने आई। समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा सहयोग, क्रिटिकल मिनरल्स और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में निगरानी जैसे विषयों पर साझा बयान भी जारी किए गए। फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज में निर्बाध आवाजाही पर भी चर्चा हुई। लेकिन इन औपचारिक घोषणाओं के पीछे एक बड़ा राजनीतिक संकेत छिपा दिखाई दिया—भारत अब धीरे-धीरे क्वाड से दूरी बनाता नजर आ रहा है।
कूटनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि भारत ने बेहद संतुलित तरीके से क्वाड की सक्रिय जिम्मेदारी ऑस्ट्रेलिया की ओर बढ़ा दी है। माना जा रहा है कि दिल्ली में प्रस्तावित क्वाड नेताओं की अगली बड़ी बैठक शायद अब पहले जैसी प्राथमिकता न रखे। भारत का यह रुख अचानक नहीं आया, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में बदलती वैश्विक राजनीति का परिणाम माना जा रहा है।
क्वाड का गठन वर्ष 2017 में हुआ था। इसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हुए। उस समय इसका मुख्य उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना माना गया था। हालांकि आधिकारिक रूप से इसे सैन्य गठबंधन नहीं कहा गया, लेकिन दुनिया भर में इसे चीन को संदेश देने वाले समूह के रूप में देखा गया। अमेरिका को एशिया में एक मजबूत साझेदारी की जरूरत थी और भारत, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया उसके स्वाभाविक सहयोगी बनकर उभरे।
जापान पहले से चीन के साथ कई भू-राजनीतिक तनाव झेल रहा था। ऑस्ट्रेलिया दक्षिण चीन सागर के समीप होने के कारण रणनीतिक रूप से अहम था। भारत भी चीन के साथ सीमा विवाद और सैन्य तनाव का सामना कर चुका था। ऐसे में क्वाड को एक बड़े रणनीतिक मंच के रूप में प्रस्तुत किया गया।
लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। बीते कुछ वर्षों में दुनिया की राजनीति पूरी तरह नई दिशा में जाती दिखाई दी। भारत और चीन के बीच लद्दाख तथा अरुणाचल प्रदेश में तनाव के बाद रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार के संकेत मिलने लगे। कजान में हुए ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री Narendra Modi और Xi Jinping की मुलाकात ने दोनों देशों के संबंधों में नई शुरुआत का संकेत दिया था। इसके बाद रूस, चीन और भारत के नेताओं की साझा तस्वीरों ने पश्चिमी देशों में भी हलचल पैदा की।
अब दोनों देशों के बीच हवाई सेवाएं दोबारा शुरू करने और निवेश सहयोग बढ़ाने की चर्चाएं हो रही हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि भारत अब चीन के साथ पूरी तरह टकराव की नीति से हटकर संतुलित संबंधों की ओर बढ़ रहा है। यही कारण है कि क्वाड की पुरानी रणनीतिक धार कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।
दूसरी ओर अमेरिका की विदेश नीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने पहले चीन के खिलाफ आक्रामक व्यापार युद्ध शुरू किया। भारी टैरिफ लगाए गए, लेकिन बाद में अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ने के बाद वॉशिंगटन का रुख नरम पड़ता गया। चीन के साथ सीधे टकराव की जगह समझौते और संवाद की नीति सामने आने लगी।
ताइवान के मुद्दे पर भी अमेरिका का रवैया पहले जैसा आक्रामक नहीं दिखाई दिया। इससे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं पर सवाल उठने लगे। कई विशेषज्ञों का मानना है कि जब खुद अमेरिका चीन के साथ संबंधों को संतुलित करने में लगा है, तब भारत क्यों किसी स्थायी विरोध की राजनीति में खुद को बांधे रखे?
भारत की विदेश नीति अब पहले से कहीं अधिक व्यावहारिक दिखाई दे रही है। नई दिल्ली अब हर वैश्विक मंच को अपने राष्ट्रीय हितों की कसौटी पर परख रही है। यही वजह है कि भारत एक तरफ क्वाड में बना हुआ है, तो दूसरी ओर ब्रिक्स को भी उतनी ही गंभीरता से आगे बढ़ा रहा है।
ब्रिक्स अब सिर्फ पांच देशों का समूह नहीं रह गया है। इसमें कई नए सदस्य जुड़ चुके हैं और यह वैश्विक दक्षिण की मजबूत आवाज के रूप में उभर रहा है। भारत के लिए रूस लंबे समय से भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार रहा है। ईरान के साथ भी भारत के ऐतिहासिक और आर्थिक संबंध हैं। ऐसे में अमेरिका की हर रणनीति के साथ पूरी तरह खड़ा होना भारत के लिए आसान नहीं है।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत डॉलर आधारित वैश्विक व्यवस्था पर पूरी तरह निर्भर रहने के पक्ष में नहीं दिखता। रूस पर पश्चिमी प्रतिबंध, ईरान से तनाव और विभिन्न देशों पर अमेरिकी आर्थिक दबाव ने नई दिल्ली को यह सोचने पर मजबूर किया है कि उसे बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपनी स्वतंत्र भूमिका मजबूत करनी होगी।
क्वाड के भीतर भी पिछले दो वर्षों में उत्साह कम होता दिखाई दिया। जब भारत को इसकी अध्यक्षता मिली, तब उम्मीद थी कि नई दिल्ली में एक बड़ा शिखर सम्मेलन होगा। लेकिन अमेरिका सहित अन्य सदस्य देशों की तरफ से अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई दी। कई बैठकें टलती रहीं और नेतृत्व स्तर पर सक्रियता कमजोर पड़ती गई।
इससे यह संदेश गया कि क्वाड अब पहले जैसी प्राथमिकता वाला मंच नहीं रह गया है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसे कई संगठन पहले भी बने और समय के साथ अप्रासंगिक हो गए। लीग ऑफ नेशंस, सीटो और सेंटो जैसे संगठन इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं क्योंकि बदलते वैश्विक समीकरणों में उनकी उपयोगिता कम हो गई थी।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या क्वाड भी उसी दिशा में बढ़ रहा है? भारत का मौजूदा रुख यही संकेत देता है कि नई दिल्ली अब किसी भी समूह में सिर्फ वैचारिक आधार पर नहीं, बल्कि अपने ठोस राष्ट्रीय हितों के अनुसार भूमिका तय करेगी।
भारत की विदेश नीति का नया संदेश साफ दिखाई देता है—दोस्ती सबके साथ, लेकिन निर्णय केवल राष्ट्रीय हित के आधार पर। बदलती दुनिया में नई दिल्ली अब किसी दूसरे देश की रणनीतिक लड़ाई का हिस्सा बनने के बजाय अपने आर्थिक, सामरिक और वैश्विक हितों को प्राथमिकता देना चाहती है।
यही कारण है कि भारत अब ‘राष्ट्र प्रथम’ की नीति के तहत संतुलित कूटनीति पर जोर देता नजर आ रहा है। पश्चिम और पूर्व—दोनों के साथ संबंध बनाए रखते हुए भारत खुद को एक स्वतंत्र वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
(त्रिपाठी पारिजात)



