Tuesday, May 26, 2026
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South Cinema के म्यूजिक का सिल्वर पीरिएड आ रेला हे

South Cinema: साउथ सिनेमाई म्यूज़िक का सिल्वर पीरीअड लौट आया है दोस्तों -गुड न्यूज है जी ये तो..

South Cinema: साउथ सिनेमाई म्यूज़िक का सिल्वर पीरीअड लौट आया है दोस्तों -गुड न्यूज है जी ये तो..

फर्स्ट ऑफ ऑल, आपको ये जानना ज़रूरी है कि गोल्डन पीरीअड विद एक्स्ट्रा शाइन कौन सा वाला था? तो जी वो था हमारा 90s का दौर।

जब जावेद साहब और गुलज़ार साहब सरीखे शायर, एक-एक तमिल-तेलुगु गाने को हिन्दी में बनाने के लिए बड़ी मेहनत करते थे। वेन्नीलवे-वेन्नीलवे को चन्दा रे चन्दा रे, कभी तो ज़मीं पर आ, बैठेंगे बातें करेंगे जैसा क्लासिक बनाया गया था।
या ‘स्नेहीरने-स्नेहीरने को चुपके से लग जा गले, रात की चादर तले’ जैसा मास्टरपीस बनाया था।

उसके बाद इस गोल्डाई में थोड़ी कमी आई, गोल्ड महँगा होने लगा और हम सिल्वर की तरफ़ बढ़ चले। (दिल्ली में अलमुनीयम को भी सिल्वर कहते हैं, कॉनफ्यूज़ न हों)

गुलज़ार साहब और जावेद साहब महँगे पड़ते थे, तो आइडिया निकाला कि जो गीत गाने वाला है, उसके मन में जो भी आए, वही वो गा दे हिन्दी में, क्या ही अनर्थ हो जाएगा?

फिर जो अनर्थ होते गए, उसका एक उदाहरण मैं लिखता हूँ, बाक़ी आप बताना।
फ़िल्म अपरिचित का फ़ेमस गीत है –

सुकुमारी, क्या लोगी धीरे-धीरे, क्या लोगी धीरे-धीरे….
जाssssन मेरी…. ओ सुकुमारी…
इसी फिल्म का एक और गीत है
गोरा-गोरा अंग तेरा, संतरे जैसा रंग तेरा, चोरी से दिल ले लिया, भेलिया!

पर फिर, अफ़सोस, थोड़ा सेंस लाने और अश्लीलता पर सेंसर लगाने के नाम पर, डबिंग इंडस्ट्री में ऐसे गाने विलुप्त होने लगे।

पर नहीं, राम चरण की पेड्डी में वही ज़ायका वही स्वाद फिर हाज़िर हुआ है दोस्तों… जी हाँ, सरके-सरके, चुनर तेरी सरके… तो आप सबने रिपोर्ट कर-करके डिलीट करवा दिया था, पर ये नहीं करवा पाओगे।

इस सिल्वर सॉन्ग का नाम है – हेलालल्लालो… और शायर रक़ीब आलम कुछ इस
तरह अपना कलाम लिखते हैं कि –

दोस्त होंगे डॉलर होंगे, और होगी मुग़लाई
दर्द होंगे आँसू होंगे, और होगी तन्हाई (वाह वाह क्या बात है)
हर एक के साथ ये उलझन है,
कहीं तंज़ है तो कहीं टेंशन है (जियो राजा)
हलवा-वलवा छोड़ के बलवा
मेरे पीछे घिस के अपना तलवा (हैंsssssss, क्या है ये?)
कभी दूध मलाई, मेवे की मिठाई
कभीदाल मखाने कभी लड्डू लेकर आ (शायर शायद भूखा है)
कभी सैर सपाटे कभी सन्न-सन्न-सन्नाटे
कभी तिल के दाने कभी सत्तू लेके आ (बिहार प्रेम भी है इसमें)
हल्ला-लल्ला-लो, हैलो, हल्ला-लल्ला-लो हेला-लो
हम दोनों का चालू चक्कर है कर लो?

गीत में आगे ये भी सुझाव दिया गया है कि रोज़ रोज़ घर में नहाना ठीक नहीं, पर मैं पूरा स्पॉइलर देकर आपसे खुद अपने ही कानों में सीसा पिघलाने का मौका नहीं छीनना चाहता। यूट्यूब पर है सुनिए। कम से कम श्रुति हसन और जाह्नवी कपूर के लिए देखिए।

पहले लोग बिहारियों को कहते थे कि क्या है तुम्हारा भोजपुरी म्यूजिक?
आज भोजपुरी वाले कह रहे हैं कि तू क्या है बे? हमारे जैसा ही तो है! 

(सिद्धार्थ अरोड़ा सहर)

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